11.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२७ वां* सार -संक्षेप

 यह जीवन रचनाकर्ता की एक अनोखी  अमर कहानी 

इसमें रोज बिगड़ते  बनते हैं दुनिया के राजा रानी

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 11 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२७ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०९

अपनी भावनाओं की रक्षा करते हुए अपने लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए कर्मानुरागी बनें


यह संसार प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है। इसके विविध प्रपंच, मोह और आकर्षण सतत रूप से जीवन को उलझाए रखते हैं। तथापि, प्रत्येक जीव के अंतर्मन में एक विशेष तत्त्व,एक दिव्य शक्ति निहित होती है, जो प्रायः सुप्त अवस्था में रहती है। जब परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है, तब यह सुप्त शक्ति जाग्रत होती है और व्यक्ति उस दिव्य तत्त्व का विस्तार अपने जीवन में करने में समर्थ हो जाता है। इस जागरण से वह संसार के प्रभावों से ऊपर उठकर आत्मबोध, कर्तव्यबोध की ओर अग्रसर होता है। परमात्मा की कृपा महत्त्वपूर्ण है l



सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥


सगुणोपासकों के लिए भगवान् संसार में आकर उनका संबल बनता है  उनकी छत्रछाया बनकर उनकी रक्षा करने में समर्थ होता है 

अव्यक्त ब्रह्म का न रूप है, न रेख, न गुण है, न जाति। मन वहां स्थिर ही नहीं हो सकता। सब प्रकार से वह अगम्य है, इसे ही स्पष्ट करते हुए सूरदास सगुण ब्रह्म श्रीकृष्ण की लीलाओं का ही गायन करना ठीक समझते हैं और कहते हैं 

रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।

सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥

हम भी सगुणोपासक हैं

सगुणोपासना में भी तत्त्च है-

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥

ये काव्यात्मक अभिव्यक्तियां अद्भुत हैं यह जगत् ही काव्यात्मक है भावों से परिपूर्ण सभी व्यक्ति कवि हैं कवित्व भावना से उद्भूत होता है इसी कारण भावों के रक्षण पर बल दिया जाता है


केवल प्राणों का परिरक्षण जीवन नहीं हुआ करता है

जीवन जीने को दुनिया में अनगिन सुख सुर साज चाहिए......

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हम युगभारती के सदस्यों का कर्तव्य है कि हम अपने लक्ष्यों पर ध्यान दें 

हमारे लक्ष्यों में  है राष्ट्र को उसकी सर्वोच्च उन्नति और गौरव की ओर ले जाना , राष्ट्र- भक्त समाज में व्याप्त भय और भ्रम का निर्मूलन आदि

इसके अतिरिक्त आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं युगभारती किस प्रकार के झंझटों से मुक्त रहे जानने के लिए सुनें