जो भाव अत्यधिक मूल्यवान् होते हैं उन्हें उचित स्थान पर प्रयोग करना चाहिए....
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६२८ वां* सार -संक्षेप
स्थान : ग्राम सरौहां
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११०
हम विचारों से आगे बढ़कर कर्म के पथ पर चलें l
हमें प्रेरित करने के लिए इस वेला में आचार्य जी के मन में जो समाजोन्मुखी और राष्ट्र के लिए अत्यन्त हितकारी स्वयं हमारे लिए भी अत्यधिक लाभकारी सद्विचार उत्थित होते हैं उन्हें वे प्रसरित करते हैं l हमें उनका मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है यह तो हमारा सौभाग्य है l
यह मानव जीवन अत्यन्त दुर्लभ है, इसे हम व्यर्थ न गवाएँ।
संपत्ति, परिवार और सुख–सब नश्वर हैं, अंत समय में ये साथ नहीं देंगे।
अतः हम ईश्वर भक्ति में लगें, मिथ्या आशाओं और विषय-भोगों को त्यागकर l किन्तु यह ध्यान रखते हुए कि
ज़िन्दगी पौरुष पराक्रम शील संयम की कहानी,
ज़िन्दगी आदर्श पूरित शौर्य विक्रम की निशानी l
हमें उच्च गुणों के साथ जीवन जीना चाहिए और भावी पीढ़ी को भी यही शिक्षा देनी चाहिए उसे भ्रम भय से मुक्त करना चाहिए क्योंकि आधुनिक शिक्षा, जो भावों और संस्कारों से रहित है, उसका यह अत्यन्त गंभीर अपराध है कि वह नई पीढ़ी को न तो सही दिशा दे पा रही है और न ही उन्हें नैतिकता, संवेदनशीलता व जीवन-मूल्यों से जोड़ पा रही है।
फलस्वरूप, भावी पीढ़ी मार्ग से भटक रही है, उसका आचरण बिगड़ रहा है और वह जीवन के सच्चे उद्देश्य से विमुख होती जा रही है।
इसलिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जो ज्ञान के साथ साथ चरित्र, संस्कृति और संवेदना का भी विकास करे।
कर्म के सिद्धान्त जब व्यवहार बनकर दीखते हैं,
तब भविष्यत् के सभी अंकुर सहज ही सीखते हैं।
और जब सिद्धान्त केवल सूत्रवत् रटवाये जाते,
तभी प्रवचन मन्त्र सारे व्यर्थ यो हीं
फड़फड़ाते।
इसलिए व्यवहार को आदर्श का जामा पिन्हाओ,
नयी पीढ़ी को सनातन धर्म की लोरी सुनाओ।
गुनगुनाओ गीत पुरखों के पराक्रम शौर्य वाले,
नोचकर फेंको मनों पर चढ़ चुके सुख-स्वार्थ जाले।
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।" -स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय युवा दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं l
इसके अतिरिक्त मस्तिष्क का खेल कौन खेलता है, कबीरी ज्ञान किसके मन में आता है जानने के लिए सुनें