3.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६१९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 3 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१९ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०१


हे परमात्मा! मुझे इतनी शक्ति प्रदान करें कि मैं संसार के तत्त्व को

 जानकर उसका आचरण करने योग्य बन सकूं । संसार को न तो त्याज्य मानना चाहिए, न ही सर्वस्व अपितु इसे साधन मानकर विवेकपूर्वक जीना ही संसार के तत्त्व को समझना है।



इस भाव-जगत् में जो व्यक्ति अपनी आन्तरिक शक्ति, बुद्धि, विचार और चैतन्य को संतुलित ढंग से बनाए रखते हुए परिस्थितियों में उचित प्रकार से रहना और सहना जान लेता है, वह न केवल संसार के तत्त्व को समझ पाता है, बल्कि उसे सुलझाने में भी समर्थ होता है।


संसार का तत्त्व यह है कि यह नश्वर, परिवर्तनशील और क्षणिक है  इसमें कुछ भी स्थायी नहीं है। यह सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मरण, मिलन-वियोग जैसे द्वन्द्वों से युक्त है। परन्तु यह तत्त्व केवल व्यवहारिक जगत् का पक्ष है।


गहराई से देखें तो संसार आत्मा के अनुभव, कर्मफल और मोक्ष की यात्रा का माध्यम है। इसका उद्देश्य आत्मा को साधना, विवेक, त्याग, प्रेम, करुणा और आत्मबोध के मार्ग पर आगे बढ़ाना है। जब कोई व्यक्ति संसार को केवल भोग का स्थान न मानकर साधना का क्षेत्र मानता है, तभी वह इसके वास्तविक तत्त्व को समझ पाता है।


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।


तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.30।।


आत्मा नित्य, अविनाशी और अजर-अमर है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा को कोई मार नहीं सकता। इसलिए किसी के मरने पर या शरीर छोड़ने पर शोक करना उचित नहीं है l