21.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 21 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३७ वां* सार

 व्यालारिरिव निर्भीकः स योद्धा युद्धे विजयी भवति।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 21 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११९

 लक्ष्य चाहे कितना ही महान् क्यों न हो,उसकी वास्तविक सफलता निरंतर, सुविचारित और अनुशासित प्रयासों से ही प्राप्त होती है।

हर छोटा पग आगे बढ़ने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग होता है इसलिए लक्ष्य को सदैव दृष्टि में रखते हुए, प्रत्येक कर्म को पूर्ण निष्ठा और विवेक के साथ करना ही सच्ची साधना है।




ईश्वरीय लीला का एक भाग बने ये संप्रेषण हम विश्वासी भक्त लोगों के जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाल रहे हैं। इनके विचार केवल बौद्धिक न होकर हमारे अंतर्मन में उतरकर हमारे आचरण को उचित सात्विक दिशा दे रहे हैं। समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत कर रहे हैं।

इस प्रकार, भावनापूर्ण एवं ज्ञानसम्पन्न  ये सदाचारपूर्ण संदेश केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं  बल्कि हमारे चरित्र निर्माण और जीवन-मूल्यों की स्थापना का सशक्त माध्यम बनते जा रहे हैं इसी कारण ये अत्यन्त प्रभावकारी, उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध हो रहे हैं हमें बिना भ्रम इनका लाभ उठाना चाहिए l तो आइये प्रवेश करें आज के संप्रेषण में


बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥89 क॥

इसकी व्याख्या में आचार्य जी स्पष्ट कर रहे हैं कि गुरु, जो शक्तिसम्पन्न सामर्थ्यवान् भी हो, के बिना ज्ञान संभव नहीं, वैराग्य के बिना भी ज्ञान संभव नहीं अर्थात् जिस विषय पर हम केन्द्रित हैं उसके प्रति हमारा पूर्ण ध्यान रहे और शेष से विराग रहे तो वह विषय हमें स्पष्ट हो जाएगा और हरि की भक्ति, जिसका एक स्वरूप आत्म-दीप्ति है,से निश्चित रूप से सुख प्राप्त होगा l 

गीता के १७ वें अध्याय का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने तीन प्रकार के तप बताए


देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुष का पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है। जो वाक्य उद्वेग उत्पन्न करने वाला नहीं है, जो प्रिय, हितकारक और सत्य है तथा वेदों का स्वाध्याय अभ्यास वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।।

मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह और भावों की शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बबूल के नीचे दिया वाला कौन सा प्रसंग बताया भैया त्रिलोचन जी ने किस समस्या का उल्लेख किया जानने के लिए सुनें