प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 22 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६३८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२०
आचार्य जी की भावनाओं का आदर करते हुए उनसे प्राप्त मार्गदर्शन का यथासंभव अधिक से अधिक सदुपयोग करना चाहिए। उनकी भावनाएँ हमारे लिए केवल स्नेह का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली अमूल्य धरोहर हैं उन्हें अपने आचरण और कर्म में उतारना ही उनका सच्चा सम्मान है।
भारत अर्थात् एक ऐसा देश जहाँ जीवन का परम लक्ष्य अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर होना है।
अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥
यही कारण है कि भारत की परम्परा में ज्ञान,जो हम लोगों के लिए अपार श्रद्धा का पात्र होना चाहिए,को सर्वोच्च स्थान दिया गया—चाहे वह वेदों का ब्रह्मज्ञान हो, उपनिषदों का आत्मबोध, गीता का कर्मयोग हो या संत-परम्परा का लोकबोध l यहाँ शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और समाज-कल्याण का माध्यम रही है। शक्ति का पर्याय और संयम की गाथा यह शिक्षा सिखाती है कि हमें यह मनुष्य योनि ईश्वर की विशेष अनुकम्पा से प्राप्त हुई है। उन्होंने हमें इस संसार में कर्म करने के उद्देश्य से भेजा है। जब हमारे भीतर यह दृढ़ विश्वास स्थापित हो जाता है कि कर्म करना ही हमारा धर्म है,तब हम प्रत्येक कार्य को पूर्ण मनोयोग, निष्ठा और उत्तरदायित्व के साथ संपन्न करते हैं। ऐसे निष्काम और एकाग्र प्रयासों का फल अवश्य प्राप्त होता है, क्योंकि सच्चे भाव से किया गया कर्म कभी निष्फल नहीं जाता।
दीनदयाल विद्यालय जो पं दीनदयाल जी की अधूरी साधना का चुनौतीपूर्ण पथ था के पूर्व छात्र अर्थात् युगभारती
"युगभारती" माँ भारती की आरती का स्वर,
कि संयम शक्ति सेवा साधना का दीप है भास्वर l
के सदस्य होने के कारण हमें अपने कर्तव्य की अनुभूति होनी चाहिए हमने जो चार आयाम शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलंबन सुरक्षा निर्धारित किए हैं उनके अनुसार कार्य करें हमें अपने राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाना है हर राष्ट्रभक्त के भीतर अन्तर्निहित शक्तियों की हम उन्हें अनुभूति कराएं
इसके अतिरिक्त *वो बात तो मैं भी नहीं जानता* किसने कहा था भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें