प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 24 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६४० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२२
विद्यालय की भावनाओं को अपने भीतर प्रवेश कराते हुए कर्मयोगी बनें
इन सदाचार वेलाओं का अस्तित्व अध्यात्म के सोपानों पर क्रमशः आरोहण करने का और संसार के मालिन्य के क्रमशः विनाश का एक अद्वितीय अवसर है हमें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए
मन पछितैहै अवसर बीते।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥
दुर्लभ देह, मन, बुद्धि और विचारों के समन्वय से हमें प्राप्त यह मनुष्य-जीवन ईश्वर की एक अद्भुत रचना है। हममें से प्रत्येक के भीतर अनन्त शक्तियाँ निहित हैं, किंतु विस्मृति के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाते। जब मनुष्य आत्मबोध की ओर अग्रसर होता है और अपने सत्य स्वरूप का आंशिक भी अनुभव कर लेता है, तब वह अनुभूति शब्दों से परे हो जाती है। अद्भुत अवतरित महापुरुष आदि शङ्कराचार्य द्वारा उद्घोषित “चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्” इसी आत्मानुभूति का द्योतक है, उस परम आनन्द की अनुभूति को वास्तव में वही जान सकता है जिसने उसे प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया हो।
विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किंतु संत रूपी हंस दोष रूपी जल का परित्याग कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं
महान् जनों, ऋषियों, तपस्वियों, शूरों की हम चर्चा तो करते हैं किन्तु इनके भावों का अपने भीतर प्रवेश नहीं करा पाते इनका अंश धारण नहीं कर पाते किन्तु इससे हमें व्यथित नहीं होना चाहिए हम आत्मस्थ होने का प्रयास करें अविद्या के लोक में विद्या का प्रवेश कराएं तो तात्त्विक प्रकाश से प्रकाशित होते हुए इस आत्मानुभूति के आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता l
१०८ उपनिषद ज्ञान खंड का उल्लेख क्यों हुआ, किसने आचार्य जी से कहा मेरे साथ रहो, हिमालय यात्रा की चर्चा क्यों हुई, डा सुनील जी के साथ भैया शुभेन्दु जी का उल्लेख क्यों हुआ,अधिवेशन के लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें