25.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 25 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४१ वां* सार -संक्षेप

 मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया l

 को जग जाहि न ब्यापी माया॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 25 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२३

भगवान् राम का ध्यान करते हुए हम अपने कर्म करें


आचार्य जी का अनुभव जीवन की तपस्या से उपजा हुआ है, उनका विश्वास सत्य और साधना में दृढ़ है सनातन धर्म में अडिग है,  उनके विचार लोककल्याण राष्ट्रकल्याण की दृष्टि रखते हैं और इन सबका मूल स्रोत उनके शुद्ध भाव हैं l 

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।


भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।17.16।।



यदि हम उस भाव-प्रधान दृष्टि को ग्रहण कर सकें, तो हमारी सोच में स्थिरता आएगी, आचरण में शुद्धता उत्पन्न होगी और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन सम्भव होगा।

 आचार्य जी की भावनात्मक, वैचारिक और अनुभवजन्य शक्ति का अल्पांश भी हमारे लिए महान् लाभ का कारण बन सकता है तो इसी लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने समय का सदुपयोग करते हुए आइये प्रवेश करें आज की सदाचार वेला में


आचार्य जी नित्य हमें स्मरण कराते हैं कि हम अपने राष्ट्र को सर्वोच्च वैभव और गौरव की स्थिति तक ले जाने में समर्थ होने का प्रयास करें उस दिशा में इस दृष्टि को सामने रखते हुए चलते जाएंगे तो हमें इस कलियुग में यशस्विता की प्राप्ति निश्चित रूप से होगी हम चर्चित होंगे

और यह कलियुग कैसा 

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।

गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥102 क॥


कलियुग दोषों से परिपूर्ण है—अधर्म, कपट, लोभ और पतन इसमें प्रबल हैं। किन्तु इसके साथ ही इस युग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ साधना कठिन नहीं है। भक्ति, नाम-स्मरण और सद्भाव मात्र से ही मनुष्य भव-बन्धन से मुक्त हो सकता है।

अतः कलियुग को केवल पतन का युग मानना एकांगी दृष्टि है; वस्तुतः यह करुणा और सहज मोक्ष का युग भी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाता है l

राम जी के गुण अर्थात् उनके विलक्षण कर्मों का हम ध्यान करें उनसे हमें शक्ति सामर्थ्य की अनुभूति होगी हमें संगठन का महत्त्व समझ में आयेगा l युग -भारती हमारा संगठन है हम उसके विस्तार पर ध्यान दें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 


"युगभारती"  माँ भारती की आरती का स्वर,

कि संयम शक्ति सेवा साधना  का दीप है भास्वर l


इसके अतिरिक्त नरेन्द्र मोदी के साथ भगवान् विष्णु को आचार्य जी ने कैसे संयुत किया,भैया पंकज जी भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ आता और पाता में क्या अंतर है जानने के लिए सुनें