प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 27 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६४३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२५
UGC Act विषय को गम्भीरता से लें उसका अध्ययन करें अपने अधिकारों विचारों का प्रयोग करते हुए मार्ग निकालें
हम जो बैठकें करें उनमें प्रेम आत्मीयता की अनुभूति के साथ कर्म चैतन्य, विचार, चिन्तन को भी स्थान दें
शिक्षा किसी सभ्यता की आत्मा का निर्माण करती है। वह केवल मनुष्य को जानकारी प्रदान करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना को संस्कारित करने का साधन है। शिक्षा ही वह आधार है जिसके माध्यम से विचार सत्ता से उतरकर व्यवहार की भूमि पर प्रतिष्ठित होते हैं। विचार यदि बीज है, तो शिक्षा उसकी वह भूमि है जिसमें वह अंकुरित होकर कर्मरूप वृक्ष बनता है।
मनुष्य के भीतर निहित शक्तियाँ बौद्धिक, मानसिक और नैतिक स्वतः कल्याणकारी नहीं होतीं, उन्हें दिशा देने वाला विवेक शिक्षा के माध्यम से ही विकसित होता है। शिक्षा मनुष्य के भ्रमों का निवारण करती है उसे वह दृष्टि प्रदान करती है कि शक्ति का प्रयोग प्रभुत्व के लिए नहीं जो प्रेतत्व की अनुभूति कराए,अपितु धर्म, मर्यादा और लोककल्याण के लिए होता है,जैसा भगवान् राम ने प्रयोग किया l
किन्तु जब शिक्षा अपने तात्त्विक उद्देश्य से विमुख होकर केवल उपयोगिता, प्रतिस्पर्धा या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित हो जाती है, तब वही शिक्षा विकृति का रूप धारण कर लेती है। ऐसी शिक्षा समस्याओं का समाधान करने के स्थान पर उन्हें जन्म देती है क्योंकि उसमें ज्ञान तो होता है, पर विवेक नहीं, क्षमता तो होती है, पर संवेदना नहीं।
इसके विपरीत, उचित शिक्षा मनुष्य को आत्मबोध की ओर उन्मुख करती है। वह तत्त्व शक्ति विचार विश्वास श्रद्धा कर्म-चैतन्य आदि की अनुभूति कराती है l प्रेम, आत्मीयता, परिवार भाव का बोध कराती है l हमारे चिन्तकों विचारकों अध्येताओं ज्ञानियों ऋषियों ने सुशिक्षा पर अत्यधिक ध्यान दिया है l वह व्यक्ति और समाज के विकास का पथ प्रशस्त करती है हमें जाग्रत करती है
जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक ।
व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक ।।
इसके अतिरिक्त संहिताएं क्या हैं समय की क्या मांग है जानने के लिए सुनें