जलते जीवन के प्रकाश में अपना जीवन तिमिर हटायें
उस दधीची की तपः ज्योति से एक एक कर दीप जलाएं l
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 28 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६४४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२६
विषम परिस्थितियों में दिशा और दृष्टि प्राप्त करने के लिए गीता के १८ वें अध्याय के २० से ३५ तक के छंदों का अध्ययन करें
(सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।.....
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।)
यदि हम प्रभातकाल जैसे पवित्र और जागरण के समय को विकारों और सांसारिक प्रपंचों में उलझकर व्यर्थ कर देंगे, तो यह हमारी अंतर्निहित शक्तियों का अनुचित अपव्यय ही होगा। इसलिए आवश्यक है कि हम इन विकारों से बचते हुए अपने आत्मिक स्वरूप की ओर अग्रसर होने का प्रयास करें। हमें निरन्तर यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है हमारा स्वरूप है “चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्” अर्थात् मैं चैतन्य और आनन्द स्वरूप परम सत्य हूँ।
प्रभातकाल में प्राप्त होने वाली स्वच्छ बुद्धि और नवचेतना का उपयोग कर हमें आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और उस आनन्द को अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए, जो हमारे भीतर स्वभावतः विद्यमान है।
आचार्य जी इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से हमें आत्मबोध की दिशा की ओर ले जाने का निरन्तर प्रयास कर रहे हैं हमें अपने को सौभाग्यशाली समझना चाहिए l
भारतवर्ष की संस्कृति प्रेम और आत्मीयता के सुदृढ़ आधार पर विकसित हुई है। यही प्रेमभाव और परस्पर आत्मीयता हमारी सभ्यता की प्राणशक्ति रहे हैं। इसी को हनुमान जी के माध्यम से दीनदयाल विद्यालय में प्रविष्ट कराया गया जिससे वहाँ का वातावरण सेवा, समर्पण और सौहार्द से अनुप्राणित हो सका।
अतः हमें वाद-विवाद, तर्क-वितर्क और बौद्धिक संघर्षों में उलझने, जैसा इस समय UGC Act के कारण हो रहा है, के स्थान पर प्रेम, सहयोग और सद्भाव के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए। क्योंकि बौद्धिक युद्ध से नहीं, अपितु आत्मीय संवाद और सांस्कृतिक समरसता से ही समाज का वास्तविक कल्याण संभव है।
प्राणियों की समस्त सृष्टि में मनुष्य को जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है, उसका मूल कारण उसकी बौद्धिक क्षमता है। जब तक मनुष्य प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस विशिष्ट वरदान का सम्यक् एवं विवेकपूर्ण उपयोग नहीं करता, तब तक वह अपने मनुष्यत्व के वास्तविक अधिकार से वंचित ही रहता है।
महाभारत के युद्धभूमि में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को मानसिक उन्माद का परित्याग कर, एक वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनाकर जीवन जीने का उपदेश देते हैं। उस समय अर्जुन इतने अधिक भावुक एवं दुर्बल हो गये थे कि वह अपने तथा अन्य लोगों के शारीरिक संरक्षण की चिन्ता में कर्तव्य से विमुख होने लगे थे l भगवान् कृष्ण कहते हैं
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।। 2.50 ।।
विद्वान् और किसान के बीच क्या है, किन्होंने गन्ने का चाटकर ही स्वाद लिया, ज्ञान का क्या आधार है,भैया अजय प्रताप जी की क्या बात आचार्य जी को अच्छी लगी, कचहरी शब्द क्या है जानने के लिए सुनें