29.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 29 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 29 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२७

भावनाओं, संकल्पों, विचारों के माध्यम से राष्ट्र-यज्ञ में तर्पण करें



धैर्य धारण करना तथा परस्पर विश्वास को अक्षुण्ण बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है। जब आपसी विश्वास में दरार पड़ जाती है, तब संगठन /परिवार/समाज में गहन अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है। ऐसे समय में यह विश्वास दृढ़ रखना चाहिए कि हनुमान जी की कृपा और संरक्षण हमारे ऊपर है, अतः विषम परिस्थितियों को देखकर भयभीत अथवा विचलित नहीं होना चाहिए। वर्तमान में यूजीसी अधिनियम के कारण जो कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं, वे भी धैर्य, संयम और एकता से ही पार की जा सकती हैं। शिक्षा में  वर्तमान यूजीसी  अधिनियम जैसे सुधार अनुचित हैं l


“मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥” अर्थात् शिक्षा और संस्कार का स्वरूप धीरे-धीरे जीवन के परम उद्देश्य से हटकर केवल आजीविका और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित हो गया है, वर्तमान शिक्षा-पद्धति  अपने मार्ग से भटकती प्रतीत हो रही है। आज शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र विकास और जीवन-मूल्यों का संस्कार न रहकर मात्र फल-प्राप्ति तक सिमट गया है। उपदेशों में त्यागपूर्वक उपभोग करने, परधन के प्रति लोभ न रखने और नैतिक आचरण अपनाने की बात कही जाती है, किंतु व्यवहार में इन आदर्शों को उतारने का कोई वास्तविक आग्रह नहीं रहता। शिक्षा केवल अंक, पद और सफलता प्राप्त करने का साधन बनकर रह गई है, न कि जीवन को शुद्ध, संयमित और कर्तव्यनिष्ठ बनाने का माध्यम।

यही शिक्षा जब प्रशासनिक तंत्र में कार्यरत अधिकारियों को प्राप्त होती है, तो उसका प्रभाव शासन-व्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जब शासन चलाने वाले ही मूल्यों और आदर्शों से शून्य शिक्षा से निर्मित हों, तो शासन और प्रशासन की स्थिति कैसी होगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इस प्रकार मूल्यविहीन शिक्षा अंततः समाज, शासन और राष्ट्र तीनों को ही दिशाहीन बना देती है।

इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि साधारण प्रतीत होने वाले व्यक्ति भी अपने कर्म, संकल्प और निरन्तर प्रयासों के बल पर इतिहास रच देते हैं। किंतु यदि केवल यह सोच लिया जाए कि हम इतिहास रचने जा रहे हैं और उसके अनुरूप पुरुषार्थ न किया जाए, तो कोई सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं होगा। इतिहास निर्माण का आधार मात्र विचार नहीं, अपितु धैर्य, परिश्रम, विश्वास और कर्तव्यनिष्ठ आचरण होता है।अतः हम पुरुषार्थ करें l हम चिर जवान हैं यह अनुभव करें l जवानी की उमंगें नये प्रतिमान बना देती हैं-


जवानी लक्ष्य के संधान की अनुपम कहानी है

शिखर से सिन्धु के तल की अमर पावन निशानी है

जवानी ने जगाया व्योम को पाताल को साधा

रही कोई न अग-जग में हटाई जो नहीं बाधा


इसके अतिरिक्त भैया वीरेन्द्र जी की क्या व्यथा थी,भैया पंकज जी क्या नित्य करते हैं जानने के लिए सुनें