अकेले तुम कैसे असहाय,
यजन कर सकते? तुच्छ विचार।
तपस्वी! आकर्षण से हीन,
कर सके नहीं आत्म-विस्तार।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 30 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६४६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२८
आत्मीय जनों की समस्याओं को हल करने का प्रयास करें
एकता प्रदर्शित करें
मनुष्य के लिए केवल अधिकाधिक ज्ञान अर्थात् अविद्या अर्जित करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि वह यह विवेक विकसित करे कि उसके जीवन के लिए वास्तव में क्या उपयुक्त, कल्याणकारी और सार्थक है। जैसे उसे यशस्विता की चाह रहती है l यह विवेक सहज रूप से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उसके लिए एक अनुशासित और सात्त्विक जीवन-पद्धति आवश्यक है। प्रातःकाल शीघ्र जागरण, शुद्ध आचार-विचार, संयमित दिनचर्या तथा सात्त्विक आहार-विहार के माध्यम से मन की निर्मलता और स्थिरता विकसित होती है।
ध्यान, धारणा और आत्मचिन्तन जैसे साधनों द्वारा व्यक्ति अपनी चंचल वृत्तियों को एकाग्र करता है और अध्ययन, स्वाध्याय तथा लेखन के माध्यम से अपने बौद्धिक संस्कारों को परिष्कृत करता है। किन्तु इन समस्त क्रियाओं का परम लक्ष्य केवल बाह्य कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आत्मस्थ होने का प्रयास है अर्थात् अपने भीतर निवास करने वाली आत्मा से साक्षात्कार करना। जब मनुष्य बाह्य विषयों से हटकर स्वयं के सान्निध्य में बैठने की क्षमता विकसित कर लेता है, तब उसे एक अद्भुत, शान्त और आनन्दमय अनुभूति होती है।
यदि इस आन्तरिक अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करने की क्षमता भी विकसित हो जाए, तो वह अभिव्यक्ति केवल कहने वाले के लिए ही नहीं, अपितु सुनने वाले के लिए भी आनन्द और प्रेरणा का स्रोत बन जाती है। यही कारण है कि औपनिषदिक चिन्तन अत्यन्त विशिष्ट और विलक्षण है, क्योंकि वह मनुष्य को बाह्य ज्ञान से आगे ले जाकर आत्मज्ञान की ओर उन्मुख करता है ईशोपनिषद् का एक छंद है..
तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
वह गति करता है और गति नहीं भी करता; वह दूर है और पास भी है,इस सबके भीतर है और इस सबके बाहर भी है।
मनुष्य की आन्तरिक प्रवृत्तियां और रुचियां जैसे-जैसे आकार लेती हैं, वैसे-वैसे वह स्वाभाविक रूप से उसी के अनुरूप वातावरण और संगति की आकांक्षा करने लगता है। जिस प्रकार की सोच, मूल्य और अभिरुचि व्यक्ति के भीतर विकसित होती है, उसी प्रकार के लोगों का साथ उसे सहज, उपयुक्त और प्रेरक प्रतीत होता है।यही आत्मविस्तार है l
यही हमारे जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए उन्मुख करता है l
हमारा सूत्र सिद्धान्त ही है *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः*
और हम स्वयं में सुधार करते हुए दूसरे को सुधारने का प्रयास करते हैं l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने नचिकेता और यमराज का उल्लेख क्यों किया शिक्षा में क्या आवश्यक है जानने के लिए सुनें