प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६२० वां* सार -संक्षेप
स्थान : ग्राम सरौहां
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०२
भावी पीढ़ी को अपने वास्तविक इतिहास से परिचित कराएं उसे मनुष्यत्व की अनुभूति कराएं
जो व्यक्ति सनातन धर्म को मानता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वी को ही अपने परिवार के रूप में देखता है। ऐसा व्यक्ति सच्चे अपनत्व की भावना से ओतप्रोत होता है और उससे विमुख रहना उसके स्वभाव में नहीं होता।
दुःख की घड़ी में जब अपने समीप होते हैं, तो वह दुःख कुछ कम प्रतीत होता है और सुख की अवस्था में अपनों की उपस्थिति उस सुख को और अधिक बढ़ा देती है। यह सनातन धर्म की आत्मीयता प्रधान, संवेदनशील और सहृदय दृष्टि है।
हम, जो सनातन धर्म के अनुयायी हैं और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण हैं, केवल आत्मसम्मान से जीना जानते हैं। हम किसी के आगे झुकते नहीं, अपितु अपने सत्य और धर्म के तेज से अन्याय को झुकाते हैं।जब अत्यन्त कठिन परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तो हम चाहे किसी दीवार में चुन दिए जाएँ, फिर भी अपने धर्म, कर्तव्य और विचार से समझौता नहीं करते। यह भारत भूमि, जो सनातन संस्कृति की जननी है, न केवल अपने मूल्यों की रक्षा करती है, अपितु जो भी शरण में आता है, उसकी भी पूरी निष्ठा से रक्षा करती है। यही इसकी महानता है।
मैं तेज पुंज, तमलीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश।
जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास?
शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन दे कर।
विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है यह इतिहास अमर।
यदि आज देहली के खण्डहर, सदियों की निद्रा से जगकर।
गुंजार उठे उंचे स्वर से 'हिन्दू की जय' तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!
वीरत, ज्ञान, भक्ति,वैराग्य,समर्पण, साधना की शिक्षा हमारा भारतवर्ष ही दे सकता है जिस जिज्ञासु को इन्हें प्राप्त करना है उसे सनातन धर्म अपनाना ही होता है
दुःखद यह है कि हमारे वास्तविक इतिहास को विदीर्ण करने की चेष्टा की गयी
इसी कारण शौर्य प्रमंडित अध्यात्म महत्त्वपूर्ण हो जाता है
हमें इसी का ध्यान रखना है हमें विभिन्न विकारों से दूर रहना है
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भाईसाहब का जीवन परिचय दिया जो कल हमारे बीच नहीं रहे