31.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 31 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४७ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 31 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२९

जिस कार्य को करें उसमें लीन हो जाएं

सफलता प्राप्त होगी

भारत देश के प्रति मन में समर्पण का भाव रखें इन सदाचार वेलाओं से भक्ति शक्ति संयम विचार स्वाध्याय आदि गुण ग्रहण करें


हम विवेकशील मनुष्यों को संतों के आचरण का अनुसरण करते हुए संसार की अव्यवस्थाओं से विचलित न होकर, उसमें निहित सद्गुणों को पहचानना और अपनाना चाहिए  तथा दोषों से स्वयं को निर्लिप्त रखना चाहिए। यही सदाचार वेला का मूल विषय है और इसके आधार पर विचार करते हुए जब हम आचार करेंगे तो भ्रमित और भयभीत नहीं होंगे  किन्तु  भगवान् की कृपा अत्यन्त आवश्यक है

*अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥*

यदि हमें सद्संगति प्राप्त हो जाए और हम अपने विलक्षण ज्ञान-गौरव  अर्थात् भारत के अद्भुत आर्ष साहित्य से सम्यक् रूप से युक्त हो जाएं, तो जीवन में आनन्द ही आनन्द है। ऐसी अवस्था में चित्त निर्मल होता है, विचार परिष्कृत होते हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि विकसित होती है। तब समस्याएँ अपने आप गौण हो जाती हैं और उनके समाधान सहज रूप से प्रकट होने लगते हैं। अतः सद्संगति का कोई भी अवसर हमें  छोड़ना नहीं चाहिए और अपने आर्ष साहित्य में विश्वास करते हुए रुचि बढ़ानी चाहिए तब हम जो भी कार्य करेंगे उसमें दुविधाग्रस्त नहीं रहेंगे 

जिस कार्य में मन की सहभागिता नहीं, उसे यदि बार-बार किया जाए तो वह कर्तव्य नहीं, ढोंग बन जाता है। ऐसे कर्म में न तो आनंद होता है, न ही फल की शुद्धता।

इसीलिए शास्त्र कहते हैं—

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

इसके अतिरिक्त किसके लिए आचार्य जी ने कहा कि वह मनस्वी नहीं है उन्नाव के महाविद्यालय और दीनदयाल विद्यालय में अध्यापन में आचार्य जी ने क्या अन्तर रखा,औरास टाउन एरिया के राष्ट्रीय विद्यालय में आचार्य जी का क्या पद है, सई नदी का उल्लेख क्यों हुआ  जानने के लिए सुनें