1.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४८ वां* सार -संक्षेप

 हम अंधेरे को भगाने का उपक्रम कर रहे थे 

क्यों अचानक भा गयी तुमको अमावस

हम बसंतोत्सव की तैयारी में निरत थे

तुम्हें क्यों अच्छा लगा दलदली पावस


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३०

हम अपना जीवन निष्ठा के साथ हिन्दू समाज के संगठन, उसके प्रबोधन एवं सामाजिक-जातिगत विषमताओं को समाप्त करके एकरस समाज के निर्माण के लिए समर्पित करें

प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 

परिवार भाव विकसित करें जिससे भारतवर्ष की प्रतिष्ठा वृद्धिंगत हो



जातिगत ऊँच-नीच एवं अस्पृश्यता को समाप्त करने की दिशा में  एक अद्भुत समरसता मंत्र है

 

“हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्.

मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता..”

 

अर्थात् समस्त हिन्दू परस्पर सहोदर हैं; उनमें कोई भी न तो नीच है और न ही पतित माना जा सकता है। हिन्दुओं की रक्षा करना मेरा दृढ़ संकल्प है और समानता ही मेरा मूल मंत्र है। हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है, अतः हमें सभी के साथ समभाव और सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

हमारी विशेषता इस तथ्य में निहित है कि हम एक परिवार की भावना से संयुत हैं, जबकि अन्य देशों में यह पारिवारिक आत्मीयता प्रायः नहीं दिखाई देती, जिसके कारण वहाँ के लोग अधिकतर मानसिक व्याकुलता और चिन्ता में रहते हैं। वे समूह में तो रहते हैं किन्तु परिवार के रूप में नहीं रहते l उनमें विश्वास का अभाव रहता है l यह परिवार का भाव विचार बोध विश्वास भारतवर्ष की प्राणशक्ति है l हम भारतवर्ष की, अपने युगभारती परिवार की परिवार भावना को सुरक्षित रखने के लिए संकल्पित हों l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कुम्भ मेले का उल्लेख क्यों किया भैया मनीष कृष्णा जी की चर्चा क्यों हुई *विषय को पढ़ते हुए क्यों हुए विषयी* से क्या तात्पर्य है  योग और परिवार क्या पर्यायवाची शब्द हैं जानने के लिए सुनें l