क्या छोड़ूँ क्या पकड़ लूँ , आश्रय सभी अबूझ।
ज्ञान अलभ्य सुदूर है, न ही भक्ति की सूझ ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६२१ वां* सार -संक्षेप
स्थान : ग्राम सरौहां
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०३
यह देश मेरा धरा मेरी गगन मेरा,
इसके लिए बलिदान हो प्रत्येक कण मेरा
इस भारत-भक्ति के पथ पर चलें यही सुपथ है
इस संसार के रहस्य अत्यन्त अद्भुत हैं अनेक ग्रंथों के माध्यम से इन्हें बताने का प्रयास किया गया है भगवान् कृष्ण अर्जुन को इन्हें कैसे कैसे समझाते हैं यह गीता में सुस्पष्ट किया गया है इन्हें जानने से हमें निश्चित रूप से शक्ति प्राप्त होती है
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।
जीवन में अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुरूप अपने धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है। भले ही उसमें कुछ त्रुटियाँ हों, फिर भी वही लाभदायक और कल्याणकारी होता है।
कामनारूप वैरी द्वारा ज्ञान आच्छादित हो जाता है अपने कल्याण की प्राप्ति के कारणरूप उस ज्ञान और विज्ञान को यह काम नष्ट करने वाला है अतः इसका परित्याग आवश्यक है
जब मनुष्य आत्मा की शक्ति को पहचानकर अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रण में रखता है, तब वह इस कठिन काम रूपी शत्रु को पराजित कर सकता है
इन छंदों के तत्त्व को जो व्यक्ति जान लेता है और उसे व्यक्त करने की क्षमता जिसमें आ जाती है वह प्रेम और आकर्षण का पात्र बन जाता है तत्त्व है कि मैं न जन्मता हूँ, न मरता हूँ। मैं न कोई रूप रखता हूँ, न किसी रूप में बंधता हूँ। मैं तो केवल एक निर्विकल्प, निराकार, परम सत्य चैतन्य स्वरूप हूँ।
तन बिसार कर जगत में , जीता स्थितप्रज्ञ।
गीताज्ञान अमोघ यह, पाए कैसे अज्ञ ॥
आचार्य जी ने महाराणा प्रताप और मानसिंह में क्या अन्तर बताया भाईसाहब को किस बात पर क्रोध आ गया था जानने के लिए सुनें