6.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 6 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२२ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 6 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२२ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०४

आत्मदृष्टि और संसार -दृष्टि में सामञ्जस्य बैठाते हुए भयभीत न होते हुए समाज और देश के लिए कटिबद्ध हों  (जब हनुमान जी की कृपा छाया हमारे ऊपर है तो भय कैसा)


मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।


मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।7.7।।


भगवान् श्रीकृष्ण इस छंद में अपने परमात्म-स्वरूप को स्पष्ट करते हुए अर्जुन से कहते हैं कि इस सम्पूर्ण सृष्टि में उनसे परे कोई दूसरा परम तत्त्व नहीं है। सृष्टि में जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य रूप में विद्यमान है, वह सब उसी एक परम तत्त्व में ही स्थित और उसी से जुड़ा हुआ है।


जिस प्रकार माला के प्रत्येक मोती एक अदृश्य धागे  से जुड़े होते हैं और वह धागा ही पूरे गहने को एक रूप देता है l 

 अर्थात् परमात्मा ही समस्त जगत् का आधार हैं। वे ही सर्वव्यापी, सर्वाधार और सर्वोच्च तत्त्व हैं।

हम सब लोग उन्हीं पर आश्रित हैं l उन्हें जानना ही अध्यात्म की पूर्णता है।


निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥


निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥

अध्यात्म में इस प्रकार का प्रवेश हमें आनन्द की अनुभूति करा देता है l

अन्यथा सांसारिकता में हम व्यथित ही होते हैं l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने त्रयोदशी के विषय में क्या बताया जानने के लिए सुनें