समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।
किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी
इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के
गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाए, गगन ने गिराए। (शम्भुनाथ सिंह )
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 7 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६२३ वां* सार -संक्षेप
स्थान : ग्राम सरौहां
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०५
हमें अपने जीवन को सत्कर्मों और सात्त्विक चिन्तन के माध्यम से परिशुद्ध करते रहना चाहिए, जिससे हम स्वयं भी उन्नत हों देश और समाज के लिए भी प्रेरणा बन सकें।
मनुष्य का जीवन केवल भोग-विलास अथवा सांसारिक प्रयोजन के लिए नहीं है, अपितु यह आत्म-विकास, आत्मशुद्धि और परमात्म-साक्षात्कार के लिए प्राप्त हुआ है।
मनुष्य देह प्राप्त कर कभी न दैन्य को वरो l
यह कर्म -योनि है स्वकर्म धर्म मानकर करो ll
अतः हमें चाहिए कि हम अपने आचरण, विचार, व्यवहार और भावनाओं को शुद्ध बनाने का निरन्तर प्रयास करते रहें।अपने अंदर की दुर्बुद्धि, विकार, अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि दोषों का परित्याग करके विद्या, तप, दान, सत्य, करुणा, प्रेम, क्षमा, संयम, सेवा, श्रद्धा,भक्ति, शक्ति, शौर्य, पराक्रम आदि गुणों का विकास करें।
येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति । ।
-चाणक्य नीतिशास्त्र [10.7]
यह प्रक्रिया एक दिन में नहीं होती, यह निरन्तर अभ्यास, आत्मनिरीक्षण, साधना और विवेक से ही संभव है। यही अवतारत्व है l हमने जो लक्ष्य बनाया है उसके अनुसार हम भारत राष्ट्र के जाग्रत पुरोहित हैं
"तू भारत का गौरव है¸
तू जननी–सेवा–रत है।
सच कोई मुझसे पूछे
तो तू ही तू भारत है॥46॥
तू प्राण सनातन का है
मानवता का जीवन है।
तू सतियों का अंचल है
तू पावनता का धन है॥47॥
यदि तू ही कायर बनकर
वैरी सiन्ध करेगा।
तो कौन भला भारत का
बोझा माथे पर लेगा॥48॥...
थक गया समर से तो तब¸
रक्षा का भार मुझे दे।
मैं चण्डी–सी बन जाऊं
अपनी तलवार मुझे दे।"॥52॥
हमें इसी अपने वास्तविक इतिहास को जानने की आवश्यकता है
इसके अतिरिक्त हमें भड़ैंती में क्या नहीं गंवाना चाहिए आचार्य श्री ठाकुर चन्द्रपाल जी का उल्लेख क्यों हुआ, हमें सफल अभिनेता क्यों बनना चाहिए जानने के लिए सुनें