प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 9 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६२५ वां* सार -संक्षेप
स्थान : ग्राम सरौहां
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०७
शक्ति, बुद्धि,भावना, विचार, संकल्प, संयम को उनकी आवश्यकतानुसार उपयोग करते हुए प्रयोग करते हुए अपने जीवन को देश और समाज के हित में उपयोगी बनाएं
परमात्मा ने जो यह सृष्टि रूपी लीला-धाम रचा है, उसमें हम सब उसके लीला-पात्र हैं परमात्मा का आनन्द ही इस सृष्टि का मूलस्वर है, और वही आनन्द जीवात्मा का भी स्वाभाविक लक्ष्य है । जब हम इस लीला को समझते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि जन्म और मरण ( जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करता है। यह शिक्षा हमें मृत्यु से भयमुक्त करती है और जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है ),निर्माण और विनाश, सब उसी दिव्य विधान के अंग हैं इसलिए जीवन की घटनाएँ चाहे जैसी हों, वे केवल परिवर्तनशील हैं, परन्तु उनके मूल में स्थित परम आनन्द अपरिवर्तनशील और सनातन है।
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ll
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 8)
हे देवगण!
हम अपने कानों से मंगलमय वाणी सुनें, हमारी आँखें पुण्यदर्शी हों,
हमारे अंग स्थिर और सबल हों,
और हम, बलशाली शरीर के साथ, आपके लिए योग्य आयु तक जीते हुए यज्ञ और सत्कर्म करते रहें।यह मंत्र एक आदर्श मानव जीवन की कल्पना करता है — जहाँ इन्द्रियाँ संयमित, शरीर स्वस्थ और जीवन ईश्वर व समाज के कल्याण में समर्पित हो।
*ऐसा अद्भुत आधार है हमारी शिक्षा का l*
हम प्रायः कहते हैं
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु।
मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः कहना वेदों और उपनिषदों की परंपरा में एक अत्यंत गूढ़ और शुभ प्रार्थना है। इसे त्रिविध तापों' से मुक्ति की कामना के रूप में बोला जाता है
शान्ति, सद्भावना आदि व्यक्ति को समस्याओं से मुक्ति प्रदान करते हैं शान्ति की कामना मनुष्य का मनुष्यत्व है
और शान्ति बिना शक्ति के संभव नहीं
हिंदु युवकों आज का युग धर्म शक्ति उपासना है ॥
इसके लिए संगठन आवश्यक है और संगठन का आधार है प्रेम और आत्मीयता
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने डा जी एन वाजपेयी जी की चर्चा क्यों की, morning glory का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें