2.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३१

राष्ट्र के हम जाग्रत पुरोहित बनें और इसके लिए संगठित अवश्य रहें


हम जिस काल को भूलवश *गुलामी का काल* कह देते हैं, वस्तुतः वह हमारे निरंतर संघर्ष का काल था। हम कभी  पराधीन हुए ही नहीं, हम सदैव संघर्षशील रहे। अनेक झंझावातों और विपत्तियों से गुजरने के उपरान्त भी हमारा सनातन धर्म जीवित बना रहा।

किन्तु खेद का विषय है कि वह आज पूर्णतः जाग्रत नहीं है। आचार्य जी निरंतर प्रयत्नशील हैं कि हम सब अपने पुरुषार्थ की जड़ता समाप्त करें,समर्पित हों,निज सुख त्यागें,हम अपनी भावनाओं का ज्वार प्रकट करें,सनातन धर्म के जागरण का संकल्प लें और उसके पुनरुत्थान का दायित्व अपने हाथों में उठाएँ। 

जाग्रत न होने का कारण यह है कि हम दुविधा में रहते हैं भयभीत और भ्रमित रहते हैं पंडित दीनदयाल जी की यह अभिलाषा थी कि समाज में व्याप्त भय और भ्रम का निवारण हो तथा जनमानस सत्य, स्पष्टता और आत्मविश्वास की दिशा में उन्मुख हो। किन्तु उनकी जघन्य हत्या के कारण यह साधना अपूर्ण रह गई। अपनी दुविधा का निवारण कर यह तथ्य हमारी स्मृति में सदैव अंकित रहना चाहिए कि उस साधना को पूर्णता तक पहुँचाना हमारा परम लक्ष्य है।


आचार्य जी ने बूजी को मध्यमवर्गीय क्यों कहा, युगभारती केन्द्रीय कार्यकारिणी, जो युगभारती का मेरुदंड है, के लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया, ७. ६. ११ का उल्लेख क्यों हुआ, भैया अशोक त्रिपाठी जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें