शरीर है कुटी कि या महल महान है
समय के साथ साथ यह चलायमान है
शरीर भर नहीं कि हम वो आत्मतत्व हैं
ज्ञान भक्ति शक्ति युक्त नित्य सत्व हैं।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी/ नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 10 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६५७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३९
युगभारती हमें ऐसी साधनाशक्ति दे कि हम कर्म में प्रवृत्त हों ताकि समाज को हमसे आश्वासन मिल सके उसे भय भ्रम न रहे, हम धर्म को समझें और मर्म तक की यात्रा का उपाय करें
हमारे कल्याण के लिए हमें शक्ति भक्ति बुद्धि तप त्याग समर्पण आदि गुणों से संपन्न बनाने के लिए हमें यह अनुभव कराने के लिए कि हमारे भीतर परमात्मा विराजमान है तो हमें भय और भ्रम नहीं होना चाहिए, आचार्य जी नित्य अद्भुत भावों के साथ हमें प्रबोधित कर रहे हैं यह भगवान् की कृपा है
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ।।
हम विश्वास के साथ प्रार्थना करते हैं कि जैसे भगवान् राम और लक्ष्मण ने राक्षसों का संहार कर धर्म की रक्षा की, वैसे ही वे हमारी भी रक्षा करें।
जब भी हम भगवान् राम का स्मरण करते हैं, तो हमारे मन में उनका वनवासी रूप ही अधिक सजीव होकर उभरता है। राजसिंहासन पर विराजमान राम से अधिक प्रभावशाली वह राम हैं, जिन्होंने वन की कठोर परिस्थितियों में रहते हुए भी मर्यादा, धैर्य, करुणा, त्याग,शौर्य, पराक्रम और धर्म का अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया।
वनवास का जीवन किसी राजकुमार के लिए अत्यंत कष्टकर हो सकता था, किन्तु श्रीराम ने इसे कर्तव्य और धर्मपालन का अवसर मानकर सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने पिता की आज्ञा और वचन की मर्यादा की रक्षा के लिए राज्य, वैभव और सुख-सुविधाओं का परित्याग किया। यह त्याग केवल व्यक्तिगत नहीं था, अपितु समस्त मानवता को यह संदेश देने वाला था कि धर्म के लिए सुखों का त्याग भी छोटा है।
भगवान् राम के परम भक्त हनुमान जी सदैव कर्म में निरत रहने वाले हैं। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण सेवा, परिश्रम और समर्पण का आदर्श प्रस्तुत करता है। वे किसी भी परिस्थिति में निष्क्रिय नहीं रहते, अपितु अपने आराध्य के कार्य को ही जीवन का परम उद्देश्य मानकर सतत प्रयत्नशील रहते हैं।
उनके भीतर न भय का स्थान है, न भ्रम का। भय इसलिए नहीं कि उन्हें अपने सामर्थ्य और प्रभु-कृपा पर अटूट विश्वास है और भ्रम इसलिए नहीं कि उनका मन लक्ष्य के प्रति पूर्णतः एकाग्र है।
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