11.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष नवमी/ दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५८ वां* सार

 कविं पुराणमनुशासितार


मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।


सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप


मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष  नवमी/ दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 11 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४०


११ फ़रवरी की स्मृति हमें पं दीनदयाल जी के जीवन-मूल्यों

सरलता, सेवा, नैतिकता और राष्ट्रनिष्ठा को पुनः स्मरण करने का अवसर देती है। उनके विचार आज भी हमें समाजहित देशहित और आत्मानुशासन की दिशा में प्रेरित करते हैं। हम अपने घरों में कार्यस्थलों में दीनदयाल जी का चित्र, अखंड भारत का चित्र अवश्य लगाएं


आचार्य जी नित्य प्रयास करते हैं हमें प्रेरित करने के लिए ताकि हम व्याकुलता, पीड़ा और चिंता से ग्रस्त न रहें हम अपने भीतर स्थित वास्तविक तत्त्व, अर्थात् आत्मस्वरूप का दर्शन करने का प्रयास करें। प्रातःकाल का समय इस आत्मचिंतन और आत्मजागरण के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है।जब हम शांत चित्त से अपने अंतर्मन का अवलोकन करेंगे, तब हमें अपने भीतर की शक्ति, शांति और स्पष्टता का अनुभव होने लगेगा l

ऐसी अवस्था में  हम साधक अपने संकल्पों की सिद्धि की दिशा में सफल प्रयास कर सकेंगे l


अर्जुन  साधक की वास्तविक समस्या को सामने रखते हुए कहते हैं।


चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।


तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।6.34।।


 मन की प्रकृति ही गति, परिवर्तन और विषयों की ओर दौड़ना है। वह कभी एक स्थान पर नहीं ठहरता। वह हमें स्मृतियों, इच्छाओं, भय, कल्पनाओं और वासनाओं में उलझाकर स्थिर नहीं रहने देता।

तो भगवान्  मोहांध अर्जुन का मार्गदर्शन करते हुए कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।हम भी अभ्यास और वैराग्य द्वारा अपने मन को वश में करें l


कुछ स्मृतियाँ समय की धूल से ढँक जाती हैं, पर कुछ ऐसी होती हैं जो हर वर्ष किसी दिन मन के द्वार पर आकर धीरे से दस्तक देती हैं। ११ फ़रवरी एक वेदनापूर्ण तिथि के रूप में स्मरण की जाती है। सन् १९६८ में इसी दिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का पार्थिव शरीर मुगलसराय (अब दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) के समीप पाया गया था। दीनदयाल जी अपने अत्यंत सौम्य, सरल और मृदुभाषी स्वभाव के लिए विख्यात थे। वे सत्ता, पद या व्यक्तित्व प्रदर्शन से दूर रहकर विचार और आचरण की शुचिता को अधिक महत्व देते थे। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण का उदाहरण माना जाता है।

उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन प्रस्तुत किया, जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन की बात कही गई। उनके लिए राजनीति केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक संवेदना पहुँचाने का साधन थी—जिसे वे “अंत्योदय” के भाव से व्यक्त करते थे।


इसके अतिरिक्त भैया विनय अजमानी जी, भैया सुधीर अवस्थी जी, भैया कृष्ण कुमार तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ,आचार्य जी ने विद्यालय में ११ फरवरी की स्मृतियों का चित्रण जो हमें भावुक कर देता है करते हुए क्या कहा,जानने के लिए सुनें