9.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 9 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५६ वां* सार -संक्षेप

 संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥4॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 9 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३८

परिस्थितियाँ अनुकूल हों या प्रतिकूल,हम अपने प्रयत्नों में शिथिलता न लाएं। इन्द्रप्रस्थ में होने जा रहे अधिवेशन के लिए जुट जाएं l


हमारी आर्ष परम्परा अद्भुत है जो कहती है कि हमें अपने जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि विकारों का त्याग करते हुए अपने मन को शुद्ध और संयमित रखना चाहिए। इसके साथ-साथ उत्तम, कल्याणकारी और विवेकपूर्ण विचारों को अपनाकर निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए l हम अपने कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा से करे, किंतु कर्मों के फल में आसक्ति न रखें। सफलता और असफलता, लाभ और हानि, मान और अपमान से ऊपर उठकर समभाव बनाए रखते हुए कर्म करें l हमें परमात्मा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का सजग भाव से अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए तथा अपने आचरण, विचार और साधना के द्वारा स्वयं को उन शक्तियों का योग्य पात्र बनाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने एक मार्मिक प्रसंग जैन धर्म के महान् संत आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज (1872–1955) जिन्होंने २०वीं शताब्दी में दिगंबर जैन मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया था, का बताया वो प्रसंग क्या था भैया मनीष कृष्णा जी भैया पंकज जी भैया शुभेन्दु जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें