12.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 12 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४१

शिक्षा पर गम्भीर चिन्तन आवश्यक है


आचार्यजी, जो हमारे लिए अत्यन्त श्रद्धेय हैं, के भीतर हम लोगों को प्रेरित करने का विलक्षण सामर्थ्य विद्यमान है। उनके अनुसार यह सामर्थ्य निश्चय ही हनुमानजी की कृपा का प्रसाद है।अत्यन्त प्रभावकारिणी अभिव्यक्तियों द्वारा आचार्य जी हमारे भीतर उत्साह,ऊर्जा, श्रद्धा और सद्प्रेरणा जाग्रत करने का हमारे व्यक्तित्व को राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी करने का जो सतत प्रयत्न कर रहे हैं, हमें उसका यथोचित लाभ उठाना चाहिए।


आगामी राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए हमने शिक्षा को ही मुख्य विषय के रूप में निर्धारित किया है, क्योंकि वर्तमान समय में शिक्षा की दशा और दिशा दोनों ही गंभीर चिंतन की अपेक्षा रखती हैं। आज की शिक्षा-पद्धति हमें अपने बच्चों के माध्यम से प्रत्यक्ष अनुभव में आती है और इसी अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि उसमें अनेक सुधारों की आवश्यकता है।

हम स्वयं भी अनेक बार अशांत और व्याकुल अनुभव करते हैं, हम धन के पीछे अंधाधुंध दौड़ लगाते हैं

यह सत्य है कि धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है, परंतु जब वही साधन लक्ष्य बन जाता है, तब मनुष्य निरंतर उसी की प्राप्ति के पीछे दौड़ता रहता है। इस दौड़ में वह मानसिक शांति, संतुलन, संबंधों की मधुरता और आंतरिक संतोष जैसे महत्त्वपूर्ण मूल्यों की उपेक्षा करने लगता है।धन की बुभिक्षितता उचित नहीं है


त्यजेत् क्षुधार्ता महिला स्वपुत्रं खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् ।

बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति ॥ ६० ॥


जब बुभिक्षितता अर्थात् भूख अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है, तब वह स्वाभाविक ममता, करुणा और नैतिकता को भी पराजित कर सकती है। जैसे एक भूखी स्त्री अपने पुत्र का त्याग कर सकती है, और भूखी सर्पिणी अपने अंडों को खा सकती है, वैसे ही अत्यधिक भूखा मनुष्य ऐसा कोई भी अनुचित कर्म कर सकता है, जो सामान्य अवस्था में वह कभी न करता। अभाव और दुर्बलता की स्थिति में मनुष्य की संवेदनाएँ क्षीण हो जाती हैं।


 हमारी  वर्तमान शिक्षा ने हमें जीवन के संतुलन, धैर्य और आंतरिक स्थिरता का समुचित संस्कार नहीं दिया। अतः शिक्षा पर गंभीर विचार-विमर्श कर उसके उद्देश्यों, पद्धति और मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करना अत्यंत आवश्यक है।


प्राचीन भारतीय शिक्षा यह बताती है कि शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि जीवन का परिष्कार है। गुरुकुल व्यवस्था और उपनिषदों के उपदेशों ने ऐसे व्यक्तित्व गढ़े, जिनके कारण भारत ज्ञान, संस्कृति और मूल्यबोध में अग्रणी रहा।

इसी आदर्श को समझना और वर्तमान शिक्षा में उसके तत्वों का समावेश करना,जिससे व्यक्ति समाज और राष्ट्र की समस्याओं को परखे,सुलझाए

 आज उतना ही आवश्यक है।


दत्तात्रेयी वृत्ति क्या है भैया कृष्ण कुमार तिवारी जी भैया पुनीत जी भैया अरविन्द जी भैया मोहन जी का उल्लेख क्यों हुआ, दीनदयाल जी के साहित्य के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें