[13/02, 07:23] Praveen: तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब , मैं निज दोष कछू नहिं गोयो ।
डासत ही गइ बीति निसा सब , कबहुँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥
मन की चंचलता,अहंकार और अंतर्मन के विकारों के कारण गहरी शांति नहीं मिली
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४२
हम लोग व्यक्ति से व्यक्तित्व की यात्रा में रत रहें समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी भाव के साथ
हमारी शिक्षा मनुष्य को भीतर से गढ़ने की प्रक्रिया थी l शिक्षा का केंद्र मन, बुद्धि, चित्त और चरित्र था, केवल सूचना, कौशल या उपार्जन नहीं।
प्राचीन भारतीय दृष्टि, जिसका सुस्पष्ट निरूपण तैत्तिरीय उपनिषद्
(ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः । आदि )
जैसे ग्रंथों में मिलता है, शिक्षा को आत्म-विकास की साधना मानती है। वहाँ पढ़ना मात्र जानना नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को पहचानना, उन्हें दूर करना और श्रेष्ठ गुणों को जाग्रत करना था l विद्यार्थी को सत्य, धैर्य, विनय, सेवा और संयम की ओर प्रवृत्त किया जाता था। मन को चंचलता से स्थिरता की ओर ले जाना शिक्षा का भाग था।तर्क, विवेक, उचित अनुचित की पहचान विकसित की जाती थी, ताकि व्यक्ति विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय ले सके l ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, लोभ जैसे विकारों को कम करना और करुणा, मैत्री, कृतज्ञता जैसे भावों को बढ़ाना सिखाया जाता था।जो सीखा, वह व्यवहार में उतरे—यही कसौटी थी। ज्ञान का मूल्य चरित्र से आँका जाता था। विद्या का उद्देश्य यह समझना था कि मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं, बल्कि एक चेतन सत्ता है। इस बोध से जीवन में संतुलन और शांति आती है।
इस प्रकार शिक्षा बाहर से जानकारी भरने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि भीतर छिपी संभावनाओं को तराशने की कला थी जैसे शिल्पी पत्थर को तराशकर मूर्ति प्रकट करता है। शिक्षा उसी शिल्प का नाम थी, जो मनुष्य के भीतर छिपे श्रेष्ठ स्वरूप को उजागर कर दे।
दुर्भाग्य से ऐसी विलक्षण शिक्षा से हम वंचित रह गये l
[13/02, 07:41] Praveen: तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब , मैं निज दोष कछू नहिं गोयो ।
डासत ही गइ बीति निसा सब , कबहुँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥
मन की चंचलता,अहंकार और अंतर्मन के विकारों के कारण गहरी शांति नहीं मिली
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४२
हम लोग व्यक्ति से व्यक्तित्व की यात्रा में रत रहें समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी भाव के साथ
हमारी शिक्षा मनुष्य को भीतर से गढ़ने की प्रक्रिया थी l शिक्षा का केंद्र मन, बुद्धि, चित्त और चरित्र था, केवल सूचना, कौशल या उपार्जन नहीं।
प्राचीन भारतीय दृष्टि, जिसका सुस्पष्ट निरूपण तैत्तिरीय उपनिषद्
(ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः । आदि )
जैसे ग्रंथों में मिलता है, शिक्षा को आत्म-विकास की साधना मानती है। वहाँ पढ़ना मात्र जानना नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को पहचानना, उन्हें दूर करना और श्रेष्ठ गुणों को जाग्रत करना था l विद्यार्थी को सत्य, धैर्य, विनय, सेवा और संयम की ओर प्रवृत्त किया जाता था। मन को चंचलता से स्थिरता की ओर ले जाना शिक्षा का भाग था।तर्क, विवेक, उचित अनुचित की पहचान विकसित की जाती थी, ताकि व्यक्ति विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय ले सके l ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, लोभ जैसे विकारों को कम करना और करुणा, मैत्री, कृतज्ञता जैसे भावों को बढ़ाना सिखाया जाता था।जो सीखा, वह व्यवहार में उतरे—यही कसौटी थी। ज्ञान का मूल्य चरित्र से आँका जाता था। विद्या का उद्देश्य यह समझना था कि मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं, बल्कि एक चेतन सत्ता है। इस बोध से जीवन में संतुलन और शांति आती है। उस शिक्षा से हम अपने को जानने में समर्थ हो जाते थे l
इस प्रकार शिक्षा बाहर से जानकारी भरने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि भीतर छिपी संभावनाओं को तराशने की कला थी जैसे शिल्पी पत्थर को तराशकर मूर्ति प्रकट करता है। शिक्षा उसी शिल्प का नाम थी, जो मनुष्य के भीतर छिपे श्रेष्ठ स्वरूप को उजागर कर दे।
दुर्भाग्य से ऐसी विलक्षण शिक्षा से हम वंचित रह गये l वर्तमान शिक्षा हमें भौतिकता में उलझा देती है आनन्द से दूर कर देती है l इस कारण शिक्षा पर चिन्तन मनन अत्यन्त आवश्यक है l
आचार्य जगपाल जी द्वारा गाये गीत *तरुण तेरे तेज का आह्वान है* को सुनकर कौन से अध्यापक रोने लगे थे,धर्मसभा में विवेकानन्द किस प्रकार भिन्न थे, आचार्य जी ने कुर्ते का कपड़ा क्यों नहीं लिया,संकटों में मुस्कराने के हम कैसे अभ्यासी हो जाते हैं जानने के लिए सुनें