प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४४
ईश्वरत्व तक पहुंचने के प्रयास में विघ्न बाधाओं से भयभीत न हों और लक्ष्य प्राप्ति तक रुकें नहीं
आचार्यजी निरन्तर यह प्रयास करते हैं कि वे स्वयं भी और हम सब भी भय, विघ्न तथा बाधाओं से सुरक्षित रहें। हम सबकी मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होती रहे, तथा हम पुरुषार्थपूर्वक सतत प्रयत्नशील रहें।
वे चाहते हैं कि हमारा अध्ययन केवल शब्दों तक सीमित न रहे, अपितु पढ़ा हुआ ज्ञान हमारे जीवन में प्रकाश, विवेक और सद्बुद्धि का संचार करे, हमारे आचरण को उत्कृष्ट बनाए, हमें समाजोन्मुख और राष्ट्रोन्मुख करे,हम जान लें कि हमारा वास्तविक अस्तित्व शाश्वत है नाश केवल देह का होता है, आत्मा का नहीं क्योंकि जब यह अनुभूति हो जाती है कि “मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ”, तब जीवन में धैर्य, साहस और समत्व का भाव उत्पन्न होता है।
हम लोग स्वदेशभक्त हैं यह अनुभूति जब स्वभाव बन जाती है तो हम अपने देश को माता कहकर पुकारते हैं हम संपूर्ण प्रकृति से भी आत्मीय भाव प्रदर्शित करते हैं
हमारा वैदिक साहित्य अद्भुत है यजुर्वेद में यज्ञीय विधान हैं और उसमें पद्यात्मक के साथ गद्यात्मक मंत्र भी मिलते हैं यज्ञ हमारे जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं यह कोरोना काल में भी सिद्ध हुआ
यदि हम केवल इन्द्रियसुख और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में ही लिप्त रहेंगे, तो मनुष्य जन्म पाकर भी मनुष्यता के वास्तविक आनंद से वंचित रह जाएंगे।अतः हमें मनुष्यत्व की अनुभूति करनी चाहिए l
एषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाः चरन्ति॥
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने इन्द्रप्रस्थ और लखनऊ की बैठकों की चर्चा क्यों की भैया मोहन जी और भैया वीरेन्द्र जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें