जो समाज के लिए जिंदगी जीते हैं
परहित में विष-प्याला हँसकर पीते हैं।
आजीवन समाज-हित करते रहते हैं,
मस्त मगन संन्यस्त भाव में बहते हैं ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४५
हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपने भावों विचारों को पवित्र रखें और अपनी भक्ति को निष्काम बनाएं
विश्व भारतवर्ष की अनुकृति करेगा
तब विधाता विश्व का संकट हरेगा
संसार में विविध प्रकार के संकट सदा से रहे हैं और आगे भी रहेंगे । जीवन संघर्ष का नाम है। परिस्थितियाँ कभी अनुकूल होती हैं तो कभी प्रतिकूल किन्तु उनसे जूझने का सामर्थ्य पुरुष में ही होता है
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो।
पुरुष क्या, पुरुषार्थ हुआ न जो;
हृदय की सब दुर्बलता तजो।
प्रबल जो तुममें पुरुषार्थ हो—
सुलभ कौन तुम्हें न पदार्थ हो?
प्रगति के पथ में विचरो उठो;
पुरुषार्थी मनुष्य वह है जो साहस, धैर्य, विवेक और परिश्रम से युक्त हो। भारतीय संस्कृति में ‘पुरुषार्थ’ का विशेष महत्त्व है l
हमारा भाव, हमारे विचार, हमारी भक्ति और हमारा विश्वास सदा इस महान् संस्कृति से संयुक्त रहें—इसी उद्देश्य से आचार्यजी निरंतर प्रयासरत रहते हैं। वे जानते हैं कि भारतीय संस्कृति केवल बाह्य आडंबर या परंपराओं का नाम नहीं है, अपितु वह जीवन को उच्च आदर्शों से जोड़ने वाली एक दिव्य अनुभूति है। भारत की संस्कृति मूलतः यज्ञमयी है। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र या वैदिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और परोपकार की भावना है। यज्ञमयी जीवन का तात्पर्य है स्वार्थ का परित्याग कर लोकमंगल के लिए जीना। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि जीवन का वास्तविक मूल्य उपभोग में नहीं, अपितु अर्पण में है।
इस संस्कृति में असार और सार का स्पष्ट विवेक कराया गया है। संसार के भौतिक आकर्षण, क्षणभंगुर सुख और बाह्य उपलब्धियाँ असार हैं, क्योंकि वे नश्वर और परिवर्तनशील हैं। इसके विपरीत सत्य, धर्म, प्रेम, करुणा और आत्मज्ञान ही जीवन के सार तत्व हैं, जो शाश्वत और कल्याणकारी हैं।
भारतीय दर्शन यह भी प्रतिपादित करता है कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा सनातन है। इसी सत्य का बोध होने पर मनुष्य जीवन को उच्च दृष्टि से देखता है और मोह, भय तथा आसक्ति से मुक्त होने का प्रयास करता है।
अतः आचार्यजी का सतत प्रयास यही है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपने विचारों को पवित्र रखें, अपनी भक्ति को निष्काम बनाएं और अपने विश्वास को सनातन सत्य पर आधारित करें। जब हमारा जीवन भारतीय संस्कृति के इन मूल्यों से अनुप्राणित होगा, तभी हम व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों स्तरों पर सच्चे अर्थों में समृद्ध और संतुलित जीवन जी सकेंगे।
इसके अतिरिक्त यक्ष प्रश्न क्या है,युगभारती के संविधान की चर्चा क्यों हुई, भैया मोहन जी,भैया वीरेन्द्र जी, भैया विभास जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें