आंधियां जोर की चलती हों
उल्काएं रूप बदलती हों
धरती अधैर्य धर हिलती हो
अपनों की सुमति न मिलती हो
तब जय श्रीराम पुकार उठो
पुरखों का तेज निहार उठो
हनुमन्त तेज को धार उठो
जय जय का स्वर उच्चार उठो
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६५० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३२
भारत अद्भुत विभूतिमत्ता को प्राप्त करे इसके लिए हमें निर्लिप्त भाव से प्रयास करते रहना है
चन्द्रगुप्त गढ़ने की साधना में रत आचार्य जी नित्य हमें प्रेरित करते हैं यह हमारा सौभाग्य है जीवन में जब भी प्रचंड विपत्तियाँ उपस्थित हों, परिस्थितियाँ अस्थिर और भयावह प्रतीत हो रही हों और स्वजन समझ-बूझ का साथ न दे रहे हों तो भी ऐसे विषम समय में धैर्य खोने के स्थान पर हम देशभक्तों को आत्मबल को जाग्रत करना चाहिए। हनुमान जी के अदम्य बल, निष्ठा और उत्साह को धारण कर, विजय और उत्साह का स्वर स्वयं में और वातावरण में भर देना चाहिए l हमें कभी भ्रमित नहीं होना चाहिए क्योंकि हम ईश्वर के ही अंश हैं और ईश्वर
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
गीता के अठारह अध्याय के समान ही हैं ईशोपनिषद् के अठारह छंद
इस उपनिषद् में बताया गया है कि जीवन संपदा का उपभोग मर्यादा पूर्वक करें विभूतियों और संपदाओं के अभिमान से मुक्त रहें l निर्लिप्त भाव से कार्य करें l
इसके अतिरिक्त हमारी साधना क्या है समाधि स्वर क्या है आचार्य जी की किससे भाव भरी वार्ता हुई जानने के लिए सुनें