साधको! सिद्धि के लिए न व्याकुल हो बिल्कुल,
साधना जिंदगी का आनन्द अनोखा है।
अपने साधक ऋषियों का जीवन याद करो,
दुनिया के अँधियारे का अद्भुत ओखा* है ॥
(*प्रकाश आने वाला झरोखा)
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६५१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३३
जगत में ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्त न कर सकते हों यह अनुभूति निर्भय होकर करें और राष्ट्र की विभूतिमत्ता को वृद्धिंगत करने की दिशा में अपने पग बढ़ा लें
हमारा राष्ट्र विलक्षण है।
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
यहाँ सत, रज और तम तीनों गुणों का सूक्ष्म विवेचन और संतुलित समन्वय हुआ है। मानव जीवन की पवित्र और दिव्य आचार-संहिता का निर्माण इसी भूमि पर हुआ। यहाँ नश्वर और शाश्वत, असार और सार के भेद का स्पष्ट ज्ञान कराया गया है।
इस परंपरा में कर्तव्यपालन को ही कर्म का स्वरूप और धर्म का आधार माना गया है। संतोष,तप, त्याग, तपस्या, साधना, विश्वास, सद्भाव, समन्वय और परस्पर सहयोग से युक्त जीवन को ही सत्कर्म का मार्ग समझा गया है। धर्माधारित आचरण को श्रेष्ठ जीवन का मानदंड स्वीकार किया गया है। संयम को जीवन का कवच माना गया है, जो व्यक्ति को पतन से बचाकर उत्थान की दिशा देता है।
हम जड़ जगत में भी चैतन्य के दर्शन करते हैं और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना को अपने विचारों में स्थान देते हैं। यह अनुभूति हमारे भीतर दृढ़ है कि समस्त अस्तित्व एक ही तत्त्व की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।
साथ ही हमारे देश की संस्कृति में शौर्य और शक्ति को अलंकार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इन्हीं गुणों की दिव्य अनुभूति से प्रेरित होकर भगवान् श्रीराम ने असंख्य दुष्टों का विनाश किया l हम इसी रामत्व की अनुभूति करें। यह भाव हमें निर्भय, धैर्यवान्, सत्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण बनाएगा। जब यह रामत्व हमारे अंतःकरण में जाग्रत होगा,जब हम यह अनुभव करेंगे कि हम तत्त्व हैं उसी परमात्मा के अंश हैं तब हमारे भीतर से भय, भ्रम और दुर्बलता आदि दुर्गुण स्वतः दूर हो जाएंगे, और हम धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित होंगे l
इसके अतिरिक्त कलयुग पुनः आ गया किसने कहा,दादागुरु की चर्चा क्यों हुई, मञ्जूषा में असंख्य ब्रह्मा किसने देखे जानने के लिए सुनें