प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६५२ वां* सार
-संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३४
हर परिस्थिति में अन्याय के प्रतिकार, धर्म की रक्षा और अपने दायित्व के निर्वाह के लिए मानसिक, नैतिक और शारीरिक रूप से तैयार रहें सिद्धि को विस्मृत कर निर्लिप्त भाव से साधनारत हों
राष्ट्र-प्रेम की उदात्त भावना के साथ राष्ट्र की विभूतिमत्ता में अभिवृद्धि का संकल्प लेते हुए हम लोगों को सन्मार्ग पर चलाने का आचार्य जी का संकल्पित प्रयास प्रतिदिन इन सदाचार वेलाओं से परिलक्षित हो रहा है हम साधकों को संघर्षों में अडिग रहने की प्रेरणा मिल रही है यह भगवान् की कृपा है l
आचार्य जी प्रायः इंगित करते हैं कि जब भी आश्रय खोज रहे हों कोई विषय सुस्पष्ट न हो रहा हो हम विषम परिस्थितियों में घिरे हों तो हमें रामचरित मानस का आश्रय लेना चाहिए l
रामकथा के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी, जिनमें रामभक्ति के प्रति अनुरक्ति की पराकाष्ठा रही, ने हम सबको प्रबोधित किया है क्योंकि वे भी अनेक विषम परिस्थितियों को झेलकर भाव और भक्ति में रमे हैं लेकिन उनके भाव और उनकी भक्ति शक्ति से कभी दूर नहीं रही
भगवान् राम का धनुष सदैव सन्नद्ध रहा है भगवान् राम का रामत्व अद्भुत है उनकी व्यापकता विलक्षण है हमें उनकी भक्ति और शक्ति को आत्मसात् करना चाहिए
निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥
आचार्य जी ने इस ओर भी संकेत किया कि जीवन की घटनाओं को तटस्थ भाव से देखना ही शान्ति और आध्यात्मिक परिपक्वता का मार्ग है।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या स्वप्न देखा किसके लिए सब कुछ नया है, भैया वीरेन्द्र जी और भैया गोपाल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें