6.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 6 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५३ वां* सार

 “शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषामिति।

वेदाङ्गानि षडैतानि वेदस्याहुर्मनीषिणः॥”


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 6 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३५

आचार्य जी हम लोगों में नित्य प्रेम का प्रवाह प्रविष्ट करा रहे हैं अतः हम मानसपुत्रों का कर्तव्य है कि भारतराष्ट्र को सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक और सामाजिक उत्कर्ष से युक्त करने के प्रयास हम करते रहें l


यह संसार विषय-वासनाओं और विविध आकर्षणों का विस्तृत क्षेत्र है। हमारे सम्मुख असंख्य विकल्प उपस्थित रहते हैं—कुछ ऐसे, जो हमें ऊर्ध्वगामी बनाते हैं, और कुछ ऐसे, अधोगति की ओर ले जाते हैं। जो विषय मन, बुद्धि और आचरण को संयम, शुद्धता और विवेक की दिशा में प्रेरित करें, वे उन्नतिकारक हैं और जो विषय चित्त को चंचल, आसक्त तथा अविवेकी बनाएं, वे पतनकारक हैं।हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों के लिए  आवश्यक है कि हम विषय-चयन में सावधान रहें। हम ऐसे विषयों को ग्रहण करें जो आत्मबल को पुष्ट करें, ज्ञान-विवेक को प्रखर बनाएं और चरित्र को सुदृढ़ करें l समाज और राष्ट्र के लिए हितकारक हों l हमारे राष्ट्र की विशेषता रही है कि उसने ऋषियों द्वारा प्रतिपादित, अनुभूत और अभिव्यक्त किए गए दिव्य ज्ञान-साहित्य को युगानुकूल रूप देकर समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुँचाया। वेद, उपनिषद्, स्मृतियाँ, दर्शन, महाकाव्य, पुराण और लोकाचार—सभी में आर्ष परम्परा का सुस्पष्ट प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है। यहाँ ज्ञान केवल बौद्धिक साधना न होकर आत्मोन्नति और लोककल्याण का साधन बना l रामचरित मानस ने अद्भुत ढंग से लोककल्याण किया है l उसकी रचना-शैली, भाषा-प्रवाह, भाव-गाम्भीर्य और शास्त्रीय आधार को देखकर सहज ही अनुमान होता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने विविध शास्त्रों, पुराणों, उपनिषदों तथा लोकपरम्पराओं का अत्यन्त गंभीर अध्ययन किया था। उनके काव्य में जहाँ एक ओर दार्शनिक गहराई है, वहीं दूसरी ओर लोकजीवन की सहज सरसता भी विद्यमान है। यह समन्वय केवल व्यापक अध्ययन और दीर्घ साधना से ही संभव है तुलसीदास के अंतःकरण में बाल्यावस्था से ही रामकथा के प्रति गहरी आस्था और अनुराग विद्यमान था। ऐसा प्रतीत होता है कि रामकथा उनके जीवन में बाह्य ज्ञान के रूप में नहीं, अपितु आन्तरिक संस्कार के रूप में प्रविष्ट हुई थी। उसी संस्कार ने परिपक्व होकर ‘रामचरितमानस’ जैसे अमर ग्रन्थ का रूप लिया l

भैया पंकज अवस्थी जी की चर्चा क्यों हुई,

वो सज्जन कौन थे जो गणित के प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ होने पर अपना पर्स लेने चले गये,तुलसीदास जी को किसने मानसपुत्र माना था  भैया पंकज श्रीवास्तव जी ने सरल भाव में क्या लिख लिया है जानने के लिए सुनें