प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 8 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६५५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३७
हमारे ऋषि-कुल का अनुपम संविधान संपूर्ण संसार स्वीकारे इसके लिए हम अपनी सोच को सकारात्मक रखते हुए प्रयास करते रहें
जब अपने इष्ट की कृपा होती है, तब हमारे अंतःकरण में स्वाभाविक रूप से शुभ भावनाएं, सात्त्विक विचार और कल्याणकारी प्रेरणाएं जाग्रत होती हैं। यह कृपा निरंतर एक-सी नहीं बनी रहती, कभी उसका अनुभव प्रखर होता है, तो कभी क्षीण l अतः जिन क्षणों में हम अपने भीतर ऐसी दिव्य प्रेरणा, शुद्ध भाव और उत्तम विचारों का उदय अनुभव करें, उन क्षणों का हमें पूर्ण सदुपयोग करना चाहिए।
ऐसे पवित्र भाव और सद्विचार हमें निष्क्रिय नहीं रहने देंगे, बल्कि हमें कुछ सार्थक, कल्याणकारी और लोकहितकारी कार्य करने की प्रेरणा दे देंगे । इन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर हम अपने जीवन को अर्थपूर्ण बना लेंगे और समाज/राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। जब कर्म सात्त्विक भावों से प्रेरित होते हैं, तब उनकी सार्थकता केवल व्यक्तिगत सीमा तक नहीं रहती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक होकर समस्त समाज और संसार में प्रतिष्ठित होता है।
भगवान् श्रीराम का जीवन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके समक्ष भी विविध प्रकार की विषम परिस्थितियां थीं, संसार की जटिलताएं थीं, बाधाएं थीं,तथापि उन्होंने तप, त्याग, शौर्य, धैर्य और धर्मनिष्ठा का जो अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया, वह युगों-युगों तक स्मरणीय और अनुकरणीय बना हुआ है। उनके जीवन की महिमा इसी में है कि उन्होंने हर परिस्थिति में अपने दिव्य भावों को कर्म में परिणत किया, अपने लक्ष्य को ओझल नहीं किया
अतः जब भी हमारे भीतर शुभ भावों की प्रेरणा जाग्रत हो, उसे केवल अनुभव तक सीमित न रखकर कर्म में परिणत करना ही अपने इष्ट का, आचार्य जी का वास्तविक सम्मान और सदुपयोग है। क्योंकि आचार्य जी भी नित्य इन वेलाओं के माध्यम से हमें जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं हमें मोहांधता भय भ्रम त्यागने के लिए कह रहे हैं हमें ज्ञान भक्ति उपासना की अनुभूति करा रहे हैं हमारे भीतर की प्रच्छन्न शक्तियों को जगाने का कार्य कर रहे हैं हमें अपने उस वास्तविक इतिहास, *जिसमें आत्मबल ज्ञानबल और शौर्यबल का अद्भुत संगम है जिसके विचारों में प्रकाश है आचरण में दृढ़ता है और संकटों के बीच भी उठ खड़े होने की क्षमता है जो यह दर्शाता है कि अनेक आक्रमणों विपत्तियों और चुनौतियों के बावजूद सांस्कृतिक चेतना कभी मंद नहीं हुई*,को जानने का उत्साह दे रहे हैं यही मार्ग हमें भी जीवन की सार्थकता की ओर अग्रसर करता है।
इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी से किस विषय पर कल आचार्य जी की वार्ता हुई, भैया आशीष जोग जी का उल्लेख क्यों हुआ, कवि चिराग जैन के काव्यपाठ के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, मेघनाथ का क्या दुर्भाग्य रहा जानने के लिए सुनें