5.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७१ वां सार

 तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५३

लेखन एक योग है इसे अपने जीवन में अवश्य महत्त्व दें 


मन का मनका टूट रहा है,

बेगाना जग छूट रहा है l

इस मन को कैसे समझाऊं,

कांचा घट अब फूट रहा है  ll 

जब मृत्यु या शरीर के क्षीण होने का समय निकट आता दिखाई देता है तब मनुष्य को अनुभव होता है कि संसार की वस्तुएँ स्थायी नहीं हैं  केवल ईश्वर, आत्मा और सत्कर्म ही शाश्वत हैं।

या जब विवेक का उदय होता है तो मनुष्य समझने लगता है कि संसार का उपयोग तो किया जा सकता है, परन्तु उसे जीवन का अंतिम आश्रय नहीं बनाया जा सकता। और इस प्रकार वह आत्मचिन्तन, सत्संग, भक्ति और धर्म की ओर उन्मुख होता है।

जब तन केवल भोग में और मन केवल इच्छाओं में उलझ जाता है, तब अशान्ति उत्पन्न होती है। परन्तु जब तन सेवा में, मन भक्ति में और बुद्धि विवेक में स्थित होती है, तब जीवन आनन्दमय बन जाता है।

श्रीरामचरितमानस  जीवन को सही ढंग से जीने की कला सिखाने वाला ग्रन्थ है l सुन्दरकांड का पाठ हमारा अभिप्रेत है l 


सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥

भगवान् श्रीराम कहते हैं कि जो मनुष्य सगुण स्वरूप में भगवान् की उपासना करते हैं, सदैव दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति और धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं तथा जिनके हृदय में ब्राह्मणों, विद्वानों और ज्ञानपरम्परा के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम होता है, वे मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय हैं।


जो व्यक्ति ईश्वर-भक्ति के साथ समाज-हित,राष्ट्र -हित,मर्यादा, अनुशासन और सद्जनों के सम्मान को अपनाता है, वही भगवान् का सच्चा भक्त कहलाता है।॥


भैया पुनीत जी, भैया अरविन्द जी, श्री सुनील मिश्र जी का उल्लेख क्यों हुआ, तन मन धन के स्थान पर तन मन के साथ GUN का उल्लेख कौन करता था,सगुणोपासक कैसा विश्वासी होता है जानने के लिए सुनें

4.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७० वां* सार

 अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।

आयुहीन भए सब तबहीं॥

साधु अवग्या तुरत भवानी।

कर कल्यान अखिल कै हानी॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५२

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की  अनुभूति कर अनन्त आनन्द के साथ अपने राष्ट्र के अनन्त आनन्द को वृद्धिंगत  करें 



मनुष्य की वाञ्छाएँ प्रायः कभी पूर्ण नहीं होतीं। एक इच्छा की पूर्ति होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है, इसलिए वह प्रायः अतृप्त ही बना रहता है। किन्तु यदि किसी महापुरुष, संत या सज्जन की सन्निधि से मन को शान्ति, आनन्द और संतोष की अनुभूति होने लगे, तो उसे ईश्वर की विशेष कृपा समझना चाहिए। क्योंकि संसार की वस्तुएँ तृष्णा बढ़ाती हैं, जबकि सत्संग मन को तृप्ति और परम शान्ति प्रदान करता है। यह सदाचार वेला सत्संग का ही एक प्रकार है l अभावों के मध्य इस संगति का प्रभाव अद्भुत है l


जिस प्रकार हिमालय बाह्य रूप से हिममय होते हुए भी भीतर अग्निमय शक्ति का स्रोत है, उसी प्रकार सत्संग से प्राप्त शान्ति भी निष्क्रियता नहीं, बल्कि संयमित शक्ति, जाग्रत चेतना और धर्मनिष्ठ जीवन का आधार है। 

अटल बिहारी वाजपेयी जी हिमालय को इसी दृष्टि से देखते हुए कहते हैं 


कौन कह रहा उसे हिमालय?

वह तो हिमावृत्त ज्वालागिरि,

अणु-अणु, कण-कण, गह्वर-कन्दर,

गुंजित ध्वनित कर रहा अब तक

डिम-डिम डमरू का भैरव स्वर ।

गौरीशंकर के गिरि गह्वर

शैल-शिखर, निर्झर, वन-उपवन,

तरु तृण दीपित ।


शंकर के तीसरे नयन की-

प्रलय-वह्नि से जगमग ज्योतित।

जिसको छू कर,

क्षण भर ही में

काम रह गया था मुट्ठी भर ।


हिमालय भारतीय संस्कृति के तप, त्याग, शौर्य, पराक्रम और आत्मबल का विराट् प्रतीक है। उसके शिखर हमें निर्भीक बनने, अन्याय के सामने अडिग खड़े रहने, अपनी दुर्बलताओं पर विजय पाने तथा राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए सदैव सजग रहने की प्रेरणा देते हैं। उदाहरणार्थ इस समय कालनेमियों से सजग रहने की अत्यन्त आवश्यकता है l हिमालय का मौन स्वर मानो यह संदेश देता है कि जीवन में शीतलता और करुणा के साथ-साथ आवश्यकता होने पर शिव के समान तेज, साहस और संहारक शक्ति भी धारण करनी चाहिए। राष्ट्र की अद्भुत निधि तुलसीदास जी ने भी यही संदेश दिया l उन्हीं के रचित ग्रंथ में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं l सुन्दरकांड का प्रसंग चल रहा है l 

भक्त विभीषण कहते हैं 


तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥


मनुष्य को वास्तविक शान्ति, संतोष और कल्याण संसार की वस्तुओं या इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि कामनाओं का त्याग कर भगवान के भजन और सत्संग से प्राप्त होता है। रामभक्ति ही मन को शोक, चिन्ता और अशान्ति से मुक्त करती है l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,

हनुमान जी के विग्रह में आयी किस विरूपता की आचार्य जी ने चर्चा की, श्रद्धेय बचनेश जी ने कौन सा प्रसंग बताया था, भैया पुनीत जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l

3.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६९ वां* सार -संक्षेप

 सुसमर्थ सनातन धर्म जगत का जीवन है, 

वैश्विक कल्याण इसी का मंगल चिंतन है, 

इसके विपरीत सभी मत जीवन-शैली हैं, 

ये सब परजीवी अमरबेलि सी फैली हैं। 

हम सभी सनातनधर्मी हिन्दू जाग्रत हों, 

पहचानें, अपने तत्वबोध से अवगत हों, 

बल बुद्धि पराक्रम वाली शिवसाधना करें,

भारतमाता की सच्ची आराधना करें ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५१

हम मनुष्य हैं अतः मनुष्यत्व की अनुभूति करें 

श्रीरामचरितमानस का अवगाहन करें जो केवल एक ग्रन्थ नहीं, अपितु जीवन का प्रकाशस्तम्भ है। इसका प्रत्येक प्रसंग मनुष्य को कर्तव्यबोध, आत्मविश्वास, धैर्य, भक्ति और लोकमंगल की प्रेरणा देकर उसे भीतर से शक्तिसंपन्न बनाता है।




संसार में संकटों का अभाव कभी नहीं रहा और न कभी रहेगा। चुनौतियों, संघर्षों तथा विपरीत परिस्थितियों के मध्य भी हमें प्रसन्नचित्त रहना, संयम बनाए रखना, निरन्तर स्वाध्याय करना तथा अपनी सामर्थ्य का विकास करना है ।आज आवश्यकता इस बात की है कि  भारत देश के राष्ट्रनिष्ठ हिन्दू समाज को आश्वस्त किया जाए कि चारों ओर केवल अन्धकार ही नहीं है। आशा, साहस और संकल्प की ज्योति आज भी प्रज्वलित है। उन्हें यह अनुभव कराना होगा कि भय, भ्रम और निराशा के वशीभूत होने की आवश्यकता नहीं है।

जब हम जैसे जागरूक और कर्तव्यनिष्ठ लोग दृढ़ता के साथ खड़े होते हैं, तब संकटों का अन्धकार स्वयं छँटने लगता है। अतः हमें आत्मबल, संगठन, सेवा, स्वाध्याय और पराक्रम की विधि व्यवस्थाओं के आधार पर समाज में विश्वास का वातावरण निर्मित करना है , जिससे प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर सके कि वह अकेला नहीं है; उसके साथ एक जाग्रत, संवेदनशील और उत्तरदायी समाज खड़ा है।

दूसरों के कार्यों का अनुकरण करने के स्थान पर अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही श्रेयस्कर है l और हमारा कर्तव्य है राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष l

सुन्दरकाण्ड का सार भी यही है कि संकटों के बीच हम स्वयं दीपक बनें और निराश समाज को यह विश्वास दिलाएं कि अन्धकार कितना भी घना हो, हनुमान जी जैसा साहस, भगवान राम जैसा आदर्श और धर्म जैसा प्रकाश आज भी हमारे साथ है।

विभीषण भगवान राम की शरण में आ चुके हैं 

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥



भगवान श्रीराम कहते हैं— यदि किसी व्यक्ति पर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या जैसे महापाप भी लगे हों, तब भी यदि वह मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसका त्याग नहीं करता। जब कोई जीव सच्चे हृदय से मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे सम्मुख आता है, उसी क्षण उसके करोड़ों जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।

सनमुख होइ' का अर्थ केवल शारीरिक रूप से भगवान के सामने आना नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भगवान की ओर मोड़ देना है। रामाश्रित हो जाना अद्भुत है l जैसे ही जीव ईश्वराभिमुख होता है, वैसे ही उसके भीतर का अज्ञान, पाप और अंधकार मिटने लगता है।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कालनेमि अभियान की चर्चा क्यों हुई, भैया सिद्धार्थ सिंह जी, भैया पुनीत जी, भैया पवन जी, भैया डा अवधेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

2.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६८ वां* सार -संक्षेप

 साधना सिद्धि के लिए जहाँ पर होती है 

विपदा अनगिन रूपों में विघ्न संजोती है 

संयम के पाँव स्वभाव छोड़कर हिलते हैं

नियमों के आगे वैकल्पिक पथ खुलते हैं 

साधना कुलाचारों में भटकी फिरती है 

सिद्धियाँ सुखों सुविधाओं से आ घिरती हैं

इसलिए साधको सिद्धिमुक्त साधना भजो 

कर्तव्य करो फल का व्यामोह विचार तजो l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५०

हम साधक समाजसेवा की साधना में रत रहें ताकि हर व्यक्ति  सुशिक्षित रहे स्वस्थ रहे स्वावलम्बी बने और सुरक्षित रहे किन्तु ध्यातव्य है कि फल और सिद्धि के मोह का त्याग कर निष्काम भाव से साधना करना ही साधक का धर्म है l


हनुमान जी सिद्धि-मुक्त साधना के सर्वोत्तम आदर्श हैं। उनके पास असीम बल, ज्ञान, पराक्रम और अनेक सिद्धियाँ थीं, फिर भी उन्होंने कभी सिद्धियों या फल की कामना नहीं की। उनका एकमात्र लक्ष्य था— प्रभु श्रीराम की सेवा और आज्ञापालन।

"राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।"

सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी का चरित्र सिद्धि-मुक्त साधना का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

आइये प्रवेश करें इसी सुन्दर कांड में 

विभीषण दरबार से अपमानित हो चुके हैं 


रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥

विभीषण रावण से कहते हैं—“श्रीराम सर्वसमर्थ हैं और उनका संकल्प कभी निष्फल नहीं होता। तुम्हारी सभा विनाश के प्रभाव में आकर सत्य और हितकारी बात को स्वीकार नहीं कर रही है। इसलिए अब मैं श्रीरघुवीर की शरण में जाता हूँ; इसके लिए मुझे दोष मत देना।”

विभीषण के ऐसा कहकर सभा से चले जाते ही रावण और उसकी सभा के लोगों की आयु तथा सौभाग्य क्षीण हो गया, अर्थात् उनका विनाश निश्चित हो गया। हे भवानी! सज्जन पुरुषों का अपमान या उनकी अवज्ञा तत्काल ही समस्त कल्याण का नाश कर देती है और अनेक प्रकार की हानियों का कारण बनती है।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ब्रह्मानन्द सहोदर किसे कहते हैं, भैया डा पङ्कज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ,कौन सी विचारधाराएं  हमें अशक्त बनाती हैं जानने के लिए सुनें l

1.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४९

आत्मविधान का दर्शन करते हुए जीवन में चलें 

जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप, अपने कर्तव्य, अपने मूल्यों और जीवन के परम लक्ष्य को समझकर चलता है, तभी उसका जीवन सार्थक, संतुलित और प्रकाशमय बनता है।



जिस व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ संस्कार प्रवेश कर जाते हैं, उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व रूपान्तरित हो जाता है। भक्ति के संस्कार, सद्विचारों के संस्कार, उत्तम व्यवहार के संस्कार तथा सत्त्व, रजस् और तमस् जैसी प्रवृत्तियों को संतुलित करने वाले संस्कार मनुष्य को महानता की ओर ले जाते हैं मनुष्य की महानता उसके पद, धन या बाह्य वैभव से नहीं, अपितु उसके संस्कारों की उत्कृष्टता से मापी जाती है। जिस व्यक्ति में जितने उच्च और पवित्र संस्कार होते हैं, वह उतना ही महान् होता है।

संस्कार विचारों का आधार होते हैं, चरित्र की नींव होते हैं और व्यवहार की शोभा होते हैं। संस्कार ही विचारों को दिशा देते हैं, भावनाओं को परिष्कृत करते हैं तथा आचरण को मर्यादित और आदर्श बनाते हैं।


अतः संस्कार मानव जीवन की वह अमूल्य निधि है, जो साधारण व्यक्ति को असाधारण बना सकती है और मनुष्य को मनुष्यता की सर्वोच्च ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है

किसी राष्ट्र की वास्तविक संस्कृति उसके साधारण नागरिकों के दैनिक आचरण में प्रतिबिम्बित होती है।

संस्कृति केवल ग्रन्थों, भवनों, कला-कृतियों या उत्सवों का नाम नहीं है। किसी समाज के सामान्य व्यक्ति का दैनिक व्यवहार, बोलचाल, शिष्टाचार, पारिवारिक सम्बन्ध, अतिथि-सत्कार, बड़ों के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण तथा नैतिक आचरण—ये सभी मिलकर उसकी संस्कृति को प्रकट करते हैं।


श्रीरामचरितमानस संस्कारों का अक्षय भण्डार है। यह मनुष्य को भक्ति, विनय, मर्यादा, सेवा, त्याग, कर्तव्य और सदाचार का पाठ पढ़ाता है।


पठए बालि होहिं मन मैला।

भागौं तुरत तजौं यह सैला॥

बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ।

माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥


सुग्रीव ने सोचा—

"यदि ये मन के कपटी और दुष्ट बालि द्वारा भेजे गए हों, तो मैं तुरन्त इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ।"

सुग्रीव की यह बात सुनकर हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण करके उन दोनों राजकुमारों के पास गए और मस्तक झुकाकर विनम्रतापूर्वक पूछने लगे।

हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?॥ आदि 

 इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज सुन्दर कांड के उस प्रसंग का उल्लेख किया  जब विभीषण, जिसमें संस्कार प्रविष्ट हैं,रावण को समझा रहे हैं 

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39क॥

हे दशानन! मैं बार-बार आपके चरणों में पड़कर विनती करता हूँ कि आप अपने अभिमान, मोह और घमण्ड का त्याग कर दें और अयोध्यापति श्रीराम का आश्रय ग्रहण करें।

किन्तु रावण को समझ में नहीं आता l

इसके अतिरिक्त देशदर्शन में उदयपुर की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की,परान्तर कोविद कौन हैं,हम सम्मान के पात्र कैसे हो सकते हैं,इंदौर की महान् महारानी अहिल्याबाई होल्कर का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l