प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 19 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४८
"युगभारती" माँ भारती की आरती का स्वर,
कि संयम शक्ति सेवा साधना का दीप है भास्वर l
दीनदयाल विद्यालय अन्य विद्यालयों के सदृश किसी साधारण उद्देश्य से नहीं, बल्कि एक पुनीत और राष्ट्रोद्धारक भावना से प्रारम्भ किया गया था। इसका ध्येय केवल विद्या प्रदान करना नहीं, अपितु ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना था जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल, आत्मविश्वासी और कभी पराजित न होने वाले सिद्ध हों। इस विद्यालय की व्यवस्था अत्यंत सुविचारित थी। यहाँ यह उद्देश्य रखा गया कि छात्र शक्ति, भक्ति, युक्ति, संयम, सद्विचार,स्वास्थ्य और स्वाध्याय के क्षेत्र में उच्चतम स्तर तक पहुँचे।
विद्यालय का वातावरण ऐसा निर्मित किया गया था कि विद्यार्थी केवल शैक्षिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और चारित्रिक दृष्टि से भी सुदृढ़ बनें। आचार्यों द्वारा विद्यार्थियों को प्रेम, आत्मीयता और मार्गदर्शन का स्नेहमय परिवेश प्रदान किया जाता रहा । जब शिक्षा के साथ ऐसा पवित्र और प्रेरणादायी वातावरण जुड़ जाता है, तब विद्यार्थियों के भीतर उत्कृष्ट भावों का उदय स्वाभाविक रूप से होता है और जहाँ उत्कृष्ट भाव जाग्रत होते हैं, वहाँ श्रेष्ठ परिणाम अवश्य प्राप्त होते हैं।और श्रेष्ठ परिणाम आये भी l
आज भी परम आदरणीय आचार्य श्री ओम शङ्कर जी हमारे भीतर उत्कृष्ट भावों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि हम शक्तिसंपन्न बनें साधना के चरम पर पहुंचने वाला मार्ग पकड़ लें उन्हें दुष्ट शक्तियों को पराजित करने वाले रामत्व की अनुभूति से युक्त राष्ट्रभक्त मिल सकें इसका वे सतत प्रयत्न कर रहे हैं
स्थान के प्रभाव से किस प्रकार का मनोभाव उत्पन्न हो जाता है इसके लिए आचार्य जी ने एक कथा सुनाई
एक बार श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को काँवर में बैठाकर तीर्थयात्रा करा रहे थे। मार्ग में एक स्थान से गुजरते समय उनके पैरों में पीड़ा होने लगी। शरीर थक गया। उसी क्षण उनके मन में क्षणिक विचार आया
“कैसा भारी बोझ है!”
माता-पिता ने तुरंत उनके मन की स्थिति भाँप ली कि उस स्थान का प्रभाव श्रवण के मन को विक्षुब्ध कर रहा है। “वृद्ध माता-पिता ने करुण स्वर में कहा — ‘पुत्र श्रवण! यदि संभव हो तो हमें थोड़ा और आगे ले चलो; हमारे मन में अभी यात्रा पूर्ण करने की आकांक्षा शेष है।’”
इसके पश्चात् जैसे ही वे उस स्थान से आगे बढ़े, उनका मन पुनः निर्मल और प्रसन्न हो गया। उन्हें माता-पिता का भार फिर कभी बोझ नहीं लगा।
रामानंद के बारह शिष्यों के नाम, एक प्रसिद्ध दोहे के अनुसार हैं:
अनंतानंद, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि। पीपा, भावानंद, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि॥
जिनमें सेन की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की ,भैया प्रखर श्रीवास्तव जी ( श्री जे पी जी के पौत्र )का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें