4.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 4 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६१

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संगठन का भाव अत्यन्त आवश्यक है मनुष्य वास्तविक अर्थ में मनुष्यत्व तभी प्राप्त करता है, जब वह संगठित होकर जीवनयापन करता है। एकाकी व्यक्ति की शक्ति सीमित होती है, परन्तु संगठन से उसकी समर्थता अनेक गुना बढ़ जाती है।

संगठन का भाव परस्पर विश्वास, सहयोग और समन्वय को जन्म देता है। इसी से उत्साह बना रहता है और सामूहिक चेतना जाग्रत होती है। जब लोग एक उद्देश्य से जुड़ते हैं, तब नये विचार उत्पन्न होते हैं, नयी योजनाएँ बनती हैं, नये कार्य आरम्भ होते हैं, नये व्यवहार विकसित होते हैं और नये अनुसंधान संभव होते हैं।

वस्तुतः कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। निष्क्रियता उसके स्वभाव के विपरीत है। संगठन उसे दिशा, प्रेरणा और सामर्थ्य प्रदान करता है, जिससे उसका कर्म अधिक प्रभावशाली और व्यापक बनता है।

हमारे शास्त्रों में भी यह सिद्धान्त प्रतिपादित है कि परमात्मा जब-जब अवतरित होते हैं, तब वे भी किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्म ही करते हैं जैसे एक अवतार हुए नृसिंह अवतार l 


नृसिंह रूप धरि प्रगट भए।

कनककसिपु करि मारा॥

कनककसिपु अर्थात् हिरण्यकशिपु जिनकी माता थीं दिति (दैत्यकुल की आद्या माता)  हिरण्याक्ष के वध के पश्चात् हिरण्यकशिपु ने कठोर तप कर वर प्राप्त किया और अत्यन्त अहंकारी तथा अत्याचारी बन गया।

हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे

प्रह्लाद, अनुह्राद, ह्राद और संह्राद l 

इनमें प्रह्लाद भगवान् विष्णु के परम भक्त थे, जबकि उनके अन्य तीनों भाई पिता की आज्ञा और दैत्य-परम्परा का ही अनुसरण करते थे।

प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उन्हें अनेक प्रकार से मारने का प्रयास किया, परन्तु वे प्रत्येक बार सुरक्षित रहे। अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे। होलिका को वर प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती।

वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी; परन्तु भगवान् की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका दग्ध होकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में होलिका-दहन का उत्सव मनाया जाता है।


होली उत्साह उमंगों का त्योहार सतयुगी स्मृति है, 

नर-जीवन का इतिहास तपस्वी अनुकृति है, 

हर पर्व देश का एक अनोखी शिक्षा है, 

हर शिक्षार्थी के लिए ज्ञान की भिक्षा है। 


इसके अतिरिक्त ह्राद और ह्लाद में क्या अन्तर है कयाधु (कयाधू ) कौन थीं, धुलेंडी क्या है जानने के लिए सुनें