31.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 31 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०६ वां* सार

 विधाता का प्रथम पावन सुमंगल यज्ञ है हिन्दू, 

कि वैदिक ज्ञान से परिपूर्ण जग का तज्ञ है हिन्दू। 

उठो भ्रम भय तजो कर्मानुरागी तत्व को जानो,

अरे ओ! हिन्दुओ जागो उठो हिन्दुत्व को मानो ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 31 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८८

हम युगभारती के सदस्य एक इकाई के रूप में जो भी समाजोन्मुखी कार्य करते हैं वह भी युगभारती के हित में ही है ऐसा मानकर हमें उस सदस्य को उत्साहित करना चाहिए l

पढ़ाई लिखाई का सदुपयोग भी आवश्यक है इसे समझने की चेष्टा करें और कर्मरत हो जाएं l

 


सोद्देश्यपूर्ण इन सदाचारमयी विचारों को सुनकर हमें अपने जीवन में उच्च आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर दृढ़ता से चलते हुए अन्याय और अत्याचार का साहसपूर्वक विरोध करना चाहिए तथा अपने आचरण को इतना शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना चाहिए कि वह  सनातनधर्मी समाज के लिए भी अनुकरणीय बन सके।

हमने अपना लक्ष्य बनाया है 

"राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष "


हम हिन्दू हैं हिन्दू केवल एक पहचान नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष और आत्मसम्मान की गौरवपूर्ण परंपरा का प्रतीक है। यह उस जीवन दृष्टि का नाम है जो कठिनाइयों के बीच भी अपने धर्म, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा करते हुए आगे बढ़ती है। हिन्दू परंपरा विश्व में अपने विजयशाली इतिहास और श्रेष्ठ आचरण के कारण प्रसिद्ध रही है। यह अन्याय और अत्याचार को सहन करने वाली नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध खड़े होकर उसका प्रतिरोध करने वाली शक्ति का नाम है। साथ ही, जो सनातन धर्म के विरोध में खड़ा होता है, उसके विरुद्ध दृढ़ता और सामर्थ्य के साथ आवाज उठाना भी हिन्दू होने का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।

सतत संघर्ष की गौरव-कथा का नाम हिन्दू है,

जगद्विख्यात दिग्विजयी प्रथा का नाम हिन्दू है।

किसी अन्याय अत्याचार का प्रतिरोध हिन्दू है,

सनातनधर्म द्रोही का सशक्त विरोध हिन्दू है ॥


समूचे विश्व का कल्याणकामी एक हिन्दू है, 

जगत में ख्यात मानव जाति भर में नेक हिन्दू है। 

महाज्ञानी विधानी सत्यसंधानी प्रखर हिंदू, 

भ्रमित जग को भ्रमों से दूर करता है मुखर हिन्दू ॥


इसके अतिरिक्त आदर्शोन्मुख यथार्थवाद क्या है, भैया अजय शंकर जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

30.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०५ वां* सार -संक्षेप

 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।


सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।।

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८७

मिलने जुलने का हेतु सात्विक बनाएं 


आचार्य जी नित्य प्रयास करते हैं कि हमारे भीतर जड़त्व कम से कम मात्रा में रहे और चेतनत्व में वृद्धि हो  यह हमारा सौभाग्य है हमें इसका लाभ उठाना चाहिए 


धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥


धर्म के ये दस लक्षण केवल शास्त्रों में वर्णित सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि जीवन को संतुलित, सफल और सार्थक बनाने के साधन हैं। ये शक्ति के सूत्र हैं और विश्वास के आधार हैं l हमें समय-समय पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि ये गुण हमारे जीवन में कितने सक्रिय हैं। यदि हम इन्हें अपने आचरण में उतार लें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन सुधरेगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी अधिक नैतिक और समृद्ध बनेगा।

आचार्य जी ने अपनी युगभारती प्रार्थना की भूमिका स्पष्ट की 

प्रार्थना में  कहा गया है कि यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है, इसलिए मनुष्य को लोभ छोड़कर, आवश्यकतानुसार ही उपभोग करते हुए, धर्मपूर्वक जीवन जीना चाहिए।साधक निःस्वार्थ भावना से कहता है कि मुझे न स्वर्ग की इच्छा है, न सांसारिक सुखों की, बल्कि मैं केवल प्राणियों के दुःख दूर करना चाहता हूँ । इसमें सभी प्राणियों के सुखी, निरोग, शुभदर्शी और दुःखमुक्त होने की प्रार्थना भी की गई है l 


धर्म और संस्कृति 

एक विवेचना 

लेखक :रंगाहरि


(लोकहित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित)

का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य जी ने भैया मनीष जी भैया अरविन्द जी भैया प्रदीप जी भैया विवेक गुप्त जी के नाम क्यों लिए प्रार्थना और मन्त्र में क्या अन्तर है 

भगवान् राम का नाम लेने से जैसे 

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।

जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ 27॥

क्या प्राप्त होगा जानने के लिए सुनें l

29.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०४ वां* सार -संक्षेप

 ज्ञान, भक्ति, कर्म, विचार, भाव इस संसार के रत्नाकर के रत्न हैं हम इन्हीं में से किसी रत्न के पारखी बनकर उसे सुरक्षित रखने का प्रयास करें तो यह हमारी विशेषता होगी और इसके लिए.....


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८६


 हम नित्य का जीवन संस्कारित करें हम अपने भीतर उतरकर साधना, चिंतन,सत्संग आदि के माध्यम से ज्ञान, भक्ति, भाव, विचार, कर्म आदि गुणों को जाग्रत करें , तो हमारा जीवन स्वयं एक अमूल्य रत्न बन जाएगा l



हम प्रायः यह समझ लेते हैं कि केवल अध्ययन, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, निदिध्यासन, लेखन, सत्संगति जैसे शब्दों को जानना ही पर्याप्त है, परन्तु वास्तविकता यह है कि जब तक इन भावों में भीतर से प्रवेश नहीं होता, तब तक आत्मशक्ति का बोध नहीं हो सकता।आज के जीवन में व्यस्तता, समयाभाव और सफलता की तीव्र दौड़ ने मन को अत्यन्त व्यग्र बना दिया है। हम असफलता से बचने के लिए इतना चिंतित रहते हैं कि भीतर की शांति और स्थिरता को ही खो देते हैं। यह व्यग्रता ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है, क्योंकि इससे आत्मबल डगमगाने लगता है।

वास्तव में आत्मबल तब सुदृढ़ होता है जब यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि परमात्मा हमारे भीतर ही विराजमान है l 

यह नाम रूपात्मक जगत है नाम के साथ रूप के कार्य संयुत रहते हैं भगवान् राम का नाम केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि आदर्श जीवन की सम्पूर्ण प्रेरणा को जगा देता है। जैसे ही उनका नाम मन में आता है, उनके चरित्र के सभी प्रसंग सामने आ जाते हैं जैसे उनकी सत्यनिष्ठा, मर्यादा, त्याग, करुणा और अडिग संकल्प।

भगवान राम का स्मरण हमें यही प्रेरणा देता है कि लक्ष्य व्यापक हित का होना चाहिए l तुलसीदास जी कहते हैं 


सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।

नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥ 22

  जिस मनुष्य का मन  किसी भौतिक वस्तु, पद, प्रतिष्ठा या सुख की चाह में नहीं भटकता, बल्कि पूर्णतः भगवान श्रीराम की भक्ति में ही रम जाता है। तो उसका हृदय प्रेम से भरा एक शांत, गहरा सरोवर बन जाता है, और उसमें राम-नाम का मधुर रस अमृत के समान प्रवाहित होता रहता है। उसका मन उस सरोवर में विचरण करने वाली मछली की तरह हो जाता है—जो उसी में जीती है, उसी में आनंद पाती है और उससे अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकती।



आचार्य जी ने द्राक्षा -भक्षण उत्सव की चर्चा क्यों की, कृत्य रत्नाकर पुस्तक के किस भाग का उल्लेख हुआ, भैया प्रखर श्रीवास्तव जी का नाम किस प्रसंग में आया, राम नाम बैंक क्या है जानने के लिए सुनें

28.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०३ वां* सार -संक्षेप

 मैं कवि हूँ अपनी कविता का संदेश सुनाता हूँ

हैं जहाँ कहीं भी शोले उनकी राख हटाता हूँ ।।

बलिदान सपूतों के सपनों में जब भी आते हैं

हँसते दिल के अंगारे पर आँसू बढ़ जाते हैं

सीमाओं के सौदे होते आँगन में गद्दारी

तप त्याग भाषणों में दिल में पलती है मक्कारी

इस कुसमय में भी सदा राग भैरव ही गाता हूँ || १ ||

मैं कवि हूँ....


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८५

परिशुद्ध भावों के साथ स्वार्थ त्यागकर हम अपने कर्म को पहचानें और उसे धर्म मानकर हनुमान जी की शरण लेकर गतिमान हो जाएं 



हमें केवल ज्ञान या केवल कर्म में नहीं, बल्कि दोनों में संतुलन बनाकर चलना चाहिए। जिस प्रकार व्यवहारिक जीवन के लिए अविद्या आवश्यक है उसी प्रकार आत्मिक उन्नति के लिए विद्या भी आवश्यक है। जब दोनों का समन्वय होगा , तभी हमारा जीवन पूर्ण और सार्थक बनेगा l

आज वास्तव में जीवन में अनेक प्रकार का अंधकार दिखाई दे रहा है—मूल्यों का अभाव,मनुष्य के दुष्कर्मों के कारण और मनुष्य द्वारा मनुष्यत्व की अनुभूति न करने के कारण से आतंकित पर्यावरण, अस्ताचल देशों द्वारा थोपी गयी उद्देश्यहीन शिक्षा, घर -घर में संस्कारों का अभाव और अपनी परम्पराओं से दूरी। गुरुकुल की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं थी, बल्कि वह जीवन को संपूर्ण रूप से गढ़ने वाली व्यवस्था थी। उसमें चरित्र निर्माण, आत्मसंयम, प्रकृति के साथ सामंजस्य, गुरु के प्रति श्रद्धा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व—इन सबका समन्वय होता था। हमें उसी शिक्षा की आवश्यकता है l

हम आत्मविश्वास जाग्रत करें उस अध्यात्म की अनुभूति करें जिसका उद्देश्य हमें दुर्बल बनाना नहीं, बल्कि  भीतर से इतना सशक्त बनाना कि कठिन परिस्थितियों में भी हम सत्य का साथ दे सकें और कर्तव्य निभा सकें l

हम अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन निदिध्यासन में रत हों l 

हम वह सुपात्र बनें जिसे परमात्मा खोज रहा है तो निश्चित रूप से हमारे सनातनधर्मी समाज का हमारे राष्ट्र भारत का कल्याण होगा l


प्रेमभूषण जी महाराज Trucks की चर्चा क्यों कर रहे थे, हरमेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

27.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०२ वां* सार -संक्षेप

 रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं 


भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी । 

हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी ll


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८४

आगामी अधिवेशन का जो हमारा विषय है शिक्षा उस पर चर्चा अवश्य करें , लेखन भी प्रारम्भ कर दें 



भारतवर्ष ऐसा दिव्य विलक्षण स्थान है जहां किसी न किसी रूप में महापुरुष अवतार लेते हैं और अपना अमिट प्रभाव छोड़ जाते हैं महापुरुषों के अवतार तथा भारत की आर्ष परम्परा, यह सिद्ध करती है कि जब-जब मानव जीवन दिशा से भटकता है, तब-तब दिव्य पुरुष और ऋषि-मुनि जन्म लेकर अपने ज्ञान, तप और आदर्शों से समाज को पुनः सही मार्ग पर स्थापित करते हैं भारत की आर्ष परम्परा ऐसी दिव्य धारा है, जिसमें ऋषियों ने अपनी साधना के बल पर शाश्वत सत्य का अनुभव किया और उसी अनुभूत ज्ञान को वेदों के रूप में मानवता को प्रदान किया l ऐसी  विशिष्ट शक्ति  है साधना l 


साधना,संघर्ष संयम की कहानी 

साधना, संतोष शुचिता की निशानी

साधना, विश्वास-वैभव का फलक है 

साधना, निर्लिप्त कर्मों की झलक है 

साधना, मानव-मनीषा का सुफल है  साधनामय आज यशप्रद दिव्य कल है ll


वेदों, उपनिषदों आदि भारत के ग्रंथों से प्राप्त शिक्षा यह सिखाती है कि मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उन्नति नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नयन और परम सत्य की प्राप्ति है। शिक्षा ज्ञान है ध्यान है विश्वास है आत्मशक्ति है ऐसी शिक्षा से शिक्षित व्यक्ति निराश नहीं होता 

इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय विद्यालय औरास,जिसके अध्यक्ष हैं आचार्य जी,की चर्चा क्यों हुई, भैया मुकेश के घर से आचार्य जी कौन सा ग्रंथ लाए, भैया मनीष जी ने आचार्य जी की किन भैयाओं से बात कराई, आचार्य जी ने *अपने दर्द मैं दुलरा रहा हूं* की किस काव्य रचना का उल्लेख किया, अधिवेशन के लिए हमें और किन लोगों को चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए जानने के लिए सुनें l

26.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०१ वां* सार -संक्षेप

 किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कशा

आभीरशुम्भा यवना: खसादय: ।

येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रया:

शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: ॥ १८ ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८३

निराशा,कुंठा से अपने को बचाएं अपना खान पान सही रखें, शौर्य से प्रमंडित अध्यात्म के उपासक बनें l 


हम सनातन धर्म का पालन करने वाले स्वभावतः करुणा, उदारता और व्यापक दृष्टि से युक्त होते हैं। हमारे हृदय में उठने वाली भावनाएं केवल एक सीमा में बंधी नहीं होतीं, अपितु समस्त जगत् के कल्याण की कामना से ओत-प्रोत होती हैं। जब ये भावनाएं पावन विचारों का रूप लेती हैं, तब हमारे मुख से सहज ही यह मंगलकामना प्रकट होती है कि सभी प्राणी सुखी हों,  निरोगी रहें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। इसी प्रकार, हम संकीर्णता से ऊपर उठकर यह अनुभव करते हैं कि सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार के समान है।   एक सनातनधर्मी के अंतःकरण से जो भावनाएं उदित होती हैं, वे किसी कृत्रिम प्रयास का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक, सहज और आत्मिक अनुभूति की अभिव्यक्ति होती हैं। ऐसा अद्भुत हमारा देश है भारत l कारण कार्य के सिद्धान्त  अर्थात् हर कार्य (परिणाम) का कोई न कोई कारण अवश्य होता है, को भारत  अनेक दृष्टियों से समझते हुए निरन्तर गतिमान रहा है।


 श्रीमद्भागवत महापुराण में विभिन्न स्थानों पर यह वर्णन मिलता है कि भारतभूमि (विशेषतः जम्बूद्वीप) में अनेक बाह्य जातियाँ/जनजातियाँ आकर बस गईं और यहीं की संस्कृति में रच-बस गईं l 



इसके अतिरिक्त औरास के एक विद्यालय की चर्चा क्यों हुई, शबल क्या है,किस ग्रामीण उक्ति का आचार्य जी ने उल्लेख किया,भगवान् राम ने किसे शिव जी का कार्य व्यापार संभालने का निर्देश दिया,काले दाग क्या हैं जानने के लिए सुनें l

25.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०० वां* सार -संक्षेप

 भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥

जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥5॥

होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥6॥


मेरी रचना भगवान् शिवजी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणों सहित चन्द्रमा के साथ रात शोभित होती है, जो इस कथा को प्रेम सहित एवं सावधानी के साथ समझ-बूझकर कहें-सुनेंगे, वे कलियुग के पापों से रहित और सुंदर कल्याण के भागी होकर श्री रामचन्द्रजी के चरणों के प्रेमी बन जाएँगे॥5-6॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८२

उत्साहित रहें  संतुष्ट रहें शक्ति की अनुभूति करें 


आगामी अधिवेशन में शिक्षा विषय पर हमें चर्चा करनी है शिक्षा मानव जीवन का आधार है। यह केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का माध्यम है। शिक्षा के द्वारा ही मनुष्य में विचार करने की क्षमता, सही-गलत का विवेक, समाज और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। ज्ञान अपने आप में अमूल्य है, परन्तु उसके उचित बखान के लिए शिक्षक का होना अत्यन्त आवश्यक है।

शिक्षक जटिल विषयों को सहज बनाकर शिष्य के मन में उतारते हैं। वे अनुभव के आधार पर ज्ञान को जीवंत करते हैं और जीवन में उसके उपयोग का मार्ग बताते हैं।किन्तु शिक्षक को सरलचित्त, स्वभाव से जिज्ञासु, विवेक का आश्रय लेकर चलने वाला,अच्छा मनोवैज्ञानिक, शरीर मन बुद्धि से स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है lशिक्षक का श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही श्रेष्ठ शिक्षा का आधार होता है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि श्रीरामचरित मानस का पाठ हम अवश्य करें इससे हमारी व्याकुलता दूर होगी 

पद्धति ग्रंथ किसे कहते हैं, भैया डा सौरभ राय जी, भैया पवन जी, भैया रवि गुप्त जी, भैया अक्षय जी का उल्लेख क्यों हुआ, किस संदर्भ में "सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।

सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥" दोहे का आचार्य जी ने उल्लेख किया, श्रद्धेय अशोक सिंघल जी सूक्ष्म शक्तियों के विषय में क्या कहते थे जानने के लिए सुनें

24.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८१

आगामी दिल्ली अधिवेशन हेतु जो विषय अर्थात् शिक्षा को हमने चुना है उस पर गम्भीरता से अध्ययन प्रारम्भ कर दें

वाराणसी से  *शिक्षा संग्रह* नामक ग्रंथ की खोज करें  जिससे प्रचुर मात्रा में सामग्री मिल जाएगी 


 

हमारा “युगभारती” नामक संगठन जिसका लक्ष्य है *राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष* मित्रों का एक विशिष्ट समूह है।हमें प्रयास करना चाहिए कि हम केवल नाममात्र के मित्र न रहें, बल्कि उच्च आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारें, जिससे “युगभारती” एक सशक्त, आत्मीय और अनुकरणीय संगठन के रूप में प्रतिष्ठित हो सके।भर्तृहरि ने सच्चे मित्रों के लक्षण बताए हैं

पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।।


सज्जन पुरुष कहते हैं कि सच्चे मित्र का लक्षण यह है कि वह अपने मित्र को पाप से दूर रखे l सिगरेट पीना और मद्यपान करना हानिकारक तथा पतन की ओर ले जाने वाले आचरण हैं। सच्चा मित्र वही होता है, जो अपने साथी को ऐसे दुर्व्यसनों से दूर रखे और उसे सदाचार तथा स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करे।


मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥

हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥2॥


पशु-पक्षी भी अपने हितैषी और अहितकारी में भेद कर लेते हैं। जब उनमें इतनी पहचान की क्षमता है, तो मनुष्य, जो गुण, बुद्धि और ज्ञान से परिपूर्ण है, उसे तो और भी अधिक विवेकपूर्ण आचरण करना चाहिए।

वह मित्र के गुप्त दोषों को छिपाए , परन्तु उसके गुणों को सबके सामने बार बार प्रकट करता रहे । संकट के समय वह अपने मित्र का साथ न छोड़े और उचित समय पर उसकी सहायता भी करे l



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने  बताया शब्द के अभाव में ज्ञान का प्रकाशत्व लुप्त हो जाता है शब्द ब्रह्म है वाणी का आधार है शब्द l यह जीवन का विधि विधान है l 


भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ  लोकभाषा की क्या सीमाएं हैं जानने के लिए सुनें

23.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९८ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८०

अपने भीतर ईश्वरत्व को अनुभव करने के लिए शरीर को हल्का रखें उसे विचारशील चिन्तनशील बनाएं प्रातःकाल संसार से इतर सोचें l संगठन के लिए जो भी छोटे छोटे कार्य हैं उन्हें अवश्य करें l 



प्राचीन भारतीय शिक्षा मुख्यतः गुरुकुल प्रणाली पर आधारित थी जिसमें विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करता था। यह शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं थी उससे भावपक्ष भी संयुत था और इस प्रकार वह जीवन के समग्र विकास पर केंद्रित थी। इसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मज्ञान, कर्तव्यबोध, आत्मविश्वास और नैतिकता का विकास करना था।गुरु और शिष्य के बीच घनिष्ठ और आत्मीय संबंध होते थे, जिसमें शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों का भी विशेष महत्व था। इस प्रकार प्राचीन शिक्षा मनुष्य को एक आदर्श, संतुलित और समाजोपयोगी व्यक्ति बनाने का माध्यम थी।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली का केंद्र “जीवन निर्माण” से हटकर “नौकरी प्राप्ति” की ओर  झुक गया l वर्तमान शिक्षा से वैदिक शिक्षा को संयुत करने के लिए हमें अपने मन बुद्धि विचार और शरीर को अनुशासित करना पडेगा l अनुशासन महत्त्वपूर्ण है l मनुष्य के जीवन का एक अनुशासन है l संपूर्ण सृष्टि में ही अनुशासन है l हमारे ऋषियों ने इसके महत्त्व को अनुभव किया है l जो व्यक्ति जीवन में अनुशासन, संयम और सही दिशा का पालन नहीं करता, वह धीरे-धीरे अपने भीतर के प्रकाश को खो देता है। आलस्य, असंयम, अव्यवस्थित दिनचर्या और अनियमितता व्यक्ति को अज्ञान और पतन की ओर ले जाती है। ऐसे लोग उन अंधकारमय अवस्थाओं को प्राप्त होते हैं, जो अपने ही आत्मा का नाश करने वाले होते हैं। ये अपने शरीर और इन्द्रियों की शक्ति पर निर्भर रहते हैं l 

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने नाना जी देशमुख जी का नाम क्यों लिया कार्य करने की प्रेरणा हमें कहां से मिलती है समाज हमारे ऊपर विश्वास कैसे करेगा जानने के लिए सुनें

22.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७९

सितम्बर २०२६ में दिल्ली में होने जा रहे राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए  युगभारती के हम सदस्यों की अधिक से अधिक संख्या हो इसका प्रयास प्रारम्भ कर दें 




यह हमारा सौभाग्य है कि आचार्य जी निरन्तर प्रयत्नशील हैं कि हम सब  उनके मानस- पुत्र शक्ति,बुद्धि, विचार, कौशल तथा आत्मविश्वास से सम्पन्न बनें। उनका उद्देश्य केवल बाह्य विकास नहीं, अपितु हमारे अन्तःकरण का जागरण भी है। वे चाहते हैं कि हममें से प्रत्येक  मानस-पुत्र अनुभव करे कि वह साधारण नहीं है l यद्यपि शरीर मिट्टी के एक सामान्य खिलौने के समान प्रतीत होता है, किन्तु उसके भीतर एक अत्यन्त विलक्षण, दिव्य और चेतन तत्त्व विद्यमान है इसका उसे अनुभव हो l इस अनुभूति के जाग्रत होते ही हमारे भीतर आत्मसम्मान, उत्तरदायित्व और उत्कृष्टता की भावना उत्पन्न होगी और हम अपने जीवन को उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समर्पित करने का मन बना लेंगे l 

इन दिव्य पवित्र भावों के साथ जब हम संगठन में उतरेंगे तो परस्पर एक-दूसरे से चिढ़ना और कुढ़ना छोड़ देंगे और तब संगठन में प्रेम, आत्मीयता और सद्भाव का स्वाभाविक रूप से विस्तार होगा। इससे आपसी विश्वास दृढ़ होगा और हम सब मिलकर एक सशक्त, तथा सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण कर सकेंगे l ऐसे संगठन के माध्यम से हम राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने में सहयोग कर सकेंगे l


मनुष्य जिस संगति में रहता है, उसका सीधा प्रभाव उसके विचारों, आचरण और व्यक्तित्व पर पड़ता है। इसलिए श्रेष्ठ, सदाचारी और प्रेरणादायक व्यक्तियों का साथ अपनाकर ही हम अपने जीवन को उन्नत, संतुलित और आदर्श बना सकते हैं l 


बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥

जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥2॥

मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥

सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥3॥


ऋषि वाल्मीकि,नारद, अगस्त्य ऋषि आदि ने अपने अनुभव से बताया है कि इस संसार में जितने भी जड़-चेतन, जल, थल और आकाश में रहने वाले जीव हैं—उनकी बुद्धि, यश, स्थिति, संपत्ति और भलाई जहाँ-जहाँ और जैसे-जैसे बढ़ी है, वह सब सत्संग के प्रभाव से ही प्राप्त हुई है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी की साबर मन्त्रों के बारे में किससे चर्चा हुई आज सरौहां में कौन सा कार्यक्रम होने जा रहा है भैया अखिलेश तिवारी जी १९८८ बैच को प्रयास केंद्र में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया शिव जी की कृपा क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें

21.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७८

युगभारती के विस्तार हेतु जो मन में सुझाव आएं उन्हें hard copy के रूप में रखें 


एक अत्यन्त पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए विद्यालय के संस्थापकों के मन में यह विचार अवश्य उदित हुआ होगा कि पंडित दीनदयाल जी के नाम पर एक आदर्श विद्यालय की स्थापना की जाए। इस संस्थान का शिलान्यास भी पवित्र एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों के द्वारा कराया जाए, जिससे इसकी नींव ही उच्च आदर्शों पर आधारित हो।

विद्यालय परिसर में श्री हनुमान जी का प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह स्थापित हो, जिससे वातावरण में सदैव आध्यात्मिकता, शक्ति और प्रेरणा का संचार बना रहे। यहाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए,केवल पाठ्य-सूत्रों का रटन ही उद्देश्य न हो और न ही केवल परीक्षा-परिणाम पर दृष्टि केंद्रित रहे, अपितु उनके चरित्र-निर्माण को भी समान महत्त्व दिया जाए।

विद्यार्थियों में राष्ट्रनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता तथा समाजोन्मुखता के संस्कार विकसित किए जाएं , ताकि वे आगे चलकर एक आदर्श नागरिक बन सकें। साथ ही, इस विद्यालय के शिक्षक स्वयं चरित्रवान् , आदर्शवादी और प्रेरणास्रोत हों,इस प्रकार यह विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र न होकर, संस्कार, चरित्र और राष्ट्रभावना के निर्माण का एक सशक्त माध्यम बने। ऐसे विचार के पश्चात् विद्यालय प्रारम्भ हो गया प्रथम परिणाम से ही समाज में हमारे विद्यालय की चर्चा हो गयी और समाज के लोग आकर्षित होने लगे l यह विद्यालय एक साधारण शिक्षण संस्था से आगे बढ़कर एक प्रेरणास्रोत एवं आदर्श शिक्षण-केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। ऐसे विद्यालय के हम विद्यार्थी रहे हैं और इस कारण हमारा कर्तव्य हो जाता है कि अपने राष्ट्र के प्रति हम निष्ठावान् रहें सनातन धर्म के वैशिष्ट्य को गहनता से जानें दिशा और दृष्टि में किसी प्रकार का भ्रम न रखें 

समाज की सेवा का भाव रखें संतुष्ट रहने का प्रयास करें, मात्र कार्यक्रमों को ही आयोजित न करते रहें अपनी शक्ति बुद्धि विचार कौशल को प्रेम के प्रवाह में प्रवाहित करने का प्रयत्न करते रहें, बिना लोभ लाभ के अपने कार्यक्षेत्र में जुटे रहें 


पुरुष हो पुरुषार्थ करो 


*आबा घंटी बज गयी* किसने कहा,विवेकानन्द की तरह किसने प्रस्थान किया,तुलसीदास जी को अपनी पत्नी में भी कौन दिखाई देते थे,केशवदास जिन्हें हिंदी साहित्य में'कठिन काव्य का प्रेत' भी कहा जाता है की किस रचना की आचार्य जी ने चर्चा की, व्यक्ति से व्यक्तित्व की ओर उन्मुखता कैसे होगी जानने के लिए सुनें

20.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७७

 प्रात अनुभव करो "ईश का अंश हूँ"

दोपहर में प्रखर "वीर का वंश हूँ"

शाम को ज्ञानगरिमा भरा ऋषि प्रशम 

रात्रि संकल्पमय "दुष्ट पर दंश हूँ" ॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७७

गांव गांव के दर्द को समझें उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक करने का प्रयास करें 


प्रभातकाल का यह आनन्दमय चिन्तन निःसंदेह अत्यन्त अनुपम और कल्याणकारी है, किन्तु इसका वास्तविक लाभ तभी संभव है जब यह केवल क्षणिक मनन तक सीमित न रहकर जीवन के व्यापक आयामों में प्रसारित हो।

यह विस्तार तब प्राप्त होगा जब हम इस चिन्तन को अपने दैनिक आचरण में उतारेंगे । केवल विचार करना पर्याप्त नहीं, अपितु उन श्रेष्ठ भावों को कर्म, व्यवहार और निर्णयों में अभिव्यक्त करना आवश्यक है।

जब हम बार-बार उसी शुभ विचारधारा का अनुसरण करेंगे , उसे अपने जीवन का अंग बनाएंगे तब वह स्वभाव में परिवर्तित होकर स्वयमेव विस्तृत होने लगेगा l


जब हम अपनत्व की भावना के साथ किसी के नेत्रों में झांकते हैं, तब वहाँ केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक ही स्रोत से उद्भूत शक्ति का अनुभव होता है। यह अनुभव हमें भीतर से ऊर्जा प्रदान करता है, क्योंकि उस क्षण भेद मिट जाते हैं और एकात्मता का बोध जाग्रत होता है।

ऐसा ही अद्भुत दृष्टिकोण स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो धर्म संसद १८९३ में प्रस्तुत किया। जब उन्होंने “Brothers and Sisters” कहकर अपने उद्बोधन का आरम्भ किया, तब वह केवल संबोधन नहीं था, बल्कि उस गहन आत्मीयता का प्रकटीकरण था, जिसमें सम्पूर्ण मानवता एक परिवार के रूप में दिखाई देती है।

उनके लिए वहाँ उपस्थित सभी व्यक्ति  अपरिचित नहीं थे; अपितु वे उसी परम तत्त्व की अभिव्यक्तियाँ थे, जिनसे वे स्वयं बने थे। उन्हें यह अनुभव हुआ कि बाह्य रूप, भाषा और संस्कृति में भिन्नता होते हुए भी मूलतः सब एक ही सृष्टिकर्ता की रचना हैं अपनत्व का यह भाव ही वह सेतु है, जो मनुष्यों को जोड़कर सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में अनुभव कराता हैl यही

आत्मचैतन्य आत्मदर्शन और आत्मबोध है l 


मनः बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।

न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायु:

चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥

संपूर्ण सृष्टि ही चिदानन्द रूप है l 


सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥


भैया अक्षय जी २००८ को आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया उन्हें साधना का कौन सा उपाय बताया, सरौहां में तालाब भरने का आश्वासन किसने दिया जानने के लिए सुनें

19.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९४ वां* सार -संक्षेप

 आप सभी राष्ट्रभक्तों को नववर्ष की मंगलकामनाएं


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७६

संगठन में अनुशासन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है 


यह संसार एक अथाह सागर के समान है, जिसमें जीवन निरन्तर प्रवाहमान है। इस जीवनरूपी सागर में निरन्तर आगे बढ़ते रहने और उसे पार करने  की शक्ति हमें प्राप्त हो आचार्य जी नित्य इसका प्रयास करते हैं ताकि हम संघर्षों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें।


लक्ष्य तक पहुँचे बिना, पथ में पथिक विश्राम कैसा


लक्ष्य है अति दूर दुर्गम मार्ग भी हम जानते हैं,

किन्तु पथ के कंटकों को हम सुमन ही मानते हैं,

जब प्रगति का नाम जीवन, यह अकाल विराम कैसा ।


हमारे हृदय में बिना किसी लाभ लोभ के माँ भारती के प्रति आजीवन पवित्र और निष्कलुष भक्ति बनी रहे। हमारा जीवन राष्ट्रसेवा और राष्ट्रभक्ति में समर्पित हो हम सुशिक्षित हों अपनी परम्परा को जानें और उसके प्रति गर्व की अनुभूति करें आचार्य जी नित्य प्रयत्नशील रहते हैं l

हम अपने आचरण, विचार और व्यवहार को इस प्रकार ढालें कि वह वेद, उपनिषद्, स्मृतियों और ऋषियों की शिक्षाओं के अनुरूप हो इसके लिए आचार्य जी अपना बहुमूल्य समय दे रहे हैं हमें लाभ उठाना चाहिए l वास्तव में आर्ष परम्परा अद्भुत है l 

हमारी आर्ष परम्परा सदैव यही चाहती है कि जो लोग बुरी प्रवृत्तियों में फँसे हुए हैं, उन्हें सद्बुद्धि प्राप्त हो, जिससे वे अपने कुसंस्कारों को त्यागकर सन्मार्ग का अनुसरण करें। जो लोग भटके हुए हैं, उन्हें उस भ्रम से निवृत्ति प्राप्त हो और वे सही दिशा को समझ सकें।


आचार्य जी ने  आगामी अधिवेशन हेतु ११ व १२ अप्रैल को दिल्ली में होने वाली बैठक की चर्चा करते हुए क्या परामर्श दिया

एकत्रीकरण का क्या महत्त्व है एक सज्जन कैलाश जी की आचार्य जी ने क्यों चर्चा की जानने के लिए सुनें

18.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी / अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९३ वां* सार -संक्षेप

 जानता स्वर्ण नगरी है यह पर ओढ़े सीतारामी हूं

हो कोई साथ नहीं फिर भी अपने पथ का अनुगामी हूं...


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी / अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७५

अपने चिन्तन पक्ष को पंगु न होने दें  एक दूसरे की चिन्ता करते हुए प्रेम आत्मीयता का विस्तार करते हुए अपने संगठन युगभारती को सुदृढ़ता प्रदान करें 



तुलसीदास जी कहते हैं 

तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥


आचार्य जी भी हमें निराश्रित न छोड़ते हुए प्रतिदिन बार-बार यही स्मरण कराते हैं कि हम अपने सनातन धर्म के वैशिष्ट्य को जानें, सद्ग्रंथों का अध्ययन करें तथा चिन्तन, मनन, निदिध्यासन और लेखन करें  हमारे भीतर शक्ति शौर्य पराक्रम ऐश्वर्य देशभक्ति भगवद्भक्ति  उमड़ती घुमड़ती रहे

कर्मठता अद्भुत है 


संसार कर्म की भूमि उत्सवों की शोभा 

       सत्कर्मी का मन सदा रहा इससे लोभा, 

       निष्क्रिय को यह जग हरदम बोझा लगता है 

      कर्मठ साथी का संग छोड़ वह भगता है। 

      कर्मठ को यह संसार हार के जैसा है ॥४॥


आचार्य जी का प्रयास रहता है कि हम सदैव उत्साहपूर्वक जीवन जीएं

जो व्यक्ति उत्साह से पूर्ण होता है, कार्यों को टालता नहीं, बल्कि समय पर पूरा करता है; जो कार्य करने की विधि को भली-भाँति जानता है और अपने कर्तव्यों में लगनपूर्वक संलग्न रहता है जो व्यसनों से दूर रहता है जो साहसी, कृतज्ञ तथा दृढ़ता रखने वाला होता है ऐसे गुणों से युक्त व्यक्ति के पास लक्ष्मी (समृद्धि और सफलता) स्वयं निवास करने के लिए चली आती है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी कहां बहुआयामी विश्वविद्यालय बनाना चाहते थे भैया गोपाल जी भैया वीरेन्द्र  त्रिपाठी जी भैया शशि शर्मा  जी का उल्लेख क्यों हुआ सरौहां गांव के मेले की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

17.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९२ वां* सार -संक्षेप

 कर्ममय जीवन जगत का मूल है

द्वीप को तट समझ लेना भूल है

गीत गाना है सदा विश्वास के

स्वप्न बुनने हैं प्रगति के, आस के

देहली - दीपक धरा का न्याय है

कर्म - कुण्ठा पतन का पर्याय है

स्वर्ण शोभा हो भले पर

अंकुरण के लिये व्याकुल बस धरा की धूल है l

(  आचार्य जी की *संदेश* कविता का एक अंश )

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 17 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७४


दिल्ली में आयोजित होने वाले अधिवेशन को सफल एवं आकर्षक बनाने हेतु हम सब पूर्ण समर्पण के साथ तत्पर हो जाएं 


जब हम जीवन को केवल भौतिक सुख, धन, पद और बाह्य उपलब्धियों तक ही सीमित कर लेते हैं, तब हमारा ध्यान आत्मा, सत्य और जीवन के वास्तविक उद्देश्य से हट जाता है। ऐसी स्थिति में हम बाहरी प्रगति होने पर भी भीतर से शान्ति , आनन्द और संतोष  से वंचित रहते हैं।

आत्मज्ञान की उपेक्षा के कारण हम सही और गलत का गहरा विवेक नहीं कर पाते और जीवन अज्ञानरूपी अन्धकार में ही बीतता रहता है। अतः उस अंधकार से बचना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है 

ये सदाचार वेलाएं हमें प्रकाश की ओर ले जाती हैं उत्साह, शक्ति और प्रेरणा प्रदान करती हैं व्याकुलता भय भ्रम से बचाती हैं हमें ध्यानपूर्वक सुनकर इनका लाभ उठाना चाहिए l 


यह सम्पूर्ण जगत्  सर्वशक्तिमान् ईश्वर से आवृत और उसी के अधीन है  इसमें हमें किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए इस प्रकार हमारे भीतर लोभ और स्वार्थ का स्थान नहीं रहेगा। हम वस्तुओं के प्रति आसक्ति त्यागकर संयमपूर्वक जीवन यापन करेंगे तथा अपने कर्तव्य कर्मों में रमेंगे किन्तु उनके प्रति अनासक्त भाव रखेंगे इस प्रकार हमारा आचरण हमारे जीवन को शुद्ध, संतुलित एवं सर्वहितकारी बना देगा l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सौरभ राय जी,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया यज्ञदत्त जी का उल्लेख क्यों किया,लकड़ी के टाल का उल्लेख क्यों हुआ, ईशोपनिषद् के किन छंदों में परब्रह्म के स्वरूप का बोध है जानने के लिए सुनें

16.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 16 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७३

आत्मशुद्धि की ओर उन्मुख होने का प्रयास करें 



हमारे आचार्य श्री दीपक राजे जी की बहन सुश्री रेखा ताई राजे जो श्रद्धेय अशोक सिंघल जी और सिंधुताई फाटक जी की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन राष्ट्र सेविका समिति की पूर्णकालिक प्रचारक बनीं और जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर देशसेवा का व्रत लिया कल हमारे बीच नहीं रहीं यद्यपि वे शारीरिक रूप से अब हमारे साथ नहीं हैं, तथापि उनका तप और त्याग,उनकी यशस्विता सदैव हमारे पथ को आलोकित करती रहेगी। उनके आदर्श और जीवन-संदेश आने वाली पीढ़ियों को निरन्तर प्रेरणा देते रहेंगे।

इस परिचय-प्रधान संसार में जब कोई अपना हमें छोड़कर चला जाता है, तब मोह स्वाभाविक रूप से मन को अत्यन्त दुःखी कर देता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे हमें इस मोह से मुक्त होने की शक्ति दें तथा दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।

आचार्य जी नित्य इन सदाचार-वेलाओं के माध्यम से राष्ट्रभक्ति, आत्मभक्ति तथा ईश्वरभक्ति जैसे उच्च जीवन-मूल्यों के विषयों को उठाते हैं और हमें उनके महत्त्व का बोध कराते हैं।


भक्ति का यह भाव और बोध ज्ञान के साथ सम्मिश्रित होकर एक अनोखी घटना के रूप में भारतवर्ष में घटित हुआ है  वह भारतवर्ष 

जो संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की जाज्वल्यमान परम्परा का देश है। इस पावन भूमि पर छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरुगोविन्द सिंह, बिरसा मुंडा, मंगल पांडेय, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद,बंदा बैरागी जैसे महापुरुषों ने अन्याय के विरुद्ध अडिग रहकर स्वतंत्रता और धर्मरक्षा के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग किया।

इसी संघर्ष के बीच में अध्यात्म भी पल्लवित होता रहा l स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि अनगिनत साधक समाज को जाग्रत करने का कार्य करते रहे l 

किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा ।

अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥१॥

इस जगत् का कारण क्या है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए हैं? हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं? और अंततः किसमें स्थित हैं?

हम किसके अधीन होकर सुख और दुःख में जीवन व्यतीत करते हैं?

ब्रह्मवेत्ताओं से ब्रह्म का जिज्ञासु प्रश्न कर रहा है

 

ऋषियों ने पहले विचार किया कि क्या काल (समय), स्वभाव, नियति, यदृच्छा (संयोग), पंचभूत या पुरुष इनमें से कोई जगत् का कारण है। परन्तु उन्होंने देखा कि ये सभी स्वयं भी किसी नियम के अधीन हैं, इसलिए ये परम कारण नहीं हो सकते।

तत्पश्चात् ध्यान-योग और गहन मनन के द्वारा उन्हें यह बोध हुआ कि इस सम्पूर्ण जगत् का मूल कारण एक ही परम देव — परमात्मा (ब्रह्म) है, जो समस्त जगत् का नियन्ता और आधार है। उसी से जगत् की उत्पत्ति होती है, उसी से जीवन का पोषण होता है और उसी में अन्ततः सब स्थित है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज होने वाली किस बैठक की चर्चा की, हमारी शक्ति कैसे क्षय होती है, योद्धाशिष्यों को किसने फैलने के लिए कहा जानने के लिए सुनें l

15.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९० वां* सार -संक्षेप

 भावना मानवी जीवन की सुरसरिता है 

इसमें अवगाहन जिसके मन को भाता है, 

सचमुच ही वह संसार सार का ज्ञाता है, 

जीवन भर उसको ही सत्कर्म सुहाता है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 15 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७२


संवेदना भरपूर लेकिन कर्मवृत्ति अभाव है 

परिदेवनारत हम सभी का यही बना स्वभाव है 

जागें जगाएं कर्म के प्रति वृत्ति को खरधार दें 

कर्मानुरागी बन चलें सोया समाज सुधार दें



हमारे  भीतर संवेदनाएं तो प्रचुर मात्रा में हैं , किन्तु कर्म करने की प्रवृत्ति का अभाव दिखाई देता है। हम प्रायः परिस्थितियों पर विलाप करने और असंतोष प्रकट करने में ही समय व्यतीत कर देते हैं। यह प्रवृत्ति हमारे स्वभाव का अंग बनती जा रही है। अतः आवश्यक है कि हम स्वयं जागें और दूसरों को भी जाग्रत करें, तथा अपने भीतर कर्मशीलता की तीक्ष्ण और दृढ़ वृत्ति उत्पन्न करें। जब हम कर्म के प्रति अनुरागी बनकर आगे बढ़ेंगे, तभी सुप्त समाज को जाग्रत कर उसका वास्तविक सुधार कर सकेंगे।

हम उस समाज को जगाना चाहते हैं जो पाश्चात्य प्रभाव और अन्य विभिन्न भ्रमों के कारण, अपने स्व-रूप से विमुख और शंकित हो गया है। ऐसे सनातनधर्मी समाज को यह अनुभव कराना आवश्यक है कि सनातन धर्म केवल एक परम्परा नहीं, बल्कि अद्भुत शक्ति, साहस और अमर जीवन-दृष्टि का स्रोत है। हमें यह आत्मविश्वास जाग्रत करना होगा कि उसे विपत्तियों और प्रभंजनों से भयभीत नहीं होना चाहिए ,उसे अपनों और परायों के बीच के भेद की स्पष्टता होनी चाहिए 

उस सुप्त समाज को यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हमारा भारत देश वेदविदों का देश है भारत की पहचान केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि वैदिक ज्ञान, ऋषि-परम्परा और उच्च आध्यात्मिक संस्कृति के केन्द्र के रूप में है। यही परम्परा हमें अपने जीवन को उच्च, मर्यादित और लोकहितकारी बनाने की प्रेरणा देती है। आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम  आत्मबोध से युक्त रहें मनुष्यत्व की अनुभूति करें संगठित रहें दंभ का विसर्जन करते रहें शुभ शक्तियों को देशहित बांधने का प्रयास करते रहें l


आचार्य जी की भैया सौरभ द्विवेदी जी से बात क्यों नहीं हो पायी, अधिवेशन के संबन्ध में आचार्य जी की भैया मनीष कृष्णा जी से क्या बात हुई,एस आई आर अभियान में महाराजपुर विधानसभा के किन पर्यवेक्षक को मुख्य चुनाव आयुक्त उत्तर प्रदेश द्वारा सम्मानित किया गया, भैया अक्षय जी, भैया शुभेन्द्र जी और भैया मनीष गुप्त जी की चर्चा क्यों हुई, नवीं कक्षा में किसे पुरस्कृत किया गया था जानने के लिए सुनें l

14.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८९ वां* सार -

 जीवन केवल जिन्दा रहना ही नहीं मित्र !

आजीवन कर्मशीलता का यह शपथ-पत्र,

जीवन उत्साह उमंगों की अद्भुत गाथा,

कल्पनाशीलता मुदिता शुचिता का प्रपत्र ll१ll



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 14 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७१

हम ईश्वरत्व की अनुभूति करें जिसके लिए हमें अपने तन को संयमित कर मन को अवश्य ही नियन्त्रित करना चाहिए शरीर में ही अनुरक्त न रहकर मन को भी परखने का प्रयास करें 



हमने भारतभूमि में जन्म लिया है—यह हमारे लिए परम सौभाग्य और गौरव का विषय है। यह भूमि केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, अपितु अनादिकाल से धर्म, ज्ञान, तप, त्याग और संस्कृति की पावन साधना-भूमि रही है। यहाँ की परम्पराएँ हमें केवल भौतिक उन्नति की ओर ही नहीं, बल्कि आत्मिक उत्कर्ष और लोकमंगल की दिशा में भी प्रेरित करती हैं। संसार के परिवर्तनशील स्वरूप में रहते हुए हमें बल प्रदान करती हैं l 

आचार्य जी का नित्य यही प्रयास रहता है कि हम सबके भीतर सनातनधर्मी भाव सुदृढ़ बना रहे ।जब यह भाव हमारे जीवन में दृढ़ होता है, तब निराशा और हताशा हमारे समीप भी नहीं आती, क्योंकि हमारा दृष्टिकोण व्यापक और आशावान् बन जाता है। हम सत्कर्मों की ओर प्रेरित हों इसके लिए आचार्य जी अपना बहुमूल्य समय दे रहे हैं और आप चाहते हैं कि हम अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित न रख  समाज, राष्ट्र और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना की ओर समर्पित करें साथ ही हम यह भी जानें कि भक्ति केवल भावनात्मक श्रद्धा भर नहीं है,वह परमशक्ति के प्रति गहन विश्वास और आत्मसमर्पण की अवस्था है। इस भक्ति में केवल शक्ति की अनुभूति ही नहीं, बल्कि उसके प्रभाव की अभिव्यक्ति भी हमारे आचरण, वाणी और कर्मों में प्रकट हो यही बात तो आचार्य जी दोहराते हैं ।



पराशर धर्म संहिता का उल्लेख क्यों हुआ, भैया पुनीत जी की चर्चा क्यों हुई,स्वाभाविक कार्य क्या हैं, क्या आजीवन कर्मशीलता में वार्द्धक्य बाधा बनता है जानने के लिए सुनें

13.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८८ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 13 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७०

हमारा जीवन,चैतन्य, शक्ति,बुद्धि,विचार, भौतिक वैभव, आध्यात्मिकता  समाजोन्मुखी और राष्ट्रोन्मुखी हो यह प्रयास करें 



आचार्य जी का यह सतत् प्रयत्न—जिसके द्वारा हम उनके राष्ट्रभक्त मानस-पुत्र उत्थित, उत्साहित, प्रबुद्ध, जाग्रत और कर्मनिष्ठ बन सकें तथा अपने वास्तविक मनुष्यत्व  जो किसी का अकल्याण नहीं चाहता है का साक्षात्कार कर सकें—निस्संदेह अवर्णनीय और अप्रतिम है।

 हम लोगों का  यह परम सौभाग्य है कि आचार्य जी अपने जीवन का दीप इस प्रकार प्रज्वलित कर रहे हैं कि उसकी ज्योति हम सबके जीवन में प्रकाश और प्रेरणा भर रही है l 


ऐसी ज्योति कि जिसे देखकर ही अंधियार जले

हर उलूकवंशी को हर पल कुलिश* समान खले 


हम ऐसे सामर्थ्य से सम्पन्न बनें कि उसके प्रयोग की आवश्यकता ही उत्पन्न न हो। हमारे तेज और पुरुषार्थ के दर्शन मात्र से दुष्टजन भयभीत हों तथा अपने राष्ट्रभक्त आत्मीय जनों के हृदय में निर्भयता और विश्वास का संचार हो l  हमारी उपस्थिति से वायुमंडल सुगन्धित हो जाए l इसी के आधार पर हम संगठन गठित कर पाएंगे l इन प्रयासों से  हमारा भारत देश कभी भोग -आगार नहीं हो पायेगा वह आर्ष परम्परा को सतत् प्रवाहमान् एवं चलायमान् बनाए रखेगा l 


*वज्र 

आचार्य जी ने उस किस प्रसंग का उल्लेख किया जब वे संघ के नियमित कार्यकर्ता थे, भैया विवेक भूषण १९८३ के पिता जी श्री राम अवतार वाजपेयी जी का उल्लेख क्यों हुआ,*निवास* किस स्थान का नाम था, अधिवेशन किसका प्रस्तुतीकरण है जानने के लिए सुनें

12.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८७ वां* सार

 जीवन-परिचय ऐसा हो जिससे औरों को प्रेरणा मिले

सीखने समझने करने की अभिनव नूतन धारणा खिले

जीवन पढ़ते ही भीतर की बुझती बाती झिलमिला उठे

भावों मे ज्वार विचारों में संकल्प - पुष्प खिलखिला उठें

ऐसा कुछ हो तो फिर चाहे तुम लिखो या कि मैं स्वयं लिखूँ ॥ ४ ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 12 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६९

हम अपने विचार, आचरण और कर्म को राष्ट्रहित तथा समाजकल्याण के लिए समर्पित करते हुए अपने चरित्र, ज्ञान, कर्तव्यबोध और सेवा-भाव का विकास करते चलें 



भारत की संस्कृति का एक प्रमुख वैशिष्ट्य परिवार-भाव है। यहाँ केवल रक्त-सम्बन्धों से बने छोटे परिवार को ही परिवार नहीं माना जाता, बल्कि व्यापक दृष्टि से सम्पूर्ण समाज और समस्त मानवता को एक ही परिवार के रूप में देखा जाता है।इस आर्ष चिन्तन में व्यक्ति अपने सुख-दुःख को केवल अपने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि दूसरों के सुख-दुःख को भी अपना ही समझता है।

इसी उदात्त भावना के कारण हमारे यहाँ “वसुधैव कुटुम्बकम्” का आदर्श स्थापित हुआ है 


हमने पूरी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब परिवार कहा

दुनिया ने जिसको ठुकराया आगे बढ़ उसका हाथ गहा

हम जीव मात्र को सदा दया का द्वार दिखाते आए

परहित में अपना तन मन धन घर-बार लुटाते आए हैं

अपने जैसा सबको माना जो कुछ दुनिया में दृश्यमान ॥ १ ॥

भारत महान् भारत महान्....


 इस भाव में किसी प्रकार का भेदभाव, संकीर्णता या परायापन नहीं रहता। सभी मनुष्य, सभी जीव और समस्त सृष्टि एक ही परमात्मा की सन्तान समझे जाते हैं। यही भावना व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर सहअस्तित्व, प्रेम, करुणा और सहयोग की ओर प्रेरित करती है l  यही भावना हम अपने संगठन युगभारती में भी विकसित करें l हम वैभव और अभाव दोनों में सम रहने का प्रयास करें l संतुष्ट व्यक्ति का ही सचमुच इस जग में सच्चा जीवन है l संसार और संसारेतर दोनों का चिन्तन करें l 

यह चिन्तन व्यक्ति को केवल भौतिक जीवन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे व्यापक और आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है। हम कर्म करें किन्तु फल की इच्छा न करें l समाजोन्मुख और राष्ट्रोन्मुख जीवन जीने का जो संकल्प लिया है उस ओर अपने पग बढ़ाते रहें l 


आचार्य जी ने भैया प्रदीप वाजपेयी जी १९८९, भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी के नाम क्यों लिए, तरुण चेतना शिविर १९९२ की चर्चा क्यों हुई,आचार्य जी से जीवनी लिखने के लिए किसने कहा था जानने के लिए सुनें

11.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 11 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६८

अधिवेशन और अन्य कार्यक्रमों को प्रभावशाली ढंग से करें 


जब हम भारत के इतिहास को तटस्थ और निष्पक्ष दृष्टि से देखते हैं, तब यह स्पष्ट अनुभव होता है कि इस राष्ट्र ने असंख्य झंझावातों, आक्रमणों और विपत्तियों का सामना किया है। किन्तु साथ ही ऐसा भी प्रतीत होता है मानो परमात्मा स्वयं इस देश की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध है। इसी कारण कितनी ही कठिन परिस्थितियां क्यों न आई हों, भारत की जीवनधारा कभी रुकी नहीं,वह बार-बार   अद्भुत शक्ति के साथ उठकर आगे बढ़ती रही है।

हमारा भारत देश अद्भुत अनादि और अनन्त है l हमें झंझावातों से भयभीत नहीं होना है और न ही निश्चिन्त होकर बैठना है l


भारत महान भारत महान

जग गाता था, गा रहा नहीं, गाएगा फिर पूरा जहान...


 हम राष्ट्रभक्त केवल स्वयं जाग्रत न रहें, बल्कि समाज को भी जाग्रत करें। हम राष्ट्र की चेतना के प्रहरी बनें और अपने आचरण तथा ज्ञान से समाज को सही दिशा प्रदान करें। इसके लिए हम युगभारती के रूप में संगठित हुए हैं जब हम कोई भी कार्यक्रम करें तो उसे अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से करें  कार्यक्रम जितना अधिक प्रभावशाली होगा उतनी ही समाज में हमारी चर्चा होगी और लोग हमारी ओर आकर्षित होंगे तब हम अपने सत्य को उजागर कर सकते हैं और भारती भावों से अड़कर तथा तथाकथित अपनों से  लड़कर लोगों को विश्वास दिला सकते हैं कि वे भयभीत न हों  *हम उनका सहारा हैं* 

 इसके अतिरिक्त छोटापन क्यों अच्छा है भैया सौरभ द्विवेदी जी का उल्लेख क्यों हुआ,

स यथोर्णवाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाऽग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्॥ का उल्लेख कर आचार्य जी ने क्या समझाने की चेष्टा की जानने के लिए सुनें

10.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 10 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८५ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 10 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६७

“जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए लक्ष्य की स्पष्टता और विचारों की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है। जब हमारी दिशा और दृष्टि सुस्पष्ट होती हैं, तब हम अपने उद्देश्य को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।” भरपूर ऊर्जा से परिपूर्ण हम लोग यदि सात्त्विक लोगों का सहयोग लेते रहेंगे तो  कभी भटकेंगे नहीं और सन्मार्ग पर अग्रसर रहेंगे।


हमारे प्रति स्नेह के कारण और हमें सन्मार्ग पर निरन्तर अग्रसर रखने के लिए आचार्यजी नित्य हमें प्रेरित करते रहते हैं, यह हमारा परम सौभाग्य है। हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l 


मनुष्य अपने ज्ञान, विचार और भावनाओं के आधार पर ही समाज का निर्माण करता है। उसी समाज की ओर उन्मुखता हमारा उद्देश्य है l समाज-उन्मुख जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त कर उस प्रतिष्ठा का अंश समाज को प्रदान करना तथा यह प्रेरणा देना कि ‘मैंने ऐसा किया है, आप भी ऐसा ही कीजिए।’ सच्चे अर्थों में आदर्श जीवन का लक्षण है

ऐसा ही अपनी प्रतिष्ठा के अंश को समाज को प्रदान करने का प्रयास भैया सौरभ द्विवेदी जी ने  ८ मार्च २०२६ को चमारी गांव में माताप्रसाद पुस्तकालय के लोकार्पण समारोह के माध्यम से किया जिसमें अनेक राजनेता, फिल्मी कलाकार, साधुसंत, विद्वान् सम्मिलित हुए l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विनय अजमानी जी, भैया विभास जी,भैया प्रवीण सारस्वत जी, भैया अजय जी,भैया संजय जी,भैया अभय जी के नाम क्यों लिए , अपने संगठन का कोई सदस्य कुंठित न हो इसके लिए क्या करना चाहिए,भोगवाद से क्यों बचना चाहिए, ब्रह्मचर्य क्या है, आचार्य का क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें l

9.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 9 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८४ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 9 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६६

अध्ययन स्वाध्याय के प्रति रुचि जाग्रत करें 


संस्कार विविध प्रकार से दिए जा सकते हैं। सनातन धर्म में इस विषय पर अत्यन्त गहन चिन्तन तथा व्यापक कार्य हुआ है। इसी चिन्तन के परिणामस्वरूप अनेक ग्रन्थों का निर्माण हुआ, जिनकी परम्परा

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद नामक चार वेदों से प्रारम्भ होती है l प्रत्येक वेद का प्रथम भाग संहिता कहलाता है, जिसमें देवताओं की स्तुतियाँ और मन्त्र संकलित हैं। संहिता के बाद ब्राह्मण ग्रन्थ आते हैं, जिनमें यज्ञों की विधि और कर्मकाण्ड का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ब्राह्मणों के बाद आरण्यक ग्रन्थों का स्थान है, जिनमें वन में रहकर किए जाने वाले चिन्तन और साधना का वर्णन मिलता है तथा जो मनुष्य को कर्मकाण्ड से ध्यान और आध्यात्मिक विचार की ओर ले जाते हैं। आरण्यकों के अन्त में उपनिषद् आते हैं, जिनमें आत्मा, ब्रह्म और परम सत्य के विषय में गहन तत्त्वचिन्तन किया गया है, इसलिए इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। आगे चलकर इन्हीं वेदों के सिद्धान्तों को कथा और इतिहास के रूप में समझाने के लिए अनेक महाग्रन्थों की रचना हुई। भक्ति और आदर्श जीवन को सामान्य जन तक पहुँचाने के लिए पुराणों और भक्तिकालीन ग्रन्थों की रचना हुई l दुर्भाग्य से हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मानस को विकृत करने के लिए विभिन्न आक्रान्ताओं द्वारा समय-समय पर अनेक प्रयास किए गए और इसमें वे सफल भी हुए हम उनके बिछाए जाल में फंसते चले गये l हम उन ग्रंथों को क्लिष्ट  और अनुपयोगी मानकर उनसे दूरी बनाने लगे जबकि यथार्थ में वे अत्यन्त ज्ञानवर्धक व्यावहारिक और उपयोगी हैं हमें इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है  अध्ययन के प्रति रुचि जाग्रत करने के लिए 

पुस्तकालय महत्त्वपूर्ण हैं  जो संस्कार के विशिष्ट केन्द्र हैं जहाँ विविध विषयों की पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और ज्ञानवर्धक सामग्री का संग्रह रहता है l  भैया सौरभ द्विवेदी जी ( २००० बैच ) के ऐसे ही एक पुस्तकालय 

*माता प्रसाद  पुस्तकालय ग्राम चमारी थाना आटा जनपद जालौन* का कल लोकार्पण समारोह हुआ  जिसमें युगभारती के अनेक सदस्य पहुंचे l



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने उन्नाव वाले अपने घर का उल्लेख क्यों किया अध्ययन के प्रति रुचि जाग्रत करने के लिए आचार्य जी ने क्या सुझाव दिए, वाङ्मय मूर्तियां क्या हैं  धारा काटना क्यों महत्त्वपूर्ण है जानने के लिए सुनें l

8.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 8 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 8 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६५


संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥3

आदि अरण्य कांड की चौपाइयां स्मरण कर लें 


समाज देवतुल्य है। वह परमात्मा की यन्त्रमय, तन्त्रमय तथा मन्त्रमय शक्ति का विस्तार है। समाज मनुष्यों को एक सूत्र में बांधता है और उन्हें मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। किन्तु जब समाज में विकृति उत्पन्न हो जाती है, तब वही समाज विष के समान कष्टदायक भी हो सकता है। इसलिए हमें सदैव समाजोन्मुख रहने का प्रयास करना चाहिए, जिससे समाज की शुद्धता, सद्भावना और संतुलन बना रहे। इसी प्रकार राष्ट्र के उत्थान के लिए हमें राष्ट्रोन्मुख भी रहना चाहिए l हम मात्र शरीर मन बुद्धि विचार न होकर इनका समन्वित स्वरूप हैं यही समन्वय हमें मनुष्य बनाता है l

परहित सरिस धरम नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

अर्थात् दूसरों का हित करना ही सर्वोच्च धर्म है।

यह वही भावना है कि समाज मनुष्यों को जोड़ता है और उसके कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।

मानस में समाज, मर्यादा, समन्वय और लोककल्याण का ही आदर्श प्रस्तुत किया गया है।

आचार्य जी ने अप्रतिम भक्त शबरी का उल्लेख किया 


भगवान् राम  जो सर्वज्ञ हैं किन्तु अज्ञ बनकर जिससे भक्त का मन मोहित हो जाए  प्रश्न करते हैं 

जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥5॥

 इस पर शबरी कहती हैं 


पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥

सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥


इसके अतिरिक्त आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं स्वामी रामतीर्थ की चर्चा क्यों हुई भगवान् राम जी के जन्म के अनेक कारणों में किस एक कारण का उल्लेख आचार्य जी ने किया जानने के लिए सुनें

7.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 7 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८२ वां* सार -संक्षेप

 नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे।

त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।

महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे।

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 7 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६४

श्रीमद्भग्वद्गीता, जिसका एक एक छंद जीवन का तत्त्व है,के दूसरे अध्याय के ४७ से ५३ तक के छंद पढ़ें निःसंदेह इनसे शान्ति और आनन्द की अनुभूति होगी 



प्रातःकाल की ये सदाचार वेलाएं हमारे जीवन को उन्नत बनाने की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधना हैं। इनका वास्तविक लाभ  हमें तभी प्राप्त होगा , जब हम केवल बाह्य रूप से उपस्थित न रहते हुए इनके भावों और आदर्शों में भी  प्रवेश करेंगे l 



भाव की भाषा जहां व्यवहार के पथ पर चली है

और सात्विक शक्ति को चैतन्य की झंकृति मिली है

वहीं सन्निधि का अनोखा प्रेममय संबल मिला है 

सहज प्रेमी साथियों का हर तरह का बल मिला है

इसी बल को ज्ञानियों ने संगठन का नाम देकर

और मानव को विधाता ने यशस्वी काम देकर

जगत के झंझा झकोरों पर विजय का पथ दिखाया

और मानव को मनन चिन्तन भरा जीवन सुझाया



हमें अपने विचार और व्यवहार को देशभक्ति के संस्कारों से अनुप्राणित करना चाहिए। यदि हमारे जीवन में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, कर्तव्य और समर्पण की भावना जाग्रत होती है, तभी यह कहा जा सकता है कि हम वास्तव में युगभारती संस्था के सच्चे सदस्य हैं l देशभक्ति अपने आप में एक अद्भुत और पवित्र भावना है। जब मनुष्य अपने देश को केवल भूमि का टुकड़ा न मानकर पवित्र चेतना और दिव्यता का प्रतीक समझने लगता है, तब उसे उसी में परमात्मा का दर्शन होने लगता है। यही उच्च दृष्टि महान् संत स्वामी रामतीर्थ की थी। वे एक अत्यन्त मस्त, निर्भीक और उच्चकोटि के योगी थे, जिन्होंने भारतभूमि में ही ईश्वर की झलक का अनुभव किया।

वास्तव में यह धरती ऐसे ही अद्भुत संतों और महापुरुषों की तपस्या से पवित्र बनी है। उनके आदर्श हमें यह प्रेरणा देते हैं कि हम अपने जीवन में उच्च विचार, श्रेष्ठ आचरण और गहन राष्ट्रभक्ति को स्थान दें।

राष्ट्र को और अधिक विभूतिमत्ता प्रदान करने के लिए हमें कर्मरत रहना चाहिए l 

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिः।

विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं।

समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥

किन्तु हम अपने कर्म करें,उन कर्मों के फल में आसक्ति मत रखें l जब मनुष्य कर्म करता है तो उसके मन में सफलता और असफलता का विचार उत्पन्न होता है। यदि सफलता मिलती है तो अहंकार और हर्ष होता है और असफलता होने पर शोक तथा निराशा उत्पन्न होती है।

किन्तु योगी का मार्ग इससे भिन्न है।

योगी व्यक्ति सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (असफलता) दोनों स्थितियों में समभाव रखता है। वह अपने कर्तव्य का पालन तो पूर्ण निष्ठा से करता है, परन्तु परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देता है। हमें यही योगी का मार्ग अपनाना चाहिए l 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सिद्धनाथ जी भैया मनीष जी भैया मोहन जी भैया वीरेन्द्र जी का उल्लेख क्यों किया मुक्ति और भुक्ति में क्या अन्तर है  कृपण कौन हैं  माधवेन्द्र पुरी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें

6.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 6 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८१ वां* सार -संक्षेप

 गायन्ति देवाः किल गीतकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 6 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६३

किसी संकल्प को पूर्ण करने के लिए भय और भ्रम का त्याग करें स्वयं आत्मविश्वासी बनकर अपनी संतानों को भी आत्मविश्वासी बनाएं l भारत की विभूतिमत्ता को वृद्धिंगत करने के छोटे छोटे प्रयास करते रहें l 


विषपायी आचार्य जी नित्य प्रयास कर रहे हैं कि हम स्वयं इस सत्य को जानें, उस पर दृढ़ विश्वास रखें और अपनी संतानों को भी यह बताएं तथा आश्वस्त करें कि हमारे देश की परम्परा अत्यन्त महान्,अद्भुत और अलौकिक है। यह परम्परा अनोखी है और इसकी जड़ें अत्यन्त गहरी हैं। हमारा राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि एक सनातन सांस्कृतिक चेतना है।

 इसी कारण यह अजर-अमर है और प्रलयकाल तक किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाए रखने का सामर्थ्य रखता है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अप्रतिम है l यह स्वर्ग धरा है l 


भारत ने शौर्य शक्ति विक्रम को भाषा दी

म्रियमाण जगत को प्राणों की परिभाषा दी।

भारत जब-जब भी कालचक्र के बीच फँसा

विषपायी बनकर कालव्याल पर खूब हँसा ll ४ ll

यदि हम अपना ध्यान निरन्तर राजनेताओं पर ही केन्द्रित कर देंगे और निरर्थक चर्चाओं तथा गपशप पर अधिक ध्यान देंगे, तो हमारा मन व्याकुल और अशान्त हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि हम अपना मन श्रेष्ठ विचारों, ज्ञान और आत्मचिन्तन की ओर लगाएं , जिससे जीवन में स्थिरता और शान्ति बनी रहे। हम अपने शरीर को साधें जिससे हमें शक्ति प्राप्त होगी हम संगठित भी रहें l 

आचार्य जी ने भैया पुरुषोत्तम जी, भैया आशीष जोग जी, भैया अमित गुप्त जी, भैया राजकुमार जी के नाम क्यों लिए , मौसल पर्व,जिसकी संक्षेप में कथा है कि एक बार साम्ब और अन्य यदुवंशी कुमारों ने ऋषियों का उपहास किया। तब ऋषियों ने शाप दिया कि इनके कारण लोहे का मुसल उत्पन्न होगा और उसी से यदुवंश का विनाश होगा, का उल्लेख क्यों किया अप्रतीक किसका नाम है जानने के लिए सुनें l

5.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 5 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६२


यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥


यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥

आत्मा की सार्वभौमिक एकता का अनुभव ही सच्चा ज्ञान है  उसी से समता, करुणा और शान्ति की प्राप्ति होती है।






भारत की संस्कृति अत्यन्त प्राचीन, बहुविस्तृत तथा आश्चर्यजनक रूप से गहन है। इसे जितना अधिक हम जान लेते हैं उतना ही इसके अद्भुत स्वरूप और अन्तर्निहित आकर्षण का अनुभव होता है। यह केवल आचार-व्यवहार की परम्परा नहीं, अपितु जीवन को समग्रता में देखने की दृष्टि है।

ऋषियों की तपःसाधना, उपनिषदों का आत्मदर्शन, गीता का कर्मयोग, भक्ति का प्रेम-मार्ग तथा लोकजीवन की सहज आस्थाएं -इन सबके समन्वय से भारतीय संस्कृति का स्वरूप निर्मित हुआ है। उपनिषद् आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत सम्बन्ध की बात करते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता कर्तव्यपालन और समत्व का उपदेश देती है। इस प्रकार यहां अध्यात्म और व्यवहार, दोनों का संतुलन विद्यमान है।

अनेक चिन्तक, विचारक, मनीषी और विद्वान् इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सृष्टि के मूल में एक परम चेतना या परमात्मा का अस्तित्व है। वही सृष्टिकर्ता, पालक और संहारकर्ता है,वही समस्त जीवन का आधार है। मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है अर्थात् बुद्धि, शक्ति, अवसर और अनुग्रह उसका मूल स्रोत वही परम सत्ता है। यह भाव श्रद्धा, विनय और उत्तरदायित्व की भावना को जन्म देता है।

निस्सन्देह, समाज में कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। मतभेद और मतान्तर सदा से रहे हैं। वर्तमान समय में मतान्तरण, वैचारिक संघर्ष, सामाजिक तनाव तथा युद्धों के कारण वातावरण में अशान्ति और उथल-पुथल दिखाई दे रही है। मानो एक भयंकर वात्याचक्र चल रहा हो, जो व्यक्ति के विश्वास, धैर्य और नैतिकता की परीक्षा ले रहा है।

ऐसे संक्रमणकाल में अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहना, आत्मविश्वास को अक्षुण्ण रखना और सत्य-मार्ग का अनुसरण करना अत्यन्त बड़ी चुनौती है। परन्तु इस चुनौती से पलायन करना उचित नहीं। भारतीय संस्कृति का मूल संदेश ही यह है कि कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए धर्म, सत्य और करुणा का परित्याग न किया जाए।

जब मनुष्य आत्मचिन्तन करता है, अपने कर्तव्य को पहचानता है और व्यापक कल्याण की भावना से कार्य करता है, तब वह किसी भी वात्याचक्र में अपने को स्थिर रख सकता है


समाज को खाँचों में विभाजित कर देखना उचित नहीं है 

वैदिक साहित्य में वर्ण की चर्चा मुख्यतः कर्म और गुण के आधार पर की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता (४/१३) में कहा गया है

“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः”  अर्थात् चार वर्णों की व्यवस्था गुण और कर्म के अनुसार की गई है।

यहाँ जन्म का नहीं, स्वभाव और कर्तव्य का संकेत है।

कालान्तर में यह व्यवस्था जड़ होकर सामाजिक असमानता का कारण बनी। “शूद्र” शब्द का मूल अर्थ सेवा या श्रम से जुड़ा था शूद्र स्वतन्त्र श्रमिक है  (दास नहीं ) परन्तु जब इसे हीनता से जोड़ दिया गया, तब वह सामाजिक विषमता का रूप ले बैठा।


ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (मण्डल १०, सूक्त ९०) में एक विराट् पुरुष (ब्रह्माण्डीय पुरुष) की प्रतीकात्मक कल्पना की गई है। उसी में समाज के चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है।मंत्र इस प्रकार है—

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥

(ऋग्वेद १०. ९०. १२)

उस विराट् पुरुष के मुख से ब्राह्मण,

भुजाओं से क्षत्रिय,जाँघों से वैश्य,

और चरणों से शूद्र की उत्पत्ति बतायी गयी है।

शूद्रों को पठन यजन और दान देने का अधिकार है दान लेने का अधिकार नहीं है और इसके लिए मन्त्रों का पाठ आवश्यक नहीं है l और यह किसी भी वर्ण का व्यक्ति हो सकता है l

इसके अतिरिक्त होलिका में गले क्यों मिलते हैं शूद्र कमलाकर किसने लिखा, अपने भीतर के तत्त्व को जाग्रत करने की किसे आवश्यकता है संगठन का विस्तार कैसे होगा जानने के लिए सुनें

4.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 4 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६१

प्रतिदिन अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन लेखन अवश्य करें


संगठन का भाव अत्यन्त आवश्यक है मनुष्य वास्तविक अर्थ में मनुष्यत्व तभी प्राप्त करता है, जब वह संगठित होकर जीवनयापन करता है। एकाकी व्यक्ति की शक्ति सीमित होती है, परन्तु संगठन से उसकी समर्थता अनेक गुना बढ़ जाती है।

संगठन का भाव परस्पर विश्वास, सहयोग और समन्वय को जन्म देता है। इसी से उत्साह बना रहता है और सामूहिक चेतना जाग्रत होती है। जब लोग एक उद्देश्य से जुड़ते हैं, तब नये विचार उत्पन्न होते हैं, नयी योजनाएँ बनती हैं, नये कार्य आरम्भ होते हैं, नये व्यवहार विकसित होते हैं और नये अनुसंधान संभव होते हैं।

वस्तुतः कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। निष्क्रियता उसके स्वभाव के विपरीत है। संगठन उसे दिशा, प्रेरणा और सामर्थ्य प्रदान करता है, जिससे उसका कर्म अधिक प्रभावशाली और व्यापक बनता है।

हमारे शास्त्रों में भी यह सिद्धान्त प्रतिपादित है कि परमात्मा जब-जब अवतरित होते हैं, तब वे भी किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्म ही करते हैं जैसे एक अवतार हुए नृसिंह अवतार l 


नृसिंह रूप धरि प्रगट भए।

कनककसिपु करि मारा॥

कनककसिपु अर्थात् हिरण्यकशिपु जिनकी माता थीं दिति (दैत्यकुल की आद्या माता)  हिरण्याक्ष के वध के पश्चात् हिरण्यकशिपु ने कठोर तप कर वर प्राप्त किया और अत्यन्त अहंकारी तथा अत्याचारी बन गया।

हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे

प्रह्लाद, अनुह्राद, ह्राद और संह्राद l 

इनमें प्रह्लाद भगवान् विष्णु के परम भक्त थे, जबकि उनके अन्य तीनों भाई पिता की आज्ञा और दैत्य-परम्परा का ही अनुसरण करते थे।

प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उन्हें अनेक प्रकार से मारने का प्रयास किया, परन्तु वे प्रत्येक बार सुरक्षित रहे। अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे। होलिका को वर प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती।

वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी; परन्तु भगवान् की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका दग्ध होकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में होलिका-दहन का उत्सव मनाया जाता है।


होली उत्साह उमंगों का त्योहार सतयुगी स्मृति है, 

नर-जीवन का इतिहास तपस्वी अनुकृति है, 

हर पर्व देश का एक अनोखी शिक्षा है, 

हर शिक्षार्थी के लिए ज्ञान की भिक्षा है। 


इसके अतिरिक्त ह्राद और ह्लाद में क्या अन्तर है कयाधु (कयाधू ) कौन थीं, धुलेंडी क्या है जानने के लिए सुनें

3.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७८ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 3 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६०

सनातन धर्म में ज्ञान, साधना और जीवन-मूल्यों का अपार भण्डार निहित है। इसे तत्त्व में प्राप्त करने के लिए प्रातःकाल का जागरण नितान्त आवश्यक है साथ ही अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन लेखन पारस्परिक चर्चा भी करें l समय सारणी बना लें l 




समस्त संसार का संघर्ष वस्तुतः शान्ति की ही खोज है। मूल भारतीय चिंतन में इसी व्यापक शान्ति की साधना निहित है।

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।

वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥


इस मन्त्र में समस्त सृष्टि—द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियाँ, वनस्पतियाँ, देवता और ब्रह्म—सबमें समन्वित दिव्य शान्ति की कामना की गई है।

विश्व में स्थायी शान्ति तभी सम्भव है जब जीवन और समाज सुव्यवस्थित हों। वर्तमान समय में अव्यवस्था के कारण व्याकुलता, कष्ट और पीड़ा का विस्तार दिखाई दे रहा है अत्याचार और अन्याय की प्रधानता परिलक्षित हो रही है। समाज में अल्पसंख्यक–बहुसंख्यक जैसे विभाजनकारी विषयों की चर्चा से वातावरण उद्विग्न हो उठा है। चारों ओर अशान्त वातावरण  है। किन्तु ऐसे अशान्त और उथल-पुथल भरे समय में यदि हम प्रतिदिन प्रातःकाल आत्मबोध का प्रयत्न करें, तो संकट की घड़ी में भी समाधान खोजने की शक्ति प्राप्त हो सकती है।

अन्धकार चाहे जितना गहन क्यों न हो, हमारा कर्तव्य है कि हम जहां हैं, वहीं से प्रकाश का प्रसार करें। इसके लिए शिक्षा प्रधान है किन्तु वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था विकृत होकर अपने मूल स्वरूप से विचलित हो गई है  उसका ध्वस्तीकरण-सा प्रतीत होता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार-प्राप्ति तक सीमित रह गया है। संस्कार, चिन्तन और सम्यक् विचार का स्थान क्रमशः दूर होता जा रहा है। शिक्षा में भावना का अभाव है जिसके कारण विचार खंडित हो रहे हैं हमें इस ओर ध्यान देना होगा l शिक्षा में ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन और चरित्र-निर्माण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए l 

भैया पुनीत जी भैया मोहन जी की चर्चा क्यों हुई हल्दी घाटी का उल्लेख क्यों हुआ अश्विनी उपाध्याय किसे घटिया कहते हैं जानने के लिए सुनें l

2.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७७ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५९

अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन प्राणायाम लेखन अवश्य करें 


ये सदाचार वेलाएं दूरस्थ शिक्षा के अत्यन्त उत्कृष्ट और प्रेरणादायी माध्यम हैं। ईश्वरीय व्यवस्था के अन्तर्गत लगभग दस वर्षों से निरन्तर संचालित हो रही ये वेलाएं हमारे चरित्र, विचार और आचरण के परिष्कार के लिए समर्पित हैं। हमें अपने अद्भुत मनुष्यत्व की अनुभूति कराने के लिए अस्तित्व में हैं l ये वेलाएं हमें यह आत्मबोध कराने के लिए आयोजित की जा रही हैं कि हम मृत्यु से भयभीत न हों।


 प्रायः श्रवण, अध्ययन की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है, क्योंकि सुनते समय भाव, स्वर और अनुभूति का सीधा स्पर्श हृदय तक पहुँचता है। शिक्षा के प्रति व्यापक दृष्टि रखने वाले आचार्यजी हमें उत्साहित एवं मार्गदर्शित करने के लिए अपना बहुमूल्य समय प्रदान कर रहे हैं यह हमारे लिए परम सौभाग्य का विषय है। अतः हमें सजगता और कृतज्ञता के साथ इन अवसरों का पूर्ण लाभ उठाना चाहिए। तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में


हम युगभारती के सदस्यों को अपने प्रत्येक कार्य और आयोजन के पीछे किसी न किसी उच्च एवं स्पष्ट लक्ष्य की स्थापना करनी चाहिए। उद्देश्यहीन कर्म दिशाहीन हो जाते हैं, अतः कार्य का आधार सदैव उदात्त और लोककल्याणकारी होना आवश्यक है। यदि हमारे प्रयत्न राष्ट्र और समाज की उन्नति, संरक्षण तथा समृद्धि के लिए समर्पित हों, तो वे अर्थपूर्ण बनते हैं।

देश और समाज ही हमारे जीवन की चेतना, प्रेरणा और शक्ति के मूल स्रोत हैं। इन्हीं से हमें संस्कार, पहचान, सुरक्षा और अवसर प्राप्त होते हैं। अतः अपनी प्राणशक्ति, समय और सामर्थ्य को उनके उत्कर्ष में नियोजित करना ही कर्तव्यबोध और सच्चे राष्ट्रधर्म का परिचायक है l इसके लिए संगठित रहकर, एक-दूसरे का सहारा बनकर, और उच्च उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहकर  हम अपने जीवन को सार्थक बनाएं तथा राष्ट्र, समाज और धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का सम्यक् पालन करें l


आचार्यजी ने अपनी रचित  किस कविता के माध्यम से यह संदेश दिया कि हम अपने को दुर्बल न समझें । हमारे भीतर असीम शक्तियां , साहस, विवेक, करुणा और धर्मनिष्ठा आदि गुण विद्यमान हैं  किन्तु वे सुप्त अवस्था में रहते हैं। आवश्यकता केवल उनके जागरण की है, भैया पंकज जी से आचार्य जी क्या अपेक्षा कर रहे हैं भैया मनीष जी का उल्लेख क्यों हुआ, आठ मार्च की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

1.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७६ वां* सार -संक्षेप

 ज्ञान तब सार्थक होता है जब वह आचरण में उतरकर जीवन का दृष्टिकोण बदल दे। आत्मा की अमरता का बोध हमें स्थिरता, निर्भयता और उच्च जीवन-मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५८

अपने सद्ग्रंथों का अध्ययन करें इससे हम संसार को समझने का सामर्थ्य अपने भीतर ला सकेंगे कभी निराश हताश नहीं होंगे 



युगभारती संस्था, जो शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलंबन और सुरक्षा नामक चार आयामों के आधार पर कार्यरत है, जिसका लक्ष्य है 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः,

संबंधों का एक सुन्दर पुष्पगुच्छ है। यदि हम परस्पर संबंधों को सुदृढ़ और विस्तृत करते रहेंगे , तो यह संस्था कभी क्षीण नहीं होगी।

प्रेम और आत्मीयता का विस्तार ही इसकी वास्तविक शक्ति है। जब संबंधों की गरिमा और एकता का साक्षात् प्रदर्शन होगा, तब भारतीय सनातनधर्मी समाज आश्वस्त होगा। उसका भय और भ्रम दूर होगा, अंधकार में उसे प्रकाश की अनुभूति होगी  और यह विश्वास दृढ़ होगा कि हम संगठित होकर दुष्ट प्रवृत्तियों से स्वयं को तथा अपने स्वजनों को सुरक्षित रख सकते हैं। संसार में स्वच्छता नितान्त आवश्यक है l 

यह हमारा परम सौभाग्य है कि आचार्यजी प्रतिदिन तात्त्विक पृष्ठभूमि से युक्त  इन सदाचारमय संदेशों द्वारा हमें प्रेरित कर रहे हैं। हमें चाहिए कि हम इन उपदेशों का सम्यक्‌ लाभ उठाकर  आत्मदीप हो जाएं  और अपने जीवन को उत्कृष्ट एवं सार्थक बनाएं।


हम सभी संसारी मनुष्यों में दिव्यता निहित है। हमारे भीतर अद्वितीय शक्तियां और संभावनाएं विद्यमान हैं, जिन्हें जाग्रत करने की आवश्यकता है। इसके लिए नियमित अध्ययन, स्वाध्याय, चिन्तन-मनन, लेखन तथा व्यायाम अनिवार्य साधन हैं। प्रातःकाल शीघ्र जागकर आत्मबोध, अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप, शक्तियों और उद्देश्य का ज्ञान,का अभ्यास करना चाहिए l कवि बिहारी के जीवन के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, अष्टावक्र जब जनक को ज्ञान दे रहे थे उस समय उनकी आयु क्या थी और जनक के क्या प्रश्न थे , दीनदयाल जी Toilet Paper के विषय में क्या कहते थे  जानने के लिए सुनें l