30.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३५ वां* सार -संक्षेप

 नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥3॥


अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥

करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥4॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१७

व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और व्यापक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए हम आज से ही कटिबद्ध हो जाएं l आपत्ति के समय बुद्धि भ्रमित न हो इसका प्रयास करें l 

खानपान विकृत न रखें l 



किष्किन्धा काण्ड के माध्यम से भगवान् राम यह बताते हैं कि इस भारत राष्ट्र की समस्या केवल इतनी नहीं है कि रावण अत्याचारी है, बल्कि यहाँ का एक बहुत बड़ा वर्ग इस व्यामोह में फँस गया है कि वह स्वयं भी रावण बन सकता है। और जब प्रत्येक व्यक्ति रावण बनने की मानसिकता में बैठ जाएगा , तब राष्ट्र को बचाने वाला कौन रहेगा। किसी भी समाज या राष्ट्र का पतन केवल बाहरी शत्रु के कारण नहीं होता, बल्कि उससे कहीं अधिक विकट वह स्थिति होती है जब समाज के भीतर ही लोग स्वार्थ, अहंकार और अधिकार-लोलुपता के वशीभूत होकर उसी मार्ग पर चलने लगते हैं, जिस पर चलकर रावण जैसा चरित्र उत्पन्न होता है। रावण केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है lजब यह प्रवृत्ति समाज में फैलने लगती है, तब समस्या किसी एक रावण के नाश से समाप्त नहीं होती।

किष्किन्धा काण्ड में बालि और सुग्रीव का प्रसंग इसी सत्य को स्पष्ट करता है। बालि में अपार शक्ति थी, परंतु उसने अपने ही भाई के अधिकार का हरण कर लिया और अन्याय का मार्ग अपनाया। यह  यह दर्शाता है कि जब शक्ति के साथ मर्यादा और धर्म का अभाव हो जाता है, तब वही शक्ति विनाश का कारण बनती है। दूसरी ओर सुग्रीव 


 (पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥

सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥ )

भय और भ्रम में जी रहा था,वह शक्तिहीन होने का अनुभव करता था परंतु जब उसे सही मार्गदर्शन मिला, तब वह धर्म के पक्ष में खड़ा हुआ और भगवान् राम के कार्य में सहयोगी बना। आज के संदर्भ में इसे देखें तो समाधान यह है कि हम अपने आचरण को मर्यादित बनाएं अहंकार का त्याग करें और सामूहिक हित को प्राथमिकता दें । जब समाज में हमारे समान अधिक से अधिक लोग (सनातन) धर्म के पक्ष में खड़े होंगे , तभी रावण जैसी प्रवृत्तियों का अंत संभव होगा और राष्ट्र सुरक्षित रह सकेगा l


क्या कबन्ध ने भी भगवान् राम से कहा था कि आप सुग्रीव के पास जाइये 

"सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।

प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि" किसने कहा   परचून की दुकान कौन है भैया संतोष मिश्र जी की चर्चा क्यों हुई जानने के सुनें

29.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३४ वां* सार -संक्षेप

 हमने पूरी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब परिवार कहा

दुनिया ने जिसको ठुकराया आगे बढ़ उसका हाथ गहा

हम जीव मात्र को सदा दया का द्वार दिखाते आए हैं 

परहित में अपना तन मन धन घर-बार लुटाते आए हैं

अपने जैसा सबको माना जो कुछ दुनिया में दृश्यमान ॥ १ ॥

भारत महान् भारत महान्....

तब इस महान् भारत ने अपने इतिहास में दुर्दशा के कई काल क्यों देखे यह एक गम्भीर चिन्तन का विषय है..


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१६


अपने भीतर निहित शक्तियों की अनुभूति करें

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् 

अपने भावों को जाग्रत करने के लिए मानस आदि का अध्ययन करें 



तुलसीदास जी का चिन्तन अद्भुत है ऐसा कहा जाता है कि वाल्मीकि ही तुलसीदास बनकर आये भारत का ऐसा अवतारत्व हमें असीमित रूप से संबल प्रदान करता है

इसी संबल को लेकर कवि कहता है

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥

जब जब होई... कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब.... धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥



श्रीरामचरितमानस की रचना तुलसीदास जी ने अत्यन्त विषम परिवेश में की उस समय भारत में दुष्ट अकबर का शासन था। भारत की अस्मिता पर प्रहार हो रहा था l सामाजिक और धार्मिक स्तर पर अनेक चुनौतियाँ थीं। ऐसे दौर में तुलसीदास जी ने  श्री रामचरितमानस के माध्यम से सनातन धर्म, भक्ति और नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित कर भारतीय समाज को एकता और संगठन का संदेश दिया।

वर्तमान परिस्थितियां भी अत्यन्त विकट हैं हमें इस ओर ध्यान देना होगा हम खाने और सोने के लिए पैदा नहीं हुए हैं अपने कर्तव्य को समझें 

अपने आत्मस्थ तत्त्व का दर्शन करें 


डा जी एन वाजपेयी के पास कौन संत आये थे, मां सीता के निर्वासन की चर्चा क्यों हुई  माया का पर्दा कैसे हटता है जानने के लिए सुनें

28.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३३ वां* सार

 राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥10॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१५

संपूर्ण भारत में स्थान स्थान पर हमें शक्ति भक्ति विचार विश्वास का प्रयोग करना होगा 

हम स्वयं जागें और दूसरों को भी जाग्रत करें तभी राष्ट्र सच में सशक्त और जीवंत बनेगा 



साहित्यावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में कथा को अद्भुत रूप से एक सूत्र  में पिरोया है जहाँ सिद्धान्त  और व्यवहार  साथ-साथ चलते हैं।किष्किन्धा काण्ड के इस प्रसंग में, जब इन्द्रावतार बालि का वध हो चुका है, तब कथा केवल एक युद्ध या न्याय की घटना नहीं रह जाती, बल्कि संसार और असंसार (माया और वैराग्य) की गहन चर्चा का माध्यम बन जाती है।

बालि की मृत्यु केवल एक वीर का पतन नहीं, बल्कि अहंकार, आसक्ति और भोगप्रधान जीवन के अंत का संकेत है। बालि अत्यन्त शक्तिशाली था, परंतु उसका जीवन संसार में अत्यधिक आसक्ति (राज्य, बल, प्रतिष्ठा) से बंधा हुआ था। इसलिए उसकी मृत्यु हमें यह सिखाती है कि चाहे कितना भी बल या वैभव हो, यदि जीवन केवल संसार में उलझा है, तो उसका अंत निश्चित है।

इसके विपरीत, इसी प्रसंग में सूर्यावतार सुग्रीव का चरित्र सामने आता है। सुग्रीव भी पहले भय और मोह में था, लेकिन  भगवान् राम के संपर्क में आकर उसका जीवन असंसार की ओर मुड़ता है । एक और अद्भुत चरित्र है तारा 


तारा का चरित्र श्री रामचरितमानस में कई स्तरों पर चमकता है। वह केवल बाली की पत्नी नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी, नीति-निपुण और आध्यात्मिक रूप से जाग्रत नारी है बाली की मृत्यु के बाद तारा विलाप में डूबकर असंतुलित नहीं होती, बल्कि उसी क्षण भगवान् राम के स्वरूप को पहचानकर उनसे भक्ति का वर माँगती है


तारा का जीवन जटिल परिस्थितियों से भरा था, फिर भी उसने विवेक, मर्यादा और भक्ति को नहीं छोड़ा इसीलिए वह पंचकन्या में स्थान पाती है।


अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।

जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥

यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।

गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये॥2॥


तारा कहती है 

हे नाथ! अब कृपा करके मेरी ओर देखिए और मुझे वह वरदान दीजिए जो मैं माँग रही हूँ। मैं जिस-जिस योनि में कर्मवश जन्म लूँ, वहाँ-वहाँ मेरे हृदय में आपके चरणों के प्रति प्रेम बना रहे।

यह मेरा पुत्र अंगद विनय, बल और गुणों में मुझसे भी बढ़कर है, अतः हे कल्याण देने वाले प्रभु! इसे स्वीकार कीजिए। इसकी भुजा पकड़कर आप इसे अपना दास बना लीजिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कथा के विस्तार में और क्या बताया , क्या भक्ति केवल घंटी बजाना है, भैया अखिल तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

27.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३२ वां* सार -संक्षेप

 अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।

जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥

यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।

गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१४

समय पर शौर्य,शक्ति को प्रकट करें 

जीवन के तत्त्व, जीवन के सत्य, कन्या भाव, ब्रह्मचर्य आदि से नयी पीढ़ी को अवगत कराएं 



प्रातःकाल की ये सदाचार वेलाएं अद्भुत हैं आनन्द के इन क्षणों में सुनने को मिलने वाले सदाचारपूर्ण विचार मन को शुद्ध कर देते हैं और पूरे दिन के लिए नई ऊर्जा, प्रेरणा एवं सकारात्मकता प्रदान करते हैं तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में 

आजकल हम किष्किन्धा कांड के प्रसंगों को सुनकर भावविभोर हो रहे हैं 

किष्किन्धा कांड वास्तव में अद्भुत है, क्योंकि यह केवल कथा का एक चरण नहीं, बल्कि जीवन के अनेक गूढ़ सिद्धांतों का सजीव दर्शन कराता है। इसमें भगवान् राम का वनवासी जीवन मित्रता, नीति, धैर्य और कर्तव्य के साथ एक नए मोड़ पर आता है।

इस कांड में भगवान् राम और सुग्रीव की भेंट होती है। दोनों अपने-अपने दुःख से पीड़ित हैं— भगवान् राम  मां सीता की खोज में हैं तो सुग्रीव अपने भाई बालि के भय से वन में भटक रहे हैं। यहाँ यह संदेश मिलता है कि समान पीड़ा वाले व्यक्ति सहज ही एक-दूसरे के सच्चे मित्र बन जाते हैं।  भगवान् राम और सुग्रीव की मित्रता केवल स्वार्थ पर आधारित नहीं है, बल्कि विश्वास, सहयोग और धर्म पर आधारित है।

हनुमान जी 

(“रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।”)

का प्रथम दर्शन भी इसी कांड में होता है। वे  भगवान् राम के प्रति अपनी बुद्धि, विनम्रता और सेवा भाव से तुरंत जुड़ जाते हैं। यह यह दर्शाता है कि सच्चा सेवक वही है जो अपने स्वामी को पहचानकर पूर्ण समर्पण से कार्य करे।

बालि और सुग्रीव का प्रसंग नीति और धर्म का गहन विवेचन प्रस्तुत करता है।

जब बालि ने सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया, तब उसने सुग्रीव की पत्नी रूमा को भी अपने अधिकार में रख लिया। यही एक बड़ा अधर्म था, क्योंकि छोटे भाई की पत्नी को अपनी पुत्री के समान मानना चाहिए। इसी अन्याय के कारण भगवान् राम बालि का वध कर देते हैं 



 अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥

इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥4॥


 भगवान् राम ने कहा- हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता है 

इस चौपाई का मूल उद्देश्य समाज में स्त्री के प्रति शुद्ध दृष्टि और मर्यादित व्यवहार स्थापित करना है। यहाँ “कन्या समान” कहकर यह बताया गया है कि स्त्री को भोग की वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और संरक्षण के योग्य समझना चाहिए। यह केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक रूप से यह सिखाता है कि हर स्त्री के प्रति मन, वचन और कर्म से पवित्रता रखनी चाहिए।

“कुदृष्टि” केवल शारीरिक दृष्टि नहीं है, बल्कि मन में उठने वाले विकृत विचार भी इसमें आते हैं। इस प्रकार यह चौपाई मनुष्य को अपने भीतर के संस्कारों को शुद्ध रखने की शिक्षा देती है। समाज की स्थिरता, विश्वास और पवित्रता इसी पर आधारित होती है कि पुरुष अपनी दृष्टि और आचरण को संयमित रखे।

अन्ततः यह संदेश केवल दण्ड की बात नहीं करता, बल्कि चेतावनी देता है कि यदि मनुष्य अपनी दृष्टि को नियंत्रित नहीं करेगा, तो उसका पतन निश्चित है।

इसके अतिरिक्त पत्नी और अर्धांगिनी के क्या अर्थ हैं, अंगद की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

26.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३१ वां* सार -संक्षेप

 कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ। 

जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ ll 


बालि कहता है—हे प्रिय (सुग्रीव)! सुनो, भगवान् श्रीराम समदर्शी हैं, वे सबके प्रति समान भाव रखते हैं। यदि वे किसी प्रकार मुझे मार भी दें, तो भी मैं पुनः सनाथ  हो जाऊँगा अर्थात् उनका आश्रय पाकर मेरा कल्याण ही होगा।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१३


अपने अहं को त्यागकर सामूहिक शक्ति से जुड़ने, राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित होने तथा मिलकर आगे बढ़ने का संकल्प लें 


संगठन सूत्र में मचल-मचल हम आज पुनः बंधते जाते...


आज कल हम लोग उन तुलसीदास जी जिन्हें भगवान् राम का वह स्वरूप प्रिय है जो भक्तों की रक्षा करे, दुष्टों का नाश करे और समाज में धर्म की स्थापना करे, कृत श्रीरामचरित मानस के किष्किन्धा कांड में प्रविष्ट हैं कथा तो अत्यन्त रोचक और मोहक है इससे हमें शिक्षा भी मिल रही है 


बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा॥

सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥10॥


यहां बालि के अप्रतिम बल और प्रभाव को दिखाया गया है, साथ ही यह भी कि कभी-कभी विपरीत परिस्थितियाँ (जैसे बालि का अत्याचार) भी अंततः ईश्वर से मिलाने का माध्यम बन जाती हैं।


सुग्रीव का विरक्त हो जाना 

(अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥)

वास्तव में कथा की गति को प्रभावित करता क्योंकि वही सेतु बनते हैं जिनके माध्यम से हनुमान का मिलन भगवान् राम से होता है और आगे सीता की खोज तथा रावण वध की पूरी योजना आगे बढ़ती है। इस दृष्टि से, यदि सुग्रीव पूरी तरह विरक्त होकर भजन में ही लग जाते, तो कथा का स्वरूप अवश्य परिवर्तित हो जाता।   ( प्रभु राम तो लीला करने के लिए अवतरित हुए हैं उनकी लीला भंग हो जाएगी यदि सुग्रीव ज्ञानी हो जाएंगे )


ये प्रसंग अद्भुत हैं इन्हें प्रयासपूर्वक जानकर यदि इनसे हम अपने विचार अनुस्यूत कर लें और अपनी संतानों को   इनसे अवगत कराएं तो निश्चित रूप से वे मेधासंपन्न शक्तिसम्पन्न बन सकते हैं 

इसके अतिरिक्त जयशंकर प्रसाद की चर्चा क्यों हुई,  कथा में तारा ने क्या समझाया जानने के लिए सुनें

25.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१२


नयी पीढ़ी को भारत की वास्तविक शिक्षा से परिचित कराना आवश्यक है 



हम अपने जीवन को केवल संघर्ष, पीड़ा और कठिनाइयों का बोझ मानकर न जिए, बल्कि परमात्मा द्वारा रचित इस सुंदर सृष्टि को अनुभव करते हुए उसमें आनंद खोजें । जीवन में अनेक प्रकार की बाधाएँ, कष्ट और चुनौतियाँ आती हैं, परंतु यदि हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक और ईश्वर-स्मरण से युक्त हो, तो वही कठिन यात्रा भी सुखद और अर्थपूर्ण बन सकती है। भारत की मनीषा का यह संदेश हमें सिखाता है कि जीवन की यात्रा चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हो, यदि हमारी दृष्टि सम्यक् और हृदय प्रसन्न है, तो वही यात्रा सुखमय, सार्थक और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन जाती है। तो आइये इसी संदेश का स्मरण करते हुए प्रवेश करें आज की वेला में


इस समय हम किष्किन्धा कांड में प्रविष्ट हैं 

सूर्यांश सुग्रीव बड़े  भाई के व्यवहार से अत्यन्त व्याकुल हैं उनकी व्याकुलता को दूर करने का प्रयास चल रहा है 

धनुष-भंग का प्रसंग, ताड़का-वध, मारीच और सुबाहु का संहार, तथा खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे राक्षसों का वध—इन सभी पराक्रमपूर्ण घटनाओं को सुग्रीव ने अवश्य ही सुन रखा होगा। फिर भी उसका स्वभाव शंकालु था, क्योंकि वह अपने भाई बाली के भय से सदैव आशंकित और असुरक्षित रहता था।

अतः यद्यपि वह श्रीराम के पराक्रम से परिचित था, तथापि प्रत्यक्ष प्रमाण के बिना उसका संशय दूर नहीं हो पा रहा था। यही कारण है कि वह बार-बार  भगवान् श्रीराम की शक्ति के प्रति आश्वस्त होने का प्रयास करता है।


कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥ दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥6॥


सुग्रीव पहले  भगवान् श्रीराम को बालि की असाधारण शक्ति का परिचय कराते हैं, ताकि वे स्थिति की गंभीरता समझें। किन्तु भगवान् अपनी सहज लीला से ही यह सिद्ध कर देते हैं कि वे बालि से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं, जिससे सुग्रीव का विश्वास दृढ़ हो जाता है।

यह प्रसंग भगवान् के दिव्य सामर्थ्य और भक्त के मन में विश्वास उत्पन्न करने की लीला को दर्शाता है।


उपजा ज्ञान बचन तब बोला। 

नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।। 

 सुख सम्पति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ll 

जब सुग्रीव के हृदय में ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब उसने विनम्र वाणी में कहा—

हे नाथ! आपकी कृपा से मुझे मन की शांति, सुख, संपत्ति, परिवार और प्रतिष्ठा—सब कुछ प्राप्त हो सकता है; किन्तु मैं इन सबका त्याग करके केवल आपकी सेवा ही करूँगा।

सुग्रीव यदि पूर्णतः विरक्त होकर केवल भजन में लग जाते, तो तत्काल दृष्टि से यह लगता है कि रावण के वध में कठिनाई आती क्योंकि वानर सेना का संगठन, सीता की खोज, और लंका तक पहुँचने का मार्ग मुख्यतः सुग्रीव के सहयोग से ही संभव हुआ। रावण-वध कठिन या विलंबित हो सकता था, क्योंकि सुग्रीव का संगठन और सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। विद्या और अविद्या दोनों को जानना आवश्यक है क्योंकि संसार का कलुष भी दूर करना आवश्यक है यही वास्तविक शिक्षा है l यही शौर्यप्रमंडित अध्यात्म है l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने लक्ष्मण गीता की चर्चा क्यों की,आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें

24.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२९ वां* सार -संक्षेप

 सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥

सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥5॥

मूर्ख सेवक, अविवेकी (अज्ञानी) राजा, कंजूस व्यक्ति, दुष्ट स्त्री और कपटी मित्र—ये चारों शूल (काँटे) के समान पीड़ादायक होते हैं।

इसलिए हे मित्र! तुम चिंता छोड़ दो और मेरे बल पर विश्वास रखो; मैं तुम्हारा कार्य हर प्रकार से सिद्ध कर दूँगा।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २११


हमारा धर्म है कि हम अपने मित्र को बुरे मार्ग से हटाकर अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें । उसके गुण प्रकट करें और अवगुणों को छिपाएं l


आचार्य जी इन वेलाओं के माध्यम से नित्य हमें ऊर्जा  और उत्साह प्रदान करते हैं,सत्कर्मों के लिए प्रेरित करते हैं  राष्ट्रभक्ति के लिए संकल्प जगाते हैं यह हमारा सौभाग्य है 

हम भगवान् राम की कथा सुन रहे हैं, जिन्होंने मनुष्य रूप में अवतार लेकर हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा दी। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग धर्म, मर्यादा और करुणा का संदेश देता है। इस समय हम प्रविष्ट हैं किष्किन्धा कांड में 

इसी क्रम में , अतुलित बल के धाम, शक्ति के आगार, भक्ति के साकार स्वरूप, शिव और शक्ति के अद्भुत संगम हनुमान जी, भगवान् राम को सुग्रीव के पास ले जाते हैं।

सुग्रीव जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था, जैसे उनके बड़े भाई बाली इन्द्र के अंश से उत्पन्न माने जाते हैं,अत्यन्त दुःखी और भयभीत हैं, क्योंकि उनके भाई बाली ने उन्हें पराजित कर न केवल उनका राज्य छीन लिया, बल्कि उनकी पत्नी को भी अपने अधिकार में कर लिया। इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं 

“रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी।

हरि लीन्हसि सर्बसु अरु नारी॥

ताके भय रघुबीर कृपाला।

सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥”


बाली ने मुझे शत्रु के समान बहुत मारा-पीटा, मेरा सब कुछ छीन लिया। उसी के भय से, हे रघुवीर! मैं सम्पूर्ण जगत् में दुःखी होकर भटक रहा हूँ।


भगवान् राम उन्हें विश्वास दिलाते हुए कहते हैं हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे ऐसा शौर्य का विश्वास भगवान् राम ने प्रकट किया l

मानस के ये अद्भुत प्रसंग हैं हम इनमें अवगाहन करें अर्थात् शब्दों से आगे बढ़कर उनके भाव, संदेश और जीवन में प्रयोग को समझें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मित्र का अर्थ किस प्रकार स्पष्ट किया? आचार्य जी ने अपने किन शिक्षकों का उल्लेख किया जानने के लिए सुनें

23.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२८ वां* सार -संक्षेप

 राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१०

अपने हित की अपेक्षा मित्र के सुख-दुःख को अधिक महत्त्व दें 


जे न मित्र दु:ख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥

निज दु:ख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दु:ख रज मेरु समाना॥1॥

ये पंक्तियां हैं किष्किन्धा कांड की 

इनको विश्लेषित कर यदि हम चर्चा करें तो हमारा निश्चित रूप से ज्ञानवर्धन होगा 


जो व्यक्ति अपने मित्र के दुःख को देखकर स्वयं दुःखी नहीं होता, ऐसे व्यक्ति को देखना भी पाप के समान कहा गया है। इसका आशय यह है कि जिसमें संवेदनशीलता और सहानुभूति का अभाव है, वह सच्चा मित्र नहीं हो सकता।


सच्चा मित्र अपने बड़े से बड़े दुःख को भी तुच्छ समझता है, अर्थात् उसे धूल के समान छोटा मान लेता है। इसके विपरीत, वह अपने मित्र के छोटे से छोटे दुःख को भी अत्यन्त बड़ा मानता है, जैसे वह सुमेरु पर्वत के समान भारी हो।


सच्ची मित्रता का आधार निस्वार्थता, त्याग, करुणा और आत्मीयता है। सच्चा मित्र वही है जो अपने हित की अपेक्षा मित्र के सुख-दुःख को अधिक महत्व देता है और उसके कष्ट को अपना कष्ट मानकर उसकी सहायता के लिए तत्पर रहता है।


जब मित्रता इस आदर्श पर आधारित होती है कि हम अपने दुःख को छोटा और साथी के दुःख को बड़ा मानें, तब संगठन केवल लोगों का समूह नहीं रह जाता, बल्कि वह संवेदनाओं और विश्वास से जुड़ा हुआ परिवार बन जाता है।

भावों का संप्रेषण शक्ति प्रदान करता है l 

ऐसी मित्रता में प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख का सहभागी बनता है। इससे परस्पर विश्वास दृढ़ होता है और मन में किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या या स्वार्थ की भावना स्थान नहीं पाती। जब हर सदस्य यह अनुभव करता है कि संकट के समय सभी उसके साथ खड़े हैं, तब उसके भीतर संगठन के प्रति निष्ठा और समर्पण स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।

इस प्रकार का वातावरण सहयोग, त्याग और आत्मीयता को जन्म देता है। निर्णय सामूहिक हित को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं और कार्यों में एकजुटता दिखाई देती है। परिणामस्वरूप संगठन की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और वह बड़े से बड़े लक्ष्य को भी सहजता से प्राप्त कर सकता है।आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमारा युगभारती संगठन भी ऐसा ही हो l

भैया राजीव शर्मा जी (मुम्बई ), भैया डा पंकज श्रीवास्तव जी, भैया डा अमित गुप्त जी, भैया शलभ जी(यू एस ए ), भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी ने  किस प्रकार स्पष्ट किया कि भगवान् राम को भी इस संसार की पीड़ा सता गयी,कवि आत्मबोधोत्सव कैसे मनाता है जानने के लिए सुनें

21.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२७ वां* सार

 कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०९

आत्मस्थ होने का प्रयास करें अपने भीतर की शक्ति की अनुभूति कर आनन्दित रहने का अभ्यास करें 

ध्यान, प्राणायाम, अध्ययन,स्वाध्याय, मनन भी करें 



सांसारिकता के प्रभाव से हमारा चित्त बाह्य वस्तुओं, संबंधों और सुख-साधनों में उलझ जाता है। इसी उलझाव से हमारे भीतर लोभ,मोह, मद और मत्सर  जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। जब मन बार-बार बाह्य विषयों की ओर दौड़ता है, तब हम अपनी वास्तविक शांति और संतुलन खो देते हैं ।

परन्तु यदि हम आत्मस्थ हो जाएं , अर्थात् अपने भीतर स्थित आत्मस्वरूप में स्थित रहने का अभ्यास करें जिससे हमें अनुभव हो कि हमारा वास्तविक अस्तित्व केवल इस नश्वर शरीर तक सीमित नहीं है शरीर तो प्रकृति से बना एक साधन मात्र है, जो समय के साथ बदलता और नष्ट हो जाता है; परन्तु हमारे भीतर स्थित आत्मा शाश्वत, चेतन और अजर-अमर है तो ये विकार स्वतः क्षीण होने लगते हैं। जब हम अपने भीतर की इस शांति और संतोष को पहचान लेंगे , तब बाह्य वस्तुओं के प्रति हमारा आकर्षण स्वतः कम हो जाएगा l आत्मस्थ व्यक्ति परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, बल्कि समत्वभाव से सबका सामना करता है। वह न तो अधिक प्राप्त होने पर अहंकार करता है और न ही अभाव में निराश होता है।


मनुष्य आत्मस्थ होकर भीतर की ओर मुड़ता है, तब वह प्रभु की कृपा का पात्र बनता है।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥

 यह मानसकार अर्थात् गोस्वामी तुलसीदास जी के भीतर का भाव बोल रहा है l 

आइये प्रवेश करें इसी मानसकार की अद्भुत कृति श्रीरामचरित मानस जो केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभूति है, जो मनुष्य को आत्मस्थता, भक्ति और परम शांति की ओर अग्रसर करती है, के किष्किंधा कांड में

सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।

एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।

जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥

जब सुग्रीव ने भगवान राम के दर्शन किए, तब उसने अपने जन्म को अत्यंत धन्य मान लिया। उसे लगा कि उसका जीवन सफल हो गया, क्योंकि उसे प्रभु का साक्षात् सान्निध्य प्राप्त हुआ।

इस कथा से हमें अनेक व्यावहारिक संदेश भी मिलते रहते हैं हम उन पर भी ध्यान दें 

इस कथा के विस्तार में आचार्य जी ने क्या बताया,सशर्त प्रेम और शर्तविहीन प्रेम में क्या अन्तर है, भैया पुरुषोत्तम जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

20.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया /चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया /चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०८

सदैव यह ध्यान रखें कि हम उस संस्कृति में जन्मे हैं जिसने कहा वसुधैव कुटुम्बकम् 

इस भाव और विचार को जो  राष्ट्रभक्त अनुभव करता है भ्रमित और व्याकुल नहीं है उसे एक दूसरे के साथ संयुत रहना अच्छा लगता है l हम भी एक दूसरे के साथ संयुत रहने का प्रयास करें क्योंकि संगठन में अपार शक्ति निहित है l 



प्राचीन भारत में शिक्षा केवल जानकारी देने का साधन नहीं थी, बल्कि जीवन के संपूर्ण विकास का मार्ग थी। उस समय के शिक्षक वास्तव में तत्त्वदर्शी (सत्य के ज्ञाता), आत्मदर्शी (स्वयं के भीतर स्थित परमात्मा को अनुभव करने वाले), पारदर्शी (निष्कपट और चरित्रवान् ) तथा सुयोग्य (समग्र रूप से सक्षम) होते थे।

ऋषि-मुनि जैसे आचार्य उदाहरणार्थ वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य केवल पाठ पढ़ाने वाले गुरु नहीं थे, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाले मार्गदर्शक थे। उनकी शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धि का विकास नहीं, बल्कि मन, आचरण और आत्मा का परिष्कार था।

गुरुकुल प्रणाली में विद्यार्थी प्रकृति के बीच रहकर अनुशासन, संयम, सेवा, पराक्रम और सत्यनिष्ठा का अभ्यास करते थे। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण था, न कि केवल रोज़गार प्राप्ति। इसी कारण उस समय का ज्ञान विज्ञान, दर्शन, गणित, आयुर्वेद, खगोल आदि अनेक क्षेत्रों में भारत को अत्यंत ऊँचाई तक ले गया और भारत “विश्वगुरु” कहलाया।

इसके साथ ही, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हर युग की अपनी परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ होती हैं। आज भी यदि शिक्षक उसी तत्त्वदर्शिता, आत्मदर्शिता और चरित्र की दृढ़ता को अपनाएँ, तो शिक्षा पुनः उतनी ही प्रभावी और जीवनदायी बन सकती है।उस समय के शिक्षक विशिष्ट मार्गदर्शक होते थे और शिष्य समर्पण व सेवा भाव से ज्ञान ग्रहण करते थे l सेवक -सेव्य का भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l भगवान् राम भी हनुमान जी से कहते हैं मुझे समदर्शी कहा जाता है अर्थात् न मुझको कोई प्रिय है और न ही अप्रिय किन्तु सेवक मुझे अत्यन्त प्रिय लगता है 


सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥

समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥4॥

यह प्रसंग है किष्किन्धा कांड का 

हनुमान जी को समझ में आ गया कि भगवान् ने उन्हें सेवा का प्रतिसाद दे दिया 


देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥

नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥1॥


हनुमान जी कहते हैं—हे प्रभु! जब मैंने आपको (अपने स्वामी को) अपने अनुकूल और करुणामय देखा, तब मेरे हृदय में अत्यंत हर्ष हुआ और मेरे सभी दुःख दूर हो गए।

हे नाथ! उस पर्वत पर वानरों के राजा निवास करते हैं, वे सुग्रीव हैं और वे आपके ही दास (सेवक) हैं।


एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥

जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥3॥

भारतीय संस्कृति के तत्त्व को समझने के लिए मानस की एक एक चौपाई एक एक छंद महत्त्वपूर्ण है 

मानस आज भी हमें शक्ति, युक्ति प्रदान करती है संकट में हमारा सहारा बनती है 

इसके अतिरिक्त युगभारती की वेबसाइट की चर्चा क्यों हुई, सेवा -पुस्तिका का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

19.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२५ वां* सार -संक्षेप

 देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥

नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०७

परमात्मा की संपूर्ण लीला में मन न लगाकर उस लीला में अपनी भूमिका को पहचानकर उसका निर्वहन हम पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ करें अपनी शक्ति भक्ति बुद्धि कौशल विश्वास चैतन्य को देश और समाज के कल्याण में लगाएं 

नई पीढ़ी को स्वाभिमानी राष्ट्रभक्त बनाएं 


भारत एक अद्भुत देश है, जिसकी प्रकृति, संस्कृति और परम्पराएँ अत्यन्त समृद्ध और विलक्षण हैं। यहाँ की विविधता, सौन्दर्य और आध्यात्मिकता इसे विशेष बनाते हैं। किन्तु ऐसे महान् और पवित्र वातावरण में भी कुछ लोग विकृत मानसिकता के कारण अपने स्वार्थ, अज्ञान या दुर्भावना से देश और समाज को हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं।अतः आवश्यक है कि हम इन नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानें, उनके प्रति सजग रहें और अपने आचरण, विचार तथा कर्तव्यनिष्ठा के माध्यम से देश की रक्षा और उन्नति में योगदान दें।हम अपने अभिनय को निष्ठापूर्वक निभाएं l सकारात्मक दृष्टिकोण, जागरूकता और नैतिकता के आधार पर ही हम इस अद्भुत देश की गरिमा को बनाए रख सकते हैं।

आचार्य जी नित्य प्रयास कर रहे हैं कि हमारे भीतर दृढ़ आत्मविश्वास जाग्रत हो। हमें यह अनुभूति बनी रहनी चाहिए कि भारत की यह पवित्र धरती असंख्य संकटों, आक्रमणों और विपत्तियों का सामना करने के पश्चात् भी अडिग, अजेय और चिरस्थायी रही है। इसका अस्तित्व क्षणभंगुर नहीं, बल्कि दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाला है।

अतः हमें ऐसे निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाले विचारों जैसे “हिन्दू समाज घट रहा है” या “हम दुर्बल हो गए हैं” को बार-बार दोहराना उचित नहीं है। इस प्रकार की धारणाएँ मनोबल को कमजोर करती हैं इसके स्थान पर आवश्यक है कि हम सजग, सक्रिय और आत्मविश्वासी बने रहें। हमें परिस्थितियों के प्रति जागरूक रहकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि हमारे भीतर उत्साह, साहस और कर्तव्यबोध सुदृढ़ हो, न कि निराशा और हताशा।




इसके अतिरिक्त ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का उल्लेख क्यों हुआ,भैया गोपाल जी को क्या  पक्षियों का कलरव अच्छा लगता था, भैया समीर राय जी की चर्चा क्यों हुई, हनुमान जी किस प्रकार के सेवक हैं इसे आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया, गीता प्रेस की एक पुस्तक हनुमान अंक की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

18.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०६

अध्यात्म का आनन्द लें और यह आनन्द अध्यात्म की अनुभूति में है 

अपने को भारत माता के सपूत समझकर अपने कर्तव्य को विस्मृत न करें हमारा कर्तव्य है राष्ट्र -निष्ठा 




यद्यपि संसार की माया अर्थात् मोह, आकर्षण, इच्छाएँ और भौतिक उलझनें हमें चारों ओर से घेर लेती हैं, फिर भी जीवन में कुछ ऐसे विशेष क्षण आते हैं जो हमें भीतर की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इन वेलाओं में हम बाहरी आडंबरों से हटकर अपने वास्तविक स्वरूप, आत्मा और परम सत्य के विषय में विचार करने की ओर उन्मुख हो सकते  हैं यही वह द्वार है, जहाँ से हम अध्यात्म की ओर प्रवेश कर सकते हैं

 तो आइये इसी प्रयास हेतु प्रवेश करें आज की वेला में


जब एक बलशाली व्यक्ति अहंकारवश दूसरे बलशाली से टकराता है, तो उसकी परिणति विनाशकारी होती है। सुग्रीव और बाली का संघर्ष इसका उदाहरण है, जहाँ परस्पर दंभ ने शक्ति को क्षीण कर दिया।

ऐसी ही स्थिति अकबर काल में भी दृष्टिगोचर होती है, जब भारत आंतरिक विभाजनों और संगठनहीनता के कारण दुर्बल हो गया था।

इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से  भारत के राष्ट्रभक्त समाज को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि संगठन, समन्वय और परस्पर सहयोग ही समाज की वास्तविक शक्ति है।

 उनके इष्ट भगवान् श्रीराम ने भी विभिन्न स्थलों पर जाकर, विविध समुदायों को साथ लेकर यह सिद्ध किया कि संगठित शक्ति ही धर्म की स्थापना और अन्याय के विनाश का आधार बनती है। संगठन वही है जो समाज को शक्ति प्रदान करे और संगठन का आधार है प्रेम आत्मीयता 


जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।

की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥1॥


 हे प्रभु! आप ही इस संसार के कारण (सृष्टिकर्ता) हैं, आप ही जीवों को संसार-सागर से पार उतारने वाले हैं, और जन्म-मरण के बंधन को नष्ट करने वाले हैं। आपने पृथ्वी का भार दूर करने के लिए मनुष्य के रूप में अवतार लिया है। क्या आप वही समस्त लोकों के स्वामी परमेश्वर नहीं हैं, जिन्होंने मानव रूप धारण किया है?

प्रच्छन्न वेश में हनुमान जी पूछ रहे हैं 

प्रसंग है किष्किन्धा कांड का 

भगवान् राम उत्तर देते हैं 

इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥

आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥2॥

भगवान् राम का सारल्य हनुमान जी को भीतर तक बेध जाता है 

आचार्य जी ने इसके आगे के प्रसंग में क्या बताया सात्विक प्रेम क्या है जानने के लिए सुनें

17.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०५


अपने इष्ट के प्रति भक्ति का भाव जाग्रत होने पर  और उनसे शक्ति प्राप्त करने के उपरान्त जो परिणाम प्राप्त होता है वह अत्यन्त कल्याणकारी हो जाता है। इससे हमारे भीतर निराशा और हताशा का स्थान नहीं रहता, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य और उत्साह का संचार होता है। भक्ति हमारे भीतर स्थिरता, आशा और सकारात्मक दृष्टि उत्पन्न करती है, जिससे हम विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते l

तुलसीदास जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन और काव्य को श्रीराम की भक्ति में समर्पित कर दिया। उनकी प्रमुख कृति रामचरितमानस तो पूर्णरूपेण भगवान् श्रीराम के जीवन, आदर्श और मर्यादा का वर्णन करती है।

भक्ति का सबसे सरल मार्ग “श्रवण” और “कीर्तन” है। जब मन बार-बार भगवान के गुणों में रम जाता है, तो वह स्वतः शुद्ध होकर उनसे जुड़ जाता है।


रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।

राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग॥


तुलसीदास जी कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति प्रेमपूर्वक भगवान् राम के गुण, चरित्र और लीलाओं का गान करता है या उन्हें सुनता है, उसके भीतर स्वतः ही भक्ति उत्पन्न हो जाती है। इसके लिए अलग से कठोर साधना—जैसे वैराग्य (विषयों का त्याग), जप (मंत्र साधना) या योग (ध्यान आदि)की अनिवार्यता नहीं रहती।

भगवान् राम के नाम का जब हम जप करते हैं तो उनके कार्य व्यवहार भी हमारे सम्मुख आ जाते हैं 

उन्होंने यह दिखाया कि अध्यात्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहकर धर्मपूर्वक कर्म करना है।


मानस में किष्किन्धा कांड भी है जिसमें भगवान् राम, लक्ष्मण, शिव जी, काशी की वन्दनाओं के पश्चात् 

चौपाई है 

आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया॥

तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥1॥

मानस में जो प्रसंग आये हैं वे  भावों में इतना अधिक तैराने लगते हैं कि सांसारिकता विस्मृत हो जाती है 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने माता जी का उल्लेख क्यों किया,विप्र का क्या अर्थ है, भगवान् राम ने   क्या अभिनय किया जानने के लिए सुनें

16.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२२ वां* सार -संक्षेप

 सत्य शील संयम त्रिवेणी में नहाँए रोज,

खोजने को तत्व सत्य माला जाप करते। 

हरते मनस्ताप सृष्टि-संकटों के बीच, 

नीच कीच बीच भूलकर न पाँव धरते। 

हिंसक स्वभाव हो न जाए कहीं भूलकर

 भी, 

छुरी का प्रयोग किसी काम में न करते। 

किन्तु दुष्ट म्लेच्छ जब इज्जत उतार देता,

हाय हाय और गालियों से पेट भरते ॥


(यहाँ उन लोगों पर व्यंग्य  है जो बाहर से तो अत्यंत धर्मपरायण, संयमी और अहिंसक दिखते हैं, लेकिन अन्याय और अपमान के समय कायरता दिखाते हैं। यह व्यंग्य उनकी निष्क्रियता और दिखावटी आदर्शवाद पर है। यहीं शौर्य प्रमंडित अध्यात्म महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिसमें आंतरिक शुद्धि के साथ-साथ अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी दिखता है ।)




प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०४

शिक्षा पर ध्यान दें क्योंकि यह मनुष्य को मनुष्यत्व की अनुभूति कराती है 

सुयोग्य जनों का संगठन,  जिसका मूल मन्त्र प्रेम और आत्मीयता है, अत्यन्त आवश्यक है इस पर ध्यान दें 

सिहों के लेहँड़ नहीं, हंसों की नहीं पाँत। लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलैं जमात॥ 




विषम परिस्थितियों में भी आचार्य जी नित्य हमें उद्बोधित करते हैं यह हम लोगों का सौभाग्य है हमें इन उद्बोधनों का लाभ उठाना चाहिए जो दिन भर की ऊर्जा हमें प्रदान करते हैं 


छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥

भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥3॥

(किष्किंधा काण्ड )

छोटी-छोटी नदियाँ (छुद्र नदियाँ) थोड़े से जल से ही भरकर उफनने लगती हैं, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति थोड़ा सा धन पाकर इतराने लगता है।

जब वही जल भूमि पर गिरता है तो वह गंदला (कीचड़युक्त) हो जाता है, जैसे जीव (मनुष्य) पर माया आकर लिपट जाती है।


तुलसीदास जी यहाँ प्रकृति के माध्यम से मानव स्वभाव को समझा रहे हैं। जैसे छोटी नदियाँ थोड़े जल में ही उफान दिखाती हैं, वैसे ही अल्प बुद्धि या दुष्ट प्रवृत्ति के लोग थोड़ी संपत्ति या सफलता पाकर घमंड करने लगते हैं। और जैसे पानी जमीन पर गिरकर गंदला हो जाता है, वैसे ही मनुष्य माया (अर्थात् मा +या = जो नहीं है ) के प्रभाव में आकर अपनी शुद्धता खो बैठता है। वह अनुभव ही नहीं कर पाता कि परमात्मा उसके भीतर ही बैठा हुआ है l वह संसारी मनुष्य ही बना रहता है और संसार के बारे में चिन्तन करता रहता है l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया अरविन्द जी की चर्चा क्यों की, १९ को किसकी बैठक है, अधिवेशन क्यों आवश्यक हैं जानने के लिए सुनें

15.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०३

हम युगभारती के सदस्यों को संसार को उसी की वास्तविकता और व्यवहार के अनुसार देखना चाहिए  तथा स्वयं को अपने अंतर्मन, विवेक और आत्मचिंतन की दृष्टि से समझने का अभ्यास करना चाहिए। इसी से आनन्द प्राप्त होगा l



जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।

फूटा कुंभ, जल जलहिं समाना, यह तत कथौ गियानी।। 

जैसे घड़े  के भीतर भी जल है और बाहर भी जल ही है, वैसे ही जीव और परमात्मा में कोई वास्तविक भेद नहीं है। घड़ा केवल एक सीमित आकार देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भीतर का जल अलग है और बाहर का जल अलग; परंतु वस्तुतः दोनों एक ही तत्व हैं।

जब घड़ा फूट जाता है, तब भीतर का जल बाहर के जल में मिल जाता है। उसी प्रकार जब मनुष्य का अहंकार, देहाभिमान और अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर परमात्मा में लीन हो जाता है। तब यह भेद मिट जाता है कि मैं अलग हूँ और ईश्वर अलग ज्ञानी व्यक्ति इसी सत्य को समझता है कि यह भेद केवल दिखने का है, वास्तविकता में हम सब एक ही परम तत्व की अभिव्यक्ति हैं।यही अद्वैत दर्शन है l इसी से ज्ञात होता है कि हमारे ज्ञान -चक्षु खुले हुए हैं इसमें हम आत्मदर्शन के साथ सजातीय व्यक्तियों का दर्शन भी करते हैं और इसी से हमारी निराशा हताशा कुंठा व्याकुलता दूर होती है l इसी तथ्य को हम अपने सजातीय भारत -भक्त जनों में भी स्पष्ट कर सकें तो समझ लें हम वास्तविक शिक्षा देने वाले शिक्षक हैं यही शिक्षा विश्व में शान्ति की स्थापना करने में सक्षम है पूरी वसुधा को अपना कुटुम्ब समझने में समर्थ है

परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अंधविश्वासी या असावधान बन जाएं l संसार में ऐसे लोग भी होते हैं जिनकी प्रवृत्ति हानिकारक होती है, इसलिए उनके प्रति सतर्क रहना भी आवश्यक है। हमें इसी शिक्षा का प्रचार प्रसार भी करना है l राष्ट्रवाद को उद्वेलित -प्रेरित करना है l सात्विक संगठन भी आवश्यक है जिससे सांसारिक क्रिया व्यवहार में सफलता मिल सके l 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्रद्धेय बचनेश जी की विशेष चर्चा क्यों की, भैया संतोष मिश्र जी का उल्लेख  क्यों किया,किस चर्चित शिक्षक की आचार्य जी ने चर्चा की जानने के लिए सुनें

14.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०२

संगठन में अहमहमिका वृत्ति से बचें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 


सतयुग में राजा रन्तिदेव की कथा अत्यन्त करुणा, त्याग और भक्ति का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।कहा जाता है कि एक समय उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। अन्न और जल का घोर अभाव हो गया। स्वयं राजा रन्तिदेव और उनका परिवार भी इस संकट से अछूता नहीं रहा। ऐसी स्थिति में उन्होंने ४८ दिनों तक उपवास(प्राजापत्य व्रत )किया, क्योंकि उनके पास खाने-पीने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था।

४८वें दिन बड़ी कठिनाई से उन्हें थोड़ा-सा अन्न और जल प्राप्त हुआ। जैसे ही वे उसे ग्रहण करने लगे, तभी क्रमशः कुछ अतिथि उनके द्वार पर आए—

पहले एक ब्राह्मण आया, राजा ने अपना भोजन उसे दे दिया।

फिर एक शूद्र आया, उसे भी अन्न दे दिया।

इसके बाद एक चाण्डाल अपने कुत्तों सहित आया, राजा ने शेष बचा अन्न भी उसे दे दिया।

अंत में एक प्यासा अतिथि आया, राजा ने अपना बचा हुआ जल भी उसे अर्पित कर दिया।

इस प्रकार ४८ दिनों की कठोर भूख और प्यास सहने के बाद भी, उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं रखा और सब कुछ दूसरों को समर्पित कर दिया।

तब देवराज इन्द्र ने प्रकट होकर बताया कि यह सब उनकी परीक्षा थी। इन्द्र ने कहा आपको सशरीर स्वर्ग चलना है तो राजा रन्तिदेव ने कहा—

 "न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्, कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्" 

 “मैं न तो स्वर्ग चाहता हूँ, न मोक्ष; मैं केवल इतना चाहता हूँ कि सभी प्राणियों के दुःख दूर हो जाएँ।”

(यह कथा भागवत पुराण में वर्णित है)

कितना सुखद है कि हमें भी सेवा का अवसर मिले 

सेवा धर्मः परम गहनो योगिनामप्यगम्यः

ये भाव और विचार हमारे भीतर उद्भूत हों इन सदाचार वेलाओं का यही उद्देश्य है 

सेवा करते समय आत्मानन्द की अनुभूति करें और साथ ही एक दूसरे के साथ मिलकर अपनी संस्था युगभारती परिवार की वृद्धि का आनन्द भी लें इससे हमें शक्ति प्राप्त होगी


*सङ्घे शक्ति: कलौ युगे*


संगठन के प्रति उदास रहो नहीं 

संगठन संसार का आधार है। 

संगठन सहयोग से ही सृष्टि है, 

संगठन ही मनुज का सुखसार है ॥

  है समाज वही सुखी जो संगठित

  हर अकेला भ्रमित पीड़ित दुखी है 

  शास्त्र अपना यही कहता आ रहा

  संगठित व्यक्तित्व ही मन्मुखी है ॥



हम कृपणता से कैसे बचें,हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, हनुमान जी ने अपनी आभा समेट ली किसने कहा जानने के लिए सुनें

13.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०१

हम यह अनुभव करें कि परमात्मा

*बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥*

*आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥*


 हमारे भीतर स्थित है 

 हम प्रयास करें कि हमारे भीतर संसार के कल्याणार्थ विचार उत्पन्न हों 


आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम लोगों में जो भी लोग मन में उत्पन्न होने वाली नकारात्मक भावनाओं जैसे हीनता, मोह और भ्रम आदि से ग्रस्त हैं वे इन्हें त्याग दें । ये भावनाएँ व्यक्ति की सोच को संकुचित करती हैं और उसे सही निर्णय लेने से रोकती हैं। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण  अधिवेशन  हमारे सामने है ,अतः हमें चाहिए कि हम उत्साह में आयें हम अपने मन को शुद्ध, स्पष्ट और सकारात्मक बनाएं । मन की उलझनों को दूर करके, एकाग्रता और आत्मविश्वास के साथ उस कार्य के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाएं ।

यह अधिवेशन समाज को यह निश्चिन्तता देने के लिए है कि अभी भारतीय संस्कृति जीवित, जाग्रत और सचेत है और यह संस्कृति हम भारतीयों के माध्यम से संपूर्ण विश्व को संदेश देना चाहती है कि शिक्षा अत्यन्त विशिष्ट है शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम को रट लेना या परीक्षा में अंक प्राप्त कर लेना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है, जो मनुष्य के भीतर ज्ञान के साथ-साथ विवेक, संस्कार और जीवन जीने की कला का विकास करे। यदि शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का साधन बनकर रह जाए, तो उसका उद्देश्य सीमित हो जाता है। शिक्षा का मूल लक्ष्य व्यक्ति को सक्षम, सजग और समाजोपयोगी बनाना है, न कि केवल आजीविका अर्जित करने वाला एक साधन मात्र।

भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित थी। वहाँ विद्यार्थी केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं करते थे, बल्कि जीवन के प्रत्येक पक्ष को समझते थे। गुरु के सान्निध्य में रहकर वे अनुशासन, संयम, सेवा, आत्मनिर्भरता और नैतिक मूल्यों का अभ्यास करते थे। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मविकास और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत करना था।

गुरुकुलों में प्रकृति के निकट रहकर विद्यार्थी सरल जीवन और उच्च विचार का अनुसरण करते थे। वहाँ ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यवहार, अनुभव और अभ्यास के माध्यम से आत्मसात किया जाता था। विद्यार्थी अपने गुरु से केवल विषयज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन भी प्राप्त करते थे।

इसके अतिरिक्त 

भैया संतोष मिश्र जी १९८८आचार्य जी से क्या पढ़ना चाहते हैं? हनुमान जी ने विद्या कैसे ग्रहण की? किसने किसने अपने मनुष्यत्व को पहचान लिया?   जानने के लिए सुनें

12.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१८ वां* सार -संक्षेप

 संगठन के प्रति उदास रहो नहीं 

संगठन संसार का आधार है। 

संगठन सहयोग से ही सृष्टि है, 

संगठन ही मनुज का सुखसार है ॥

  है समाज वही सुखी जो संगठित

  हर अकेला भ्रमित पीड़ित दुखी है 

  शास्त्र अपना यही कहता आ रहा

  संगठित व्यक्तित्व ही मन्मुखी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २००


जब पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं पर अटूट विश्वास रखते हैं, तो कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ता है। वे अपने दायित्वों को अधिक निष्ठा और समर्पण के साथ निभाते हैं। इसी प्रकार, साधारण सदस्य भी यदि एक-दूसरे पर विश्वास रखें, तो आपसी सहयोग और एकता शक्ति उत्पन्न करती है। हम आत्मविश्वासी भी बनें l 

आत्मोन्नाति के उपायों में डायरी लेखन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l

आगामी अधिवेशन के लिए उत्साह से संपन्न होकर कार्यों में सहयोग प्रारम्भ कर दें l 



अद्भुत है हमारा सनातन धर्म l इसका मूल स्वरूप अत्यन्त लचीला, व्यापक और जीवनोपयोगी है। इसमें कर्मकाण्ड केवल कठोर नियमों का बंधन नहीं, बल्कि साधना का मार्गदर्शन है। उदाहरणार्थ यदि पूजा में पुष्प उपलब्ध न हों, तो अक्षत अर्पित करने का विकल्प दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि धर्म बाहरी सामग्री से अधिक भाव और श्रद्धा को महत्व देता है। वस्तु का अभाव साधना में बाधा न बने, इसलिए विकल्प की व्यवस्था रखी गई है।

यह धर्म मनुष्य को शृंखला में नहीं बांधता, बल्कि उसे विचार करने की स्वतंत्रता देता है। वह यह सिखाता है कि परिस्थिति के अनुसार अपने आचरण को कैसे ढालना चाहिए। नियम मार्गदर्शक हैं, परन्तु उनका उद्देश्य जीवन को सरल और संतुलित बनाना है, न कि उसे कठिन बनाना। पूजन में बैठने का निर्देश अवश्य दिया जाता है वह इस कारण कि मनुष्य एकाग्र होकर अपने भीतर झाँक सके और उस परम सत्ता का स्मरण कर सके, जो इस सृष्टि की रचना करने वाली है। हम इस संसार में उपस्थित हैं, परन्तु हमारा अस्तित्व किसी उच्चतर शक्ति पर आधारित है। पूजन उसी शक्ति के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और स्मरण का माध्यम है।


भैया संजय गर्ग जी, भैया शुभेन्दु शेखर जी, भैया रमेश गुप्त जी,  न्यायमूर्ति भैया सुरेश गुप्त जी, भैया पुनीत जी, भैया अरविन्द जी, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ,आज दिल्ली के कार्यकर्ताओं की बैठक में लगभग कितने लोग उपस्थित होने वाले हैं कल  गुरुग्राम के कार्यक्रम में कितने सदस्य उपस्थित रहे, आगामी अधिवेशन के कार्यक्रम स्थल की चर्चा क्यों हुई,  स्वामी प्रेमानन्द के गांव का नाम किस कारण आया, देशभक्ति क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

11.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१७ वां* सार

 गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥

जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥1॥

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९९

ब्रह्मवेला में जागरण मन को उत्फुल्ल करने का एक अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय है इस जागरण के साथ प्रकृति के दर्शन का भी प्रयास करें तो यह निश्चित रूप से आनन्द में वृद्धि करेगा l दंभ से बचें l आगामी अधिवेशन के लिए पूर्णरूपेण समर्पित होवें l 


इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से जो कुछ व्यक्त किया जा रहा है, वह बौद्धिक जानकारी  या विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं है। यह आचार्य जी के हृदय से उत्पन्न अनुभूतियों, संवेदनाओं और अंतरंग भावों की अभिव्यक्ति है। हमें इन संप्रेषणों का लाभ उठाना चाहिए l


किसी भी कार्य के लिए हमें अच्छे से अच्छा प्रयास करना चाहिए अर्थात् पूर्ण समर्पण,मन, बुद्धि और सामर्थ्य के साथ कार्य करना चाहिए l ऐसा प्रयास हमारे भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है,हमारी क्षमताओं को विकसित करता है l यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रयास केवल परिणाम के लिए न हो, बल्कि स्वयं कर्म की उत्कृष्टता के लिए हो। जब हम अपने कर्म को श्रेष्ठ बनाते हैं, तो वह स्वयं ही एक साधना बन जाता है।साथ ही जीवन की अनिश्चितता को  भी हम स्वीकारें । संसार में हर परिणाम हमारे नियंत्रण में नहीं होता। अनेक बाहरी परिस्थितियाँ, समय, संयोग और अन्य लोगों के निर्णय भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। यदि हम केवल अच्छे परिणाम की अपेक्षा रखेंगे तो विपरीत होने पर टूट भी जाएंगे अतः जब हम पहले से ही यह समझ लें कि परिणाम कुछ भी हो सकता है, तो हमारा मन संतुलित रहता है। हम सफलता में अहंकार से नहीं भरते और असफलता में निराशा में नहीं डूबते ।

यह दृष्टिकोण हमें भयमुक्त भी बनाता है। जब हमें यह स्वीकार होता है कि हम हर परिणाम के लिए तैयार हैं, तब हम जोखिम लेने से नहीं डरते। हम नए कार्यों में आगे बढ़ते हैं, क्योंकि हमें असफलता का भय रोक नहीं पाता। यही भाव हमें सच्चे अर्थों में कर्मयोगी बनाता है l इस परिवर्तनशील क्षरणशील मरणधर्मा संसार में यही पौरुष की परिभाषा है l 


परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते। स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥

जो इस वंश, जो परमात्मा के अंश से उत्पन्न है, की चिन्ता करता है वह मानव वंश है l


भैया अरविन्द तिवारी जी, भैया मोहन जी, भैया प्रदीप जी का उल्लेख क्यों हुआ,आचार्य जी ने किस डेढ़ कदम की चर्चा की,पं दीनदयाल जी ने किस सूत्र पर भविष्य का बृहद् वितान ताना जानने के लिए सुनें

10.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१६ वां* सार -संक्षेप

 न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।

गृहं तु गृहिणीहीनं कान्तारादतिरिच्यते॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९८

अपने अंतःकरण के विचारों और व्यवहार को शुद्ध एवं पवित्र बनाए रखें आहार-विहार के संबंध में उचित-अनुचित का विवेक बनाए रखें और सदैव इस पर सजग दृष्टि रखें इसके लिए Society को इंगित न करें । अपने आचरण तथा वाणी में कटुता का परित्याग करें और मधुरता एवं विनम्रता को अपनाएँ।



यह हमारा सौभाग्य है कि हम प्रतिदिन इन वेलाओं से सदाचारमय विचार ग्रहण कर रहे हैं ताकि हमारा अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र बना रहे, विवेक जाग्रत हो और हमारा आचरण तथा वाणी सदैव मधुर, विनम्र और कल्याणकारी बनी रहे।

हमें चाहिए कि हम उन व्यक्तियों को अपने निकट स्थान दें, जो हमारे हित, उन्नति और कल्याण की भावना रखते हैं। ऐसे लोग न केवल सही मार्गदर्शन करते हैं, अपितु कठिन परिस्थितियों में भी सहायक बनकर जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने में योगदान देते हैं।

इसके विपरीत, जो व्यक्ति अहित की भावना रखते हैं, भ्रम उत्पन्न करते हैं या अनुचित मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं, उनसे यथासंभव दूरी बनाए रखना ही उचित है। ऐसे लोगों का संग न केवल विचारों को दूषित करता है, बल्कि जीवन की दिशा को भी विचलित कर सकता है l

हमारे राष्ट्र की शिक्षा अत्यन्त विलक्षण थी जिसके कारण आज भी हम जीवित हैं जाग्रत हैं उत्साहित हैं और चैतन्ययुक्त हैं l हम गृहस्थाश्रमी हैं और गृह में पत्नी के साथ रहते हैं। पत्नी का स्थान सर्वोपरि है l पत्नी को ‘गृह’ भी कहा गया है, क्योंकि वही घर की आधारशिला, व्यवस्था और जीवन-संवेदना का केंद्र होती है। उसके बिना घर केवल एक भवन मात्र रह जाता है, जिसमें न आत्मीयता होती है, न ही जीवंतता।“बिन घरनी घर भूत का डेरा”, अर्थात् पत्नी के बिना घर सूना, निर्जीव और शून्य-सा प्रतीत होता है।


इसके अतिरिक्त उपकुर्वाण ब्रह्मचारी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी में क्या अन्तर है, आचार्य जी दिल्ली क्यों जा रहे हैं, ज्येष्ठाश्रम क्या है द्विज क्या है अभिनन्दनीय कर्म क्या हैं श्वानवृत्ति क्या है जानने के लिए सुनें

9.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१५ वां* सार -संक्षेप

 तूफान कल था, आज मौसम साफ है ,

हर समर्थ सुशक्ति को सब माफ है ;

हर तरह कमजोर है आसक्त मन ?

दीनदुनिया का यही तो शाप है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९७

स्वयं शुद्ध और जागरूक होने का प्रयास करें ताकि संसार के दुःख और अज्ञान को दूर करने की समर्थता आ सके



प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) आत्मचिंतन और ध्यान से सत्वगुण की वृद्धि होती है और मन शुद्ध होता है। ये सदाचार संप्रेषण गहन आत्मचिंतन और जीवन-दर्शन से भरपूर हैं हमें इनका लाभ उठाना चाहिए । इनमें तत्व, साधना, स्वदेशप्रेम और आत्मबोध की सुंदर अभिव्यक्ति होती है।

हमें यह भी समझना चाहिए कि जीवन में कठिनाइयाँ  अस्थायी हैं। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं l इस पर विश्वास रखना चाहिए l

आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम संस्कार सहित अपने मन को बुद्धि को विचार को एक दिशा और दृष्टि में लगाएं  जैसे अपने राष्ट्र  भारत, जिसकी रक्षा के लिए हनुमान जी सदैव सन्नद्ध हैं,के प्रति भक्ति भाव रखें भारत के सच्चे उपासक बनें 


जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। 

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

भगवान् राम ने भी अपने मन बुद्धि विचार को एक दिशा में लगाया उन्होंने  रावण के अंत के लिए साधना  की संगठन को महत्त्व देते हुए l 

हमने भी अपना उद्देश्य बनाया है और युगभारती के रूप में हमारा संगठन है हम सदस्यों में आपस में प्रेम आत्मीयता का विस्तार होना चाहिए हमारा एक एक सदस्य 

अपने अपने क्षेत्र में कुशल है हमें किसी सदस्य की उपेक्षा नहीं करनी है और न ही ईर्ष्या द्वेष कुंठा रखनी है 


इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी, भैया विनय जी का उल्लेख क्यों हुआ, भरत कैसे वन्दनीय हो गये, प्रेमानन्द का उल्लेख क्यों हुआ  जानने के लिए सुनें

8.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९६

उपासना के महत्त्व को समझें 


यह संसार नाम और रूप से बना हुआ है, लेकिन भारत का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है। वह अनन्त है, अनादि है, अक्षय है और अमर है। जब हम इस सत्य को अपने भीतर अनुभव करेंगे , तब हमारा दृष्टिकोण ही बदल जाएगा जिस क्षण यह भाव हमारे भीतर जाग्रत होता है, उसी क्षण निराशा, कुंठा, हताशा और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भाव समाप्त होने लगते हैं। मन स्थिर और शांत हो जाता है और जीवन में स्वाभाविक रूप से आनंद का अनुभव होने लगता है। चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति होने लगती है किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं यह हमारे स्वभाव और उद्देश्य के विरुद्ध है। निष्क्रियता मनुष्य को जड़ता, निराशा और पतन की ओर ले जाती है, जबकि कर्म उसे उन्नति, आत्मविश्वास और संतोष की ओर ले जाता है। इस कारण हमारा कर्तव्य है कि हम कर्म करते रहें लेकिन केवल फल की चिंता में नहीं, बल्कि कर्तव्य भाव से।

ऐसा ही कर्तव्य निभाया  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम ने 

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥

अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दु:ख दहे।

जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥1॥


यह स्तुति भगवान श्रीराम के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की महिमा का वर्णन करती है। वे अद्वितीय रूप वाले, राजाओं में श्रेष्ठ हैं l आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आज की परिस्थितियों में भी भुजबल को एकत्र करना अत्यन्त आवश्यक है और उस भुजबल के आधार पर संगठन भी अत्यावश्यक है l इसके साथ ही हम अपना लक्ष्य सदैव ध्यान में रखें अखंड भारत हमारा लक्ष्य है l 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी के किस लेख की चर्चा की,११ अप्रैल को हम क्या करने जा रहे हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम और लीला पुरुषोत्तम में क्या भेद है, वेदों में सकाम मन्त्रों की संख्या कितनी है जानने के लिए सुनें

7.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९५

भाव के साथ विचार और क्रिया भी संयुत होनी चाहिए हम लोग आपस में ईर्ष्या, भ्रम, शंका आदि दोषों से बचें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 

अधिवेशन की तैयारी प्रारम्भ कर दें 




हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें l मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं है, बल्कि उसमें संवेदना, करुणा, विवेक, नैतिकता और आत्मचेतना होती है। जब व्यक्ति इन गुणों को जाग्रत करता है जैसे सत्य बोलना, दूसरों के दुःख को समझना, कर्तव्य निभाना तब वह वास्तविक अर्थ में मनुष्य बनता है। केवल जन्म से मनुष्य होना पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यवहार और विचार से मनुष्यत्व की अनुभूति आवश्यक है।

इसके पश्चात् हम “पुरुषत्व की ओर प्रयाण” करें अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर परम चेतना से एकत्व की ओर बढ़ना l 

श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग के प्रथम छंद 

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।


छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१५/१

के अनुसार इस संसार को अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष के समान कहा गया है, जिसका मूल ऊपर की ओर है और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। जिसके पत्ते वेदों के छन्द हैं, और जो इस वृक्ष को जान लेता है, वही सच्चा वेदज्ञ होता है।


यह संसार एक उल्टे वृक्ष के समान बताया गया है। सामान्य वृक्ष में जड़ नीचे और शाखाएँ ऊपर होती हैं, लेकिन यहाँ जड़ ऊपर है। इसका संकेत यह है कि इस जगत का मूल परमात्मा है, जो ऊपर अर्थात् परम धाम में स्थित है। उसी परम सत्य से यह सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है, इसलिए उसे मूल कहा गया है।

नीचे की ओर फैली शाखाएँ इस संसार के विविध रूपों का प्रतीक हैं, जैसे विभिन्न लोक, जीव, कर्म, इच्छाएँ और भोग-वासनाएँ। ये सब परमात्मा से उत्पन्न होकर संसार में विस्तार पाते हैं।

इस वृक्ष को अश्वत्थ कहा गया है। अश्वत्थ का एक अर्थ यह भी है कि जो स्थायी नहीं है, अर्थात् यह संसार नित्य बदलने वाला है। आज जो है, वह कल नहीं रहेगा। इसके पत्ते वेदों के छन्द कहे गए हैं। जैसे वृक्ष के पत्ते उसे पोषण देते हैं, वैसे ही वेद इस संसार के ज्ञान और धर्म का आधार हैं। वेदों के माध्यम से ही मनुष्य को यह समझ में आता है कि इस संसार का स्वरूप क्या है और इससे पार कैसे जाया जा सकता है।

जो व्यक्ति इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, अर्थात् यह जान लेता है कि संसार का मूल परमात्मा है, यह जगत अनित्य है और वेद ही इसके ज्ञान का साधन हैं, वही सच्चा वेदज्ञ कहलाता है। केवल वेदों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके गूढ़ अर्थ को समझकर जीवन में उतारना ही वास्तविक ज्ञान है।



आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम अध्यात्म में प्रवेश के लिए उच्च कोटि के संत रामसुखदास जी की टीका साधक संजीविनी का अध्ययन करें

५ अप्रैल के कार्यक्रम की चर्चा क्यों हुई, भैया डा अमित जी भैया अजय शंकर जी का उल्लेख क्यों हुआ, सेवा का स्वरूप कैसा हो, कड़े जी कौन थे जानने के लिए सुनें

6.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१२ वां* सार -संक्षेप

 ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वम् ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९४

चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों 


वर्तमान शिक्षा अपने मूल उद्देश्य व्यक्तित्व का समग्र विकास, विचारों की स्वतंत्रता तथा जीवन मूल्यों की स्थापना से हटकर केवल औपचारिकता और संकीर्णता तक सीमित हो गई है। परिणामस्वरूप उसमें अनेक दुर्गुण उत्पन्न हो गए हैं।

इन दुर्गुणों के कारण हमारा दृष्टिकोण व्यापक न रहकर संकीर्ण हो गया है। हमारी बुद्धि, मन और सोच का विस्तार रुक गया है और हम सीमित दायरे में सोचने लगे हैं।

हमारे भीतर जो स्वाभाविक जिज्ञासा, सृजनात्मक शक्ति और निरंतर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति होती है, वह दबकर रह गई है। यही कारण है कि हम भीतर से असंतुष्ट, अपूर्ण और कहीं न कहीं बेचैन अनुभव करते हैं। आवश्यकता है हमें अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति की l 

प्राचीन  शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का समग्र विकास था। इसमें शिक्षा आचरण आधारित होती थी और गुरु-शिष्य के बीच आत्मीय संबंध रहता था। शिक्षा प्रकृति के सान्निध्य में दी जाती थी, जिससे मन एकाग्र और शांत रहता था।

इस पद्धति में स्वावलंबन, अनुशासन, चिंतन, मनन और स्वाध्याय पर विशेष बल दिया जाता था। साथ ही नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का विकास किया जाता था। शिक्षा व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार तथा जीवनोपयोगी होती थी।


हमारा साहित्य अत्यंत विस्तृत और विविधतापूर्ण है, जो जीवन के हर क्षेत्र अध्यात्म, दर्शन, समाज, कला और व्यवहार को समाहित करता है। हमारा भारत राष्ट्र पृथ्वी का मूल राष्ट्र है यहीं वेद उद्भूत हुए l वेदों का अर्थ है वह दिव्य ज्ञान, जो जीवन, प्रकृति, धर्म और सत्य के बारे में सही मार्गदर्शन देता है। हम अपने इस ज्ञान को अपने  अद्भुत साहित्य को अध्यात्म को जब अनुभव करेंगे और इनको जितना जान लेंगे हम आनन्द में रहेंगे और इस आनन्द को बांटते हुए जब हम संगठन करेंगे तो वह संगठन अत्यन्त दिव्य होगा उसके सदस्यों में प्रेम आत्मीयता का विस्तार मिलेगा 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया आशीष जोग जी, उन्नाव विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य श्री स्वामीनाथ जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें l

5.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७११ वां* सार

 मानव जीवन अनुपम अद्भुत सौभाग्य सदन,

तब, जब हम होते हैं शान्त और उत्फुल्ल बदन ।




प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७११ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९३

प्रातःकाल उठकर आत्मबोध का प्रयास करें 


मनुष्य का शरीर मिलना अपने आप में एक दुर्लभ अवसर है। हमें केवल शरीर ही नहीं मिला, बल्कि मन, बुद्धि और विचार करने की क्षमता भी मिली है। यही क्षमताएँ हमें अन्य जीवों से अलग बनाती हैं। जब हम इस बात को अनुभव करते हैं कि हम सोच सकते हैं, निर्णय ले सकते हैं और अपने जीवन को दिशा दे सकते हैं, तब हमारे भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न होता है।

यह अनुभूति हमें यह विश्वास दिलाती है कि हम केवल परिस्थितियों के अधीन नहीं हैं, बल्कि अपने प्रयासों और सही विचारों के माध्यम से अपने जीवन को बदल सकते हैं। हमने अपना लक्ष्य बनाया है समाजोन्मुखी व्यक्तित्व  का उत्कर्ष l


जब हम समाजोन्मुखी कार्य करते हैं तो यदि हम यह भाव रख लें कि “यह कार्य मुझसे ईश्वर करवा रहे हैं, मैं तो केवल एक माध्यम हूँ”, तो हमारा मन विनम्र बना रहता है l यह भावना सेवा को पवित्र बनाती है और व्यक्ति को दंभ से बचाकर विनम्रता और आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।

आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम व्याकुलता से  भी बचें l

संपूर्ण सृष्टि परमात्मा की रचना है। परमात्मा ने मनुष्य को भी रचा और उसमें सत, रज तथा तम ये तीनों गुण स्थापित किए। साथ ही उसे स्वतंत्रता भी दी कि वह अपने जीवन का मार्ग स्वयं चुन सके।

मनुष्य इस स्वतंत्रता का कैसे उपयोग करता है, यही उसके जीवन की दिशा तय करता है

यदि वह इसका उपयोग दुष्टता में करता है, तो उसके भीतर विकार उत्पन्न होते हैं।और यदि वह इसे शिष्टता, सदाचार और सत्य के मार्ग में लगाता है, तो उसके भीतर विचार विकसित होते हैं। हमें सदाचारमय मार्ग चुनना है हम समाज और देश के लिए कार्य करते हुए यशस्वी होने का प्रयास करें l


इसके अतिरिक्त भैया आशीष जोग जी की चर्चा क्यों हुई, ब्रह्मानन्द सहोदर क्या है, किस वेद में पद्य और गद्य दोनों है जानने के लिए सुनें

4.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९२

इन संप्रेषणों को सुनकर एक अपनी रुचि का विषय चुन लें जैसे सेवा और सेवा इस प्रकार की करें कि 


सेवा में जितना प्रेम समन्वित होता है 

सेवक उतना भावों से अन्वित होता है 

भावना विहीन कर्म 

बस एक प्रदर्शन है 

मानव जीवन निज भावों का ही दर्शन है ॥

और कर्मरत हो जाएं l



यह हमारा सौभाग्य है कि हमें आचार्य जी के रूप में एक सक्षम गुरु का संरक्षण प्राप्त है हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि प्रतिदिन प्रातः थोड़ा समय हम आत्मचिंतन (आत्मदर्शन) के लिए निकालें अर्थात् हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें l हम शक्ति का अवबोध करें l इससे धीरे-धीरे हमारे भीतर सद्गुणों का विकास होगा और हमारा जीवन अधिक श्रेष्ठ बन जाएगा।


प्रातः प्रयास हो तनिक आत्मदर्शन के हित, 

हो जाएँगे जगती के सब सद्गुण अन्वित ॥


अद्भुत है भारत l हमारे देश में शिव, राम और कृष्ण का व्यापक प्रभाव है इनकी दिव्य लीलाएँ सतत चल रही हैं, जो मानव जीवन को दिशा और प्रेरणा दे रही हैं l सांसारिकता में जो बहुत लिप्त हैं उन्हें ये सब दिखाई नहीं देता l जब मन केवल भौतिक विषयों, इच्छाओं और मोह में उलझा रहता है, तब वह सूक्ष्म सत्य, भक्ति और दिव्यता को अनुभव नहीं कर पाता l इसी कारण हमें संसार से इतर भी अपना चिन्तन रखना चाहिए l आत्मदर्शन में हमें यही प्रतीत होता है कि जो हम हैं वही सब हैं l


राम कथा अद्भुत है 


जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई॥

कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥

रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥

नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥


जो ज्ञानीजन हैं, वे इस अलौकिक कथा को सुनकर आश्चर्य नहीं करते, क्योंकि वे इसके दिव्य स्वरूप को भली-भाँति जानते हैं।

उनके मन में यह दृढ़ विश्वास होता है कि राम की कथा की कोई सीमा नहीं है  अर्थात् उसकी महिमा अनंत है l

इसके अतिरिक्त सूक्ष्म भाव कब समझ में नहीं आते, कौन विपन्न हैं, रामायण धारावाहिक की चर्चा क्यों हुई,संगठन क्यों महत्त्वपूर्ण है जानने के लिए सुनें l

3.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०९ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९१

मानस का अध्ययन करें इससे हम चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करने लगेंगे 



इन सदाचारपूर्ण वचनों को सुनकर हमारे अंतःकरण में उत्तम भावों का जागरण होना चाहिए। हमें उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उत्साह का संचार करना चाहिए और केवल विचारों तक सीमित न रहकर सत्कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए।इससे हमारा जीवन सार्थक और समाज के लिए उपयोगी बन सकेगा l हम मनुष्य हैं हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होनी ही चाहिए अन्यथा हम मृग के समान हैं 

आहार निद्रा भय मैथुनं च

सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्

धर्मो हि तेषामधिको विशेष:

धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः

हमारे भीतर मनुष्यत्व की अनुभूति जितनी अधिक होगी  हम उतना ही परमात्मशक्ति से उद्दीप्त हो उठेंगे l जब हमारे भीतर परमात्मा किसी न किसी रूप में उपस्थित है तो हम दीन हीन मलिन कैसे हो सकते हैं अर्थात् नहीं हो सकते हैं l अध्यात्म और धर्म का सामञ्जस्य समझकर उसका व्यवहार करने लगेंगे तो हम आत्मानन्द को अनुभव करने लगेंगे l 

नियमित और भावपूर्ण नाम-जप से मन शुद्ध होता है और आत्मा अपने स्वाभाविक आनन्द अर्थात् आत्मानन्द का अनुभव करने लगता है 


भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥

तुलसीदास जी ने यह मार्ग निकाल दिया l 

नरहरिदास जी ने बचपन से ही तुलसीदास जी की अद्भुत बुद्धि और आध्यात्मिक रुचि को पहचान लिया था। वे चाहते थे कि तुलसीदास जी केवल भक्ति ही न करें, बल्कि वेद, पुराण, व्याकरण और दर्शन का भी गहरा ज्ञान प्राप्त करें, जिससे उनका ज्ञान पूर्ण और प्रामाणिक बने।चित्रकूट में नरहरिदास जी ने तुलसी जी को रामभक्ति की दीक्षा दी इसके बाद उन्होंने काशी के पंचगंगा घाट पर स्थित शेष सनातन जी (जो उनके मित्र और विद्वान् थे) के पास भेजा। वहाँ तुलसीदास जी ने लगभग १५-१६ वर्षों तक संस्कृत ग्रंथों का गहन विद्याध्ययन किया।


इसके बाद उन्होंने श्रीरामचरित मानस की रचना की जो केवल एक काव्य नहीं है, भक्ति से उत्पन्न, अनुभव से परिपक्व और लोककल्याण के उद्देश्य से रचित दिव्य ग्रंथ है। मानस को उन्होंने सामान्य भाषा में प्रस्तुत किया जिससे सामान्य जन भी उसका आनन्द ले सके एक ज्ञानी भी उसमें तत्त्व के दर्शन कर सके इसका भी उन्होंने ध्यान रखा l 


भैया अक्षय जी २००८, भैया यज्ञदत्त जी का उल्लेख क्यों हुआ, *उर्दू वाले* कौन कहते थे , मारीशस चर्चा में कैसे आया जानने के लिए सुनें

2.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९०

अपने भावों को परिशुद्ध करने के लिए नित्य चिन्तन आवश्यक है गीता और मानस को जीने की आवश्यकता है 


अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।


भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।


इसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर में ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का स्वरूप स्पष्ट किया है।

अविनाशी परम तत्त्व ब्रह्म है, जीव का आंतरिक स्वभाव अध्यात्म है  और सृष्टि के प्राणियों की उत्पत्ति कराने वाला त्याग या सृजनात्मक क्रिया कर्म  है

यह कर्म धर्म से संयुत है अध्यात्म और धर्म एक दूसरे के प्राण और शरीर हैं  जिसका अध्यात्म में प्रवेश है उसे धर्म की गतिविधियां भी पता हैं वेदों में इन दोनों का सामञ्जस्य किया गया है  गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार भगवान् राम अध्यात्मवादी भी हैं , धर्मवेत्ता भी हैं और कर्मकुशल तो हैं ही इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम कहा गया 

उनकी उपासना करने के लिए तुलसीदास जी ने नाम जप बताया 

राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे।

नाहिं तौ भव-बेगारि महँ परिहै ,छूटत अति कठिनाई रे।1।

किन्तु यह जप एकांगी नहीं होना चाहिए  जब ज्ञान कर्म से मुक्त हो जाता है तो व्यक्ति पुरुषार्थ से रहित हो जाता है जब कि पुरुष के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य है परिस्थितियां भांपकर हमें विचारपूर्वक कर्म करना है इसके लिए आपसी भेदभाव दूर कर हमें संगठित होना ही होगा l एक व्यक्ति चाहे कितना ही सक्षम क्यों न हो, लेकिन कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें सफल बनाने के लिए कई लोगों का साथ आवश्यक होता है 


संगठन संगठन संगठन


 शंकालु होकर संगठित नहीं हो सकते इसके लिए प्रेम और आत्मीयता का विस्तार भी करें  आज परिस्थितियां विषम हैं संकट टला नहीं है हमें सचेत रहना ही होगा 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने किस चित्र की चर्चा की, स्वामी रामतीर्थ ने किसे अपना बना लिया, अहं क्यों हानिकारक है, प्रातःकाल का जागरण क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें

1.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०७ वां* सार

 एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।

बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥ 29(ग)॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८९

लेखन एक योग है इसके महत्त्व को समझें चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों 



तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥

भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥


गुरुदेव ने उस ज्ञान को बार-बार समझाया, फिर भी मेरी बुद्धि के अनुसार ही मुझे थोड़ा-बहुत समझ में आया। उसी को (श्रीरामचरित मानस  के रूप में )मैं अपनी भाषा (अवधी) में प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे मेरे मन को संतोष और ज्ञान की प्राप्ति हो सके।

आचार्य जी भी बार बार यही प्रयास कर रहे हैं कि हम इन सदाचार संप्रेषणों को सुनकर अपने भीतर सात्विक भाव लाएं, भक्ति में शक्ति की अनुभूति करें,सांसारिक बोझ को ढोने के लिए अपने भीतर आत्मशक्ति विकसित करें l 

इस नाम रूपात्मक जगत में नाम स्मरण करते ही उससे जुड़ा रूप प्रकट हो जाता है

जैसे भगवान् राम का नाम लेते ही उनका संकल्प, उनका धर्म और उनका पुरुषार्थ सामने आ जाता है 

भगवान् राम का अद्भुत संकल्प

*निसिचर हीन करहुँ महि, भुज उठाइ प्रण कीन्ह* हमें प्रेरित करने लगता है 

हम अपने भीतर गुरुत्व लाएं  और  भावी पीढ़ी को संस्कारित करें 


भैया ऋषि जी, भैया विनय अजमानी जी, भैया कवि पवन जी, भैया पवन पांडेय जी का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य श्रीराम शर्मा की किन दो पुस्तिकाओं की चर्चा हुई , संगठन के क्या सूत्र हैं जानने के लिए सुनें l