प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६७८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६०
सनातन धर्म में ज्ञान, साधना और जीवन-मूल्यों का अपार भण्डार निहित है। इसे तत्त्व में प्राप्त करने के लिए प्रातःकाल का जागरण नितान्त आवश्यक है साथ ही अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन लेखन पारस्परिक चर्चा भी करें l समय सारणी बना लें l
समस्त संसार का संघर्ष वस्तुतः शान्ति की ही खोज है। मूल भारतीय चिंतन में इसी व्यापक शान्ति की साधना निहित है।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इस मन्त्र में समस्त सृष्टि—द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियाँ, वनस्पतियाँ, देवता और ब्रह्म—सबमें समन्वित दिव्य शान्ति की कामना की गई है।
विश्व में स्थायी शान्ति तभी सम्भव है जब जीवन और समाज सुव्यवस्थित हों। वर्तमान समय में अव्यवस्था के कारण व्याकुलता, कष्ट और पीड़ा का विस्तार दिखाई दे रहा है अत्याचार और अन्याय की प्रधानता परिलक्षित हो रही है। समाज में अल्पसंख्यक–बहुसंख्यक जैसे विभाजनकारी विषयों की चर्चा से वातावरण उद्विग्न हो उठा है। चारों ओर अशान्त वातावरण है। किन्तु ऐसे अशान्त और उथल-पुथल भरे समय में यदि हम प्रतिदिन प्रातःकाल आत्मबोध का प्रयत्न करें, तो संकट की घड़ी में भी समाधान खोजने की शक्ति प्राप्त हो सकती है।
अन्धकार चाहे जितना गहन क्यों न हो, हमारा कर्तव्य है कि हम जहां हैं, वहीं से प्रकाश का प्रसार करें। इसके लिए शिक्षा प्रधान है किन्तु वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था विकृत होकर अपने मूल स्वरूप से विचलित हो गई है उसका ध्वस्तीकरण-सा प्रतीत होता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार-प्राप्ति तक सीमित रह गया है। संस्कार, चिन्तन और सम्यक् विचार का स्थान क्रमशः दूर होता जा रहा है। शिक्षा में भावना का अभाव है जिसके कारण विचार खंडित हो रहे हैं हमें इस ओर ध्यान देना होगा l शिक्षा में ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन और चरित्र-निर्माण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए l
भैया पुनीत जी भैया मोहन जी की चर्चा क्यों हुई हल्दी घाटी का उल्लेख क्यों हुआ अश्विनी उपाध्याय किसे घटिया कहते हैं जानने के लिए सुनें l