प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७२१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०३
हम युगभारती के सदस्यों को संसार को उसी की वास्तविकता और व्यवहार के अनुसार देखना चाहिए तथा स्वयं को अपने अंतर्मन, विवेक और आत्मचिंतन की दृष्टि से समझने का अभ्यास करना चाहिए। इसी से आनन्द प्राप्त होगा l
जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ, जल जलहिं समाना, यह तत कथौ गियानी।।
जैसे घड़े के भीतर भी जल है और बाहर भी जल ही है, वैसे ही जीव और परमात्मा में कोई वास्तविक भेद नहीं है। घड़ा केवल एक सीमित आकार देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भीतर का जल अलग है और बाहर का जल अलग; परंतु वस्तुतः दोनों एक ही तत्व हैं।
जब घड़ा फूट जाता है, तब भीतर का जल बाहर के जल में मिल जाता है। उसी प्रकार जब मनुष्य का अहंकार, देहाभिमान और अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर परमात्मा में लीन हो जाता है। तब यह भेद मिट जाता है कि मैं अलग हूँ और ईश्वर अलग ज्ञानी व्यक्ति इसी सत्य को समझता है कि यह भेद केवल दिखने का है, वास्तविकता में हम सब एक ही परम तत्व की अभिव्यक्ति हैं।यही अद्वैत दर्शन है l इसी से ज्ञात होता है कि हमारे ज्ञान -चक्षु खुले हुए हैं इसमें हम आत्मदर्शन के साथ सजातीय व्यक्तियों का दर्शन भी करते हैं और इसी से हमारी निराशा हताशा कुंठा व्याकुलता दूर होती है l इसी तथ्य को हम अपने सजातीय भारत -भक्त जनों में भी स्पष्ट कर सकें तो समझ लें हम वास्तविक शिक्षा देने वाले शिक्षक हैं यही शिक्षा विश्व में शान्ति की स्थापना करने में सक्षम है पूरी वसुधा को अपना कुटुम्ब समझने में समर्थ है
परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अंधविश्वासी या असावधान बन जाएं l संसार में ऐसे लोग भी होते हैं जिनकी प्रवृत्ति हानिकारक होती है, इसलिए उनके प्रति सतर्क रहना भी आवश्यक है। हमें इसी शिक्षा का प्रचार प्रसार भी करना है l राष्ट्रवाद को उद्वेलित -प्रेरित करना है l सात्विक संगठन भी आवश्यक है जिससे सांसारिक क्रिया व्यवहार में सफलता मिल सके l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्रद्धेय बचनेश जी की विशेष चर्चा क्यों की, भैया संतोष मिश्र जी का उल्लेख क्यों किया,किस चर्चित शिक्षक की आचार्य जी ने चर्चा की जानने के लिए सुनें