16.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२२ वां* सार -संक्षेप

 सत्य शील संयम त्रिवेणी में नहाँए रोज,

खोजने को तत्व सत्य माला जाप करते। 

हरते मनस्ताप सृष्टि-संकटों के बीच, 

नीच कीच बीच भूलकर न पाँव धरते। 

हिंसक स्वभाव हो न जाए कहीं भूलकर

 भी, 

छुरी का प्रयोग किसी काम में न करते। 

किन्तु दुष्ट म्लेच्छ जब इज्जत उतार देता,

हाय हाय और गालियों से पेट भरते ॥


(यहाँ उन लोगों पर व्यंग्य  है जो बाहर से तो अत्यंत धर्मपरायण, संयमी और अहिंसक दिखते हैं, लेकिन अन्याय और अपमान के समय कायरता दिखाते हैं। यह व्यंग्य उनकी निष्क्रियता और दिखावटी आदर्शवाद पर है। यहीं शौर्य प्रमंडित अध्यात्म महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिसमें आंतरिक शुद्धि के साथ-साथ अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी दिखता है ।)




प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०४

शिक्षा पर ध्यान दें क्योंकि यह मनुष्य को मनुष्यत्व की अनुभूति कराती है 

सुयोग्य जनों का संगठन,  जिसका मूल मन्त्र प्रेम और आत्मीयता है, अत्यन्त आवश्यक है इस पर ध्यान दें 

सिहों के लेहँड़ नहीं, हंसों की नहीं पाँत। लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलैं जमात॥ 




विषम परिस्थितियों में भी आचार्य जी नित्य हमें उद्बोधित करते हैं यह हम लोगों का सौभाग्य है हमें इन उद्बोधनों का लाभ उठाना चाहिए जो दिन भर की ऊर्जा हमें प्रदान करते हैं 


छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥

भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥3॥

(किष्किंधा काण्ड )

छोटी-छोटी नदियाँ (छुद्र नदियाँ) थोड़े से जल से ही भरकर उफनने लगती हैं, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति थोड़ा सा धन पाकर इतराने लगता है।

जब वही जल भूमि पर गिरता है तो वह गंदला (कीचड़युक्त) हो जाता है, जैसे जीव (मनुष्य) पर माया आकर लिपट जाती है।


तुलसीदास जी यहाँ प्रकृति के माध्यम से मानव स्वभाव को समझा रहे हैं। जैसे छोटी नदियाँ थोड़े जल में ही उफान दिखाती हैं, वैसे ही अल्प बुद्धि या दुष्ट प्रवृत्ति के लोग थोड़ी संपत्ति या सफलता पाकर घमंड करने लगते हैं। और जैसे पानी जमीन पर गिरकर गंदला हो जाता है, वैसे ही मनुष्य माया (अर्थात् मा +या = जो नहीं है ) के प्रभाव में आकर अपनी शुद्धता खो बैठता है। वह अनुभव ही नहीं कर पाता कि परमात्मा उसके भीतर ही बैठा हुआ है l वह संसारी मनुष्य ही बना रहता है और संसार के बारे में चिन्तन करता रहता है l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया अरविन्द जी की चर्चा क्यों की, १९ को किसकी बैठक है, अधिवेशन क्यों आवश्यक हैं जानने के लिए सुनें