12.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 12 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *836 वां*

 संवत् सोलह सौ इकतीसा। करौं कथा हरिपद धरि सीसा।।


नौमी भौम वार मधुमासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा।।”

 मानस की रचना संवत् 1631 ई० में चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि, मंगलवार को पूर्ण हुई थी इसमें कुल 2 वर्ष 7 माह 11 दिन लगे



प्रस्तुत है उदारचरित ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 12 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *836 वां* सार -संक्षेप


 1  विशालहृदय



कविता करके तुलसी न लसै।


कविता पा लसी तुलसी की कला।।


राम को भज अमर न हुए तुलसी।


तुलसी को पा अमर है रामलला”



राम धन्य हैं उनके उदासीन के लिए निम्नांकित चौपाई और दोहा देखिए



सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। *जौ लगि करौं निसाचर नासा*॥1॥




*निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।*

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥


मां सीता को सुरक्षित करते हैं और संसार को नर लीला दिखाते हैं

संसार की मर्यादा यह भी है कि संकट के उपस्थित होने पर उसका सामना बहुत दृढ़ संकल्प के साथ किया जाए

और बहुत से अपवाद प्रवाद से विरक्त रहकर संसार में जिया जाए इसलिए भगवान् राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है वे वन वन भटके हैं उन्होंने अद्भुत संगठन किया  जीने की शक्ति और संसार में रहने का सलीका उनकी कथा में मिलता है 


आज दीपोत्सव पर आचार्य जी हमें परामर्श दे रहे हैं कि हम जागरूक बनें मन बुद्धि विचार संकल्प पवित्र करें दुःख भय भ्रम से दूर रहें 

उत्साह से रहें कर्मरत रहें

आइये अयोध्या में प्रवेश करें


श्री राम सारे संकटों को पार करके अब पुष्पक पर विराजमान हैं



लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥

हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥1॥


अयोध्या नगरी सजी संवरी है


कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥

बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥1॥


करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥

पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥4॥


भगवान् राम के आगमन का दृश्य आज दीपोत्सव पर हम अपने मन में अंकित करें



*न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्*

*नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।*

*तमेव भान्तमनुभाति सर्वं*

*तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।।* (कठोपनिषद् ०२/०२/१५)



*दीपावलीपर्वणः मङ्गलकामनाः*


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्रद्धेय अशोक जी श्रद्धेय गुलाब सिंह जी परिहार की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें