24.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५९ वां* सार

 मानव का ज्ञान अभिमान से भरा हुआ है, 

किन्तु कहता है सदा "अभिमान-शून्य हूँ।"

ज्ञान ध्यान का विधान सारा सुख निज हेतु, 

दर्शाता है कि  मैं परोपकार लीन हूँ।

कैसा मरमारथ रचा है ढोंगी मानव ने, 

सुविधा सुखों में कहता है आत्मलीन हूँ।

सचमुच यदि क्षणभर आत्मदृष्टि मिले, 

लगेगा यही कि मैं न तेरा हूँ न तीन हूँ ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४१

प्रातःकाल शीघ्र जागरण अत्यन्त आवश्यक है, एक लक्ष्य अवश्य सुनिश्चित करें,  कोई न कोई परोपकार का कार्य भी करें l इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि हम रामकाज के लिए ही  रामालय अर्थात् भारत में जन्मे हैं l 

रामत्व तात्पर्यतः अपने भीतर के तत्त्व को जिसे हम विस्मृत किए रहते हैं को जाग्रत करें l 



श्रीरामचरितमानस केवल कथा नहीं है, उसमें ज्ञान, व्यवहार, नीति, भक्ति, मनोविज्ञान और गहरा जीवनदर्शन समाहित है, जिसे पाने के लिए केवल पाठ नहीं बल्कि खोज की दृष्टि चाहिए।  महात्मा तुलसीदास जी ने प्रत्येक चरित्र और प्रसंग में जीवन के सूत्र छिपाए हैं l मानस हमें सिखाता है कि ज्ञान केवल शास्त्रों से नहीं, आचरण से प्रकट होता है  व्यवहार में विनम्रता, करुणा और संयम आवश्यक हैं तथा जीवन का सत्य यह है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और संतुलन नहीं छोड़ना चाहिए। जैसे समुद्र-मंथन में अमृत छिपा था, वैसे ही मानस में जीवन का अमृत छिपा है, जिसे श्रद्धा, मनन और अनुभव से खोजने पर ही प्राप्त किया जा सकता है  इसलिए श्रीरामचरितमानस पढ़ने का नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का एक अद्भुत ग्रंथ है l


कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।

त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥

जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।

रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥


श्रीराम जी अपनी वानर सेना सहित राक्षसों का संहार करके मां सीता को पुनः ले आएँगे। उनका यह पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकों को पावन करने वाला है, जिसका देवता, मुनि और नारद आदि निरन्तर गुणगान करते हैं। जो मनुष्य इस कथा को सुनता, गाता, कहता अथवा आदरपूर्वक स्मरण करता है, वह परम पद अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है। तुलसीदास जी स्वयं को श्रीरघुवीर के चरणकमलों का भ्रमर मानकर यह गान करते हैं।




आजकल हम लोग सुन्दर कांड में प्रविष्ट हैं 

सुन्दरकाण्ड मूलतः हनुमान जी के शौर्य, बुद्धि, भक्ति, सेवा, उत्साह और साधना का काण्ड है। इसमें हनुमान जी केवल दूत नहीं, बल्कि आदर्श साधक के रूप में प्रकट होते हैं। उनके जीवन में आने वाली प्रत्येक बाधा, परीक्षा और संकट उनके उत्साह, श्रद्धा और पुरुषार्थ के आगे मार्ग बन जाता है। समुद्र की विशालता, लंका की दुर्गमता, राक्षसों का भय, मां सीता की खोज की कठिनाई—इनमें से कोई भी उनके लिए रुकावट नहीं बनती, क्योंकि उनका मन प्रभु राम के चरणों में स्थिर रहता है।


सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥

संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥4॥


यह चौपाई हनुमान जी द्वारा रावण को कही गई निर्भीक चेतावनी है।

“हे दशानन! प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि जो श्रीराम से विमुख हो जाता है, उसकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी रामद्रोही की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं।”


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कवितावली का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

23.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५८ वां* सार -संक्षेप

 जीवन एक अखण्ड यज्ञ है 

यह सच जिसने जान लिया,

और समय पर विधि-विधान 

जिसने विधिवत् पहचान लिया,

वह मनुष्य सत्पुरुष विश्व का

और कर्मयुत योगी है, 

योग कर्मकौशल होता है 

ज्ञाता सतत प्रयोगी है ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४०

 हम जिस कार्य में उत्साह, समर्पण, प्रसन्नता और उत्तरदायित्व का भाव रखेंगे , वही पुरुषार्थ का वास्तविक स्वरूप होगा । पुरुषार्थ केवल कठोर परिश्रम का नाम नहीं, अपितु अपने कर्तव्य को श्रद्धा, संतुलन और आन्तरिक प्रसन्नता के साथ निभाने की जीवन-दृष्टि है।





संसार में अधर्म और अन्याय चाहे जितना बढ़ जाए, ईश्वर कभी भी धर्म और सत्य को असहाय नहीं छोड़ते। वे किसी न किसी रूप में प्रकट होकर संतों, सज्जनों और पीड़ितों की रक्षा करते हैं तथा अधर्म का विनाश कर पुनः धर्म की स्थापना करते हैं l *श्रीरामचरितमानस* में वर्णित यह दिव्य कल्याणकारी विचार आज भी हमें अनेक सांसारिक प्रपंचों, भ्रमों और विपरीत परिस्थितियों के मध्य धैर्य, विश्वास और धर्मनिष्ठा बनाए रखने की प्रेरणा दे रहा है। यह प्रेरणा लेकर हम 

राष्ट्रसेवापरायण बने रहें इसका प्रयास करें यही रामकाज है और जिसे हनुमान् जी ने भी निष्ठापूर्वक निभाया l

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥॥

हम पहुंच गये हैं अशोक वाटिका में 


जब हनुमान् जी ने पर्वत को अपने चरणों से स्पर्श किया, तो वह मानो तुरंत पाताल लोक तक पहुँच गया। उनकी गति इतनी तीव्र थी जैसे भगवान् श्रीराम का अमोघ बाण कभी व्यर्थ नहीं जाता, वैसे ही हनुमान् जी का कार्य भी अचूक और अटूट होता है। इसी प्रकार वे अत्यंत वेग से अपने कार्य हेतु आगे बढ़ते हैं। आगे हनुमान् जी रावण को स्पष्ट रूप से चेतावनी देते हैं कि भगवान् श्रीराम से वैर करना उचित नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि यदि भलाई चाहते हो तो मां सीता को लौटा दो, जैसा मैंने कहा है।


(जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥)


काजपा की चर्चा क्यों हुई, refugee colony को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने क्या नाम दिया, हनुमान् जी के सहज भाव को तुलसीदास जी ने किस प्रकार व्यक्त किया, अधिवेशन में अपने प्रयोगों का प्रदर्शन क्यों हो जानने के लिए सुनें

22.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५७ वां* सार -संक्षेप

 सीय की दसा बिलोकि विटप असोक तरु,

तुलसी बिलोक्यो सो तिलोक सोक-सारु सो॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३९

इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम देशभक्ति को संगठन को महत्त्व दें क्योंकि तभी दुष्ट शक्तियां भयभीत रहेंगी l 

हमारे रहते भारत मां कभी निराश, निर्बल या असहाय नहीं रह सकतीं।


जब जीवन में कष्ट, व्यथा, भय या समस्याएँ घेर लेती हैं, तब श्रीरामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड केवल पाठ नहीं रह जाता, वह आत्मबल जाग्रत करने वाला दिव्य साधन बन जाता है।

सुन्दरकाण्ड में हनुमान् जी का चरित्र हमें सिखाता है कि असम्भव प्रतीत होने वाली बाधाएँ भी भक्ति, साहस और पुरुषार्थ से पार की जा सकती हैं। समुद्र लाँघने से लेकर लंका में प्रवेश, अशोक वाटिका जो तीनों लोकों के दुःखों का सार है,की खोज,मां सीता को आश्वासन, और  इसके पश्चात् सम्पूर्ण लंका में अपने तेज का प्रकाश फैलाना — यह सब केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और ईश्वरनिष्ठा का उत्कर्ष है।हनुमान् जी का प्रत्येक प्रयास उल्लास से भरा है। वे निराशा में भी आशा खोजते हैं, संकट में भी धैर्य रखते हैं, और हर क्षण “रामकाज” को ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं। 

*राम काज कीन्हे बिनु, मोहि कहाँ विश्राम।*

इसी कारण उनकी सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती चली जाती हैं। जाम्बवान् द्वारा स्मरण कराने पर 

*कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥*

*राम काज लगि तव अवतारा*


जो शक्ति प्रकट हुई

*सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥*

 वह फिर सीमित नहीं रही — वह प्रभा बनकर चारों ओर फैल गई।


सुन्दरकाण्ड का संदेश यह है कि हमारे भीतर भी हनुमान् जी जैसी अप्रकट शक्तियाँ विद्यमान हैं। जब मन में श्रद्धा, लक्ष्य में पवित्रता और हृदय में सेवा का भाव हो, तब भय और दुःख टिक नहीं सकते।


इसीलिए कहा जाता है कि सुन्दरकाण्ड का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मबल, उत्साह और दिव्य प्रकाश को अपने भीतर जाग्रत करने की साधना है।

तो आइये अपनी भावनाओं की क्षमतानुसार भावों के साथ प्रवेश करें सुन्दर कांड में


*दोहा*


देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥

हनुमान् जी की बुद्धि, बल और कुशलता को देखकर जानकी जी ने कहा—

हे तात! अब तुम जाओ। अपने हृदय में श्रीराम के चरणों को धारण करके इस वाटिका के मधुर फल खाओ।

फल खाना एक साधारण कार्य नहीं रह जाता यह अधर्म की लंका में धर्म की निर्भीक उपस्थिति का उद्घोष बन जाता है।

हनुमान् जी सीता जी को सिर नवाकर चले और बाग में घुस गए। फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछ को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया नरेन्द्र शुक्ल जी १९८१ का उल्लेख क्यों किया  वास्तव में ब्रह्मास्त्र क्या है जानने के लिए सुनें l

21.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३८

अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हम अनुशासित होकर अपने संगठन को सशक्त बनाएं l


सुन्दर कांड के माध्यम से अब तक हमने जाना कि हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकार की राक्षसी विभूतियाँ देखीं स्वर्णमयी प्रासाद और रावण का वैभव देखा, परन्तु उनका मन केवल श्रीरामकार्य में लगा रहा। वे सीताजी की खोज करते हुए अनेक भवनों में गए, किन्तु माता सीता कहीं दिखाई नहीं दीं। इससे वे कुछ क्षण के लिए चिंतित भी हुए, परन्तु श्रीराम का स्मरण कर पुनः उत्साहपूर्वक खोज में लग गए।

अन्ततः वे अशोक वाटिका पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक वृक्ष पर छिपकर देखा कि अनेक राक्षसियों से घिरी हुई माता सीता अत्यन्त दुःखी अवस्था में बैठी हैं। वे कृशकाय हो गई थीं, उनका मन निरन्तर श्रीराम के चरणों में लगा था और वे विरह-वेदना से व्याकुल थीं। उसी समय रावण वहाँ आया और उसने सीताजी को भय, प्रलोभन तथा कठोर वचनों से अपने अधीन करने का प्रयास किया। किन्तु जनकनन्दिनी ने उसे दृढ़तापूर्वक तिरस्कृत कर दिया और श्रीराम के प्रति अपनी अखण्ड निष्ठा प्रकट की l यह सब देखकर हनुमान जी अत्यन्त करुणा और प्रेम से भर गए। उन्होंने विचार किया कि पहले किसी प्रकार माता सीता का भय दूर किया जाए। मुद्रिका देखकर सीताजी का संशय दूर हुआ और उन्हें विश्वास हो गया कि यह श्रीराम के ही दूत हैं।

तब हनुमान जी ने अत्यन्त विनय, करुणा और भक्ति से यह दोहा कहा—

“रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥”


  हे माता! अब धीरज धरकर श्री रघुनाथजी का संदेश सुनिए। ऐसा कहकर हनुमान जी प्रेम से गद्गद हो गए। उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया l

हनुमान जी बोले-श्री रामचंद्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नए-नए कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान है , रात्रि कालरात्रि के समान है , चंद्रमा सूर्य के समान है l

हनुमान जी ने आश्वस्त किया कि राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्री रघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो l

हम भी जब जीवन में अन्याय, भय, निराशा या बाधाओं से घिरते हैं, तब हनुमान जी की भाँति अपने भीतर धैर्य और पराक्रम का भाव जाग्रत कर सकते हैं। यदि हमारा प्रयास सत्य और कल्याणकारी हो, तो विपत्तियाँ स्थायी नहीं रहतीं। हम प्रयास कर रहे हैं शिक्षा,  जो अखंड तेजस,विश्वास, आत्मनिर्भरता है,के माध्यम से संगठित रहने के लिए l समाज और देश के लिए हनुमत् भाव को धारण कर हमें संगठित रहना आवश्यक है l


आचार्य जी ने भैया राघवेन्द्र जी १९७६ , भैया विवेक गुप्त जी १९८५ का उल्लेख क्यों किया, अयोध्या के संत अञ्जनी  नन्दन जी शरण की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l

20.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३७


श्रीरामचरितमानस का अध्ययन ध्यानपूर्वक करें और संकल्पबद्ध हों 


निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥


यह दोहा श्रीरामचरितमानस के सुन्दर कांड में एक अत्यन्त करुण प्रसंग  का है जहाँ हनुमान जी अशोक-वाटिका में मां सीता को अत्यन्त दुःखी अवस्था में देखते है l 

माता जानकी ने अपने नेत्र अपने चरणों पर स्थिर कर रखे थे और उनका मन भगवान् श्रीराम के चरण-कमलों में पूर्णतः लीन था। वे बाह्य संसार से विरक्त होकर केवल प्रभु-स्मरण में निमग्न थीं। उनके शरीर में दुःख, विरह और कष्ट स्पष्ट दिखाई देता था, परन्तु अन्तःकरण में श्रीराम के प्रति अखण्ड श्रद्धा और प्रेम विद्यमान था।

जब पवनपुत्र हनुमान जी ने जनकनन्दिनी सीता की ऐसी दीन, क्षीण और करुण अवस्था देखी, तब वे अत्यन्त दुःखी हो उठे। उनके हृदय में करुणा, भक्ति और सेवा का भाव एक साथ उमड़ पड़ा। यह दृश्य केवल एक भक्त की संवेदना नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के प्रति समर्पित हृदय की व्यथा को भी प्रकट करता है।

यदि इसी भाव को भारतमाता के संदर्भ में देखें, तो इसका अर्थ अत्यन्त प्रेरणादायक है।जब राष्ट्र अपनी संस्कृति, एकता और आदर्शों से दूर होने लगता है, तब भारतमाता की स्थिति भी मानो अशोक-वाटिका में बैठी सीतामाता जैसी करुण प्रतीत होती है।

ऐसी अवस्था को देखकर हम हनुमान जी के भक्त राष्ट्रभक्तों  के भीतर हनुमानजी जैसा सेवाभाव जाग्रत होना चाहिए। जैसे हनुमानजी ने निराशा के बीच आशा, साहस और प्रभु-संदेश पहुँचाया, वैसे ही हमें भारतमाता के गौरव, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के संरक्षण हेतु पुरुषार्थ करना चाहिए। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l हनुमान जी अपने प्रयासों में कभी असफल नहीं हुए हम भी यही भाव रखें l 

कथा में आगे 

 सीता जी को विरह से परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान जी को कल्प के समान बीता॥


कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।

जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥12॥


माता सीता ने जब श्रीराम के नाम से अंकित वह मुद्रिका देखी, तब वे आश्चर्य से भर गईं। उन्होंने उसे पहचान लिया कि यह प्रभु श्रीराम की ही अंगूठी है। उस समय उनके हृदय में एक साथ हर्ष और विषाद दोनों उमड़ पड़े l 

इसके आगे  आचार्य जी ने क्या बताया,भैया पंकज श्रीवास्तव  जी, भैया शुभेन्दु शेखर जी , भैया शुभेन्द्र सिंह जी का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं, माताओं का ध्यान चरणों पर रहता है किन्तु पुरुषों का ध्यान कहां रहता है, त्रिदंड सन्न्यास क्या है जानने के लिए सुनें l

19.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५४ वां* सार -संक्षेप

 "धर्म " मनुष्यों के जीवन का, एकमेव है अनुशासन । 

इस पर ही आधारित रहता है, उसका उत्थान-पतन ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३६


विनम्रता, सदाचार, संयम, करुणा,त्याग, शौर्य, पराक्रम जैसे दिव्य गुणों को अपने जीवन में प्रवेश कराएं ताकि जीवन मंगलमय हो सके l अपने कार्य व्यवहार पर दंभ न करें l




प्रातःकाल का जागरण, अध्ययन, स्वाध्याय तथा इन पवित्र वेलाओं के सदाचारमय विचारों का श्रवण हमारे जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं कल्याणकारी है l हमें इनका लाभ उठाना चाहिए ताकि हम संसार के प्रपंचों संकटों से मुक्त रहकर आनन्द में रह सकें l

अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करें क्योंकि आत्मबोध से ही स्थायी आनन्द और सच्ची शान्ति की प्राप्ति होती है।

हनुमान जी जब तक अपनी शक्ति को विस्मृत किए रहते हैं, तब तक वे सामान्य वानर के समान प्रतीत होते हैं; किन्तु जैसे ही उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप और सामर्थ्य का स्मरण कराया जाता है, वे समुद्र लाँघकर असम्भव कार्य को भी सिद्ध कर देते हैं। मानस में सुन्दरकाण्ड यह प्रेरणा देता है कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर, विनम्रता और भक्ति के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। तो आइये 

अब हम प्रवेश करें सुन्दर कांड में 


पृथ्वी की पुत्री मां सीता पृथ्वी के समान धैर्य, करुणा और दिव्य गुणों से परिपूर्ण जनकनन्दिनी हैं। वे अशोक-वाटिका में रहने पर भी अपने पवित्र चरित्र, धैर्य और अटल पतिव्रत-धर्म से सम्पूर्ण संसार को आदर्श प्रदान कर रही हैं।

तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥1॥



हनुमान जी अशोक-वाटिका में वृक्ष के पत्तों के बीच छिपकर बैठे हैं। वे मन ही मन विचार कर रहे हैं कि अब किस प्रकार मां सीता से भेंट करूँ और उन्हें प्रभु राम का सन्देश दूँ। उसी समय रावण अनेक सुसज्जित स्त्रियों के साथ वहाँ आ पहुँचता है।

उस दुष्ट ने सीता जी को बहुत प्रकार से समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया 

 भैया प्रतीप दुबे जी,भैया अक्षय जी, भैया मुकेश जी, भैया अजीत जी, भैया आलोक सांवल जी के नाम आचार्य जी ने क्यों लिए जानने के लिए सुनें l

18.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५३ वां* सार -संक्षेप

 भाव की भाषा जहां व्यवहार के पथ पर चली है

और सात्विक शक्ति को चैतन्य की झंकृति मिली है

वहीं सन्निधि का अनोखा प्रेममय संबल मिला है 

सहज प्रेमी साथियों का हर तरह का बल मिला है

इसी बल को ज्ञानियों ने संगठन का नाम देकर

और मानव को विधाता ने यशस्वी काम देकर

जगत के झंझा झकोरों पर विजय का पथ दिखाया

और मानव को मनन चिन्तन भरा जीवन सुझाया



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३५


लक्ष्य तक पहुँचे बिना, पथ में पथिक विश्राम कैसा


जब तक हम अपने उद्देश्य की प्राप्ति न कर लें , तब तक हमें आलस्य, निराशा आदि में नहीं पड़ना चाहिए। सच्चा कर्मयोगी निरन्तर प्रयास, धैर्य और संकल्प के साथ आगे बढ़ता रहता है। लक्ष्य की सिद्धि से पूर्व विश्राम करना पुरुषार्थ और कर्तव्य के मार्ग से विचलित होना माना गया है।



उच्च कोटि के चिन्तक विचारक लेखक सनातनधर्म के आराधक और राष्ट्र के एक जाग्रत पुरोहित के रूप में आचार्य जी का प्रयास रहता है कि हमारी जैसी सनातन धर्म में आस्था रखने वाली राष्ट्रभक्त शक्तियाँ  जाग्रत एवं सजग हों मात्र पूजा ध्यान धारणा संसार का प्राप्तव्य नहीं है उद्देश्य यह है कि हम धर्मनिष्ठ जन आत्मबल, शौर्य, संयम और संगठन से शक्तिसम्पन्न बनें,हमारी चेतना प्रखर हो तथा हम धर्म, संस्कृति और राष्ट्ररक्षा के प्रति सदैव तत्पर रहें  ताकि दुष्ट, अधर्मी और राष्ट्रविघातक प्रवृत्तियाँ हमारे तेज, साहस और अनुशासन से भयभीत रहकर अनिष्ट करने का साहस न कर सकें।

हम केवल विचारों में नहीं, बल्कि प्रेम, अनुशासन, कर्तव्य और परस्पर सहयोग में संयुत हों , तब हमारी शक्ति समाज और राष्ट्र के उत्थान का आधार बनेगी l

विधाता ने हमें यशस्वी कर्म का वरदान देकर ऐसा जीवन-पथ दिखाया है, जिसमें मनन, चिन्तन, साहस और सत्कर्म का समन्वय है l

इसी आदर्श का सर्वोत्तम प्रत्यक्ष स्वरूप भगवान् राम के जीवन में दिखाई देता है। यद्यपि वे परम दिव्य सत्ता थे, तथापि उन्होंने लोकमंगल हेतु मायामय नर-लीला करते हुए मनुष्य रूप में अवतार ग्रहण किया।

उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि आदर्श जीवन केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि मर्यादा, त्याग, धैर्य, शौर्य, करुणा और कर्तव्यपालन से निर्मित होता है। उन्हीं के भक्त हनुमान जी का चरित्र यह उद्घोष करता है कि सच्ची शक्ति वही है जो अहंकार से मुक्त होकर धर्म और कर्तव्य के लिए समर्पित हो।

सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी का चरित्र सम्पूर्ण रामायण में सबसे अधिक प्रेरणादायी और तेजस्वी रूप में प्रकट हुआ है अब हम पहुंच रहे हैं उस प्रसंग में जब हनुमान जी लंका में  मां सीता की खोज करते हुए विभीषण से भेंट करते हैं 


पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥


विभीषण उन्हें सीता जी के अशोक वाटिका में होने की बात बताते हैं, तब हनुमान जी कहते हैं कि वे मां सीता के दर्शन करना चाहते हैं 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया 

केश और किसमें भेद है भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ तृण क्या कर सकता है जानने के लिए सुनें

17.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५२ वां* सार

 छाँड़ि मन हरि-विमुखन को संग। जाके संग कुबुधि उपजति है, परत भजन में भंग। कहा भयौ पय-पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग।


(हे मेरे मन! तू ईश्वर से विमुख (दूर) रहने वाले लोगों का साथ छोड़ दे....)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३४

प्रतिभा का पलायन विचारणीय है प्रतिभा का दुरुपयोग न हो इसका प्रयास हो 

प्रतिभा ईश्वरप्रदत्त शक्ति है; उसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उत्कर्ष नहीं, अपितु समाज, संस्कृति और राष्ट्र की उन्नति भी है। यदि प्रतिभा सदुपयोग की दिशा में प्रवाहित हो, तो वही राष्ट्र को विश्वगुरु बना सकती है; किन्तु यदि उसका दुरुपयोग हो, तो वही शक्ति संकट का कारण भी बन सकती है।



सनातन धर्म को क्षीण करने के कुत्सित किन्तु कभी सफल न होने वाले प्रयास युग-युग में होते रहे हैं और आज भी विविध रूपों में दृष्टिगोचर हो रहे हैं किन्तु हमें केवल मौन द्रष्टा बनकर परिस्थितियों को देखना नहीं है, अपितु स्रष्टा बनकर धर्म, संस्कृति, सदाचार और मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण में सक्रिय योगदान देना है।

धर्म की रक्षा केवल वाणी से नहीं, अपितु आचरण, ज्ञान, करुणा, संयम, शौर्य, पराक्रम और संगठन से होती है। जब हम अपने जीवन में सत्य, सेवा, शील, संस्कार, शौर्य, पराक्रम को प्रतिष्ठित करते हैं, तभी वास्तविक रूप से सनातन की रक्षा होती है।

भगवान् श्रीराम,भगवान् श्रीकृष्ण के साथ असंख्य ऋषियों मुनियों चिन्तकों योद्धाओं आदि ने हमें यही शिक्षा दी कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्ममार्ग का सृजनात्मक प्रकाश बुझने नहीं देना चाहिए।

अतः आवश्यक है कि हम अपनी परम्पराओं का गम्भीर अध्ययन करें,नई पीढ़ी को संस्कार दें,राष्ट्रभक्त समाज में समरसता और सद्भाव बढ़ाएँ तथा राष्ट्र और संस्कृति के उत्कर्ष हेतु सकारात्मक शक्ति बनें। सनातन की वास्तविक सेवा यही है कि हम स्वयं दीपक बनकर अन्य दीपों को प्रज्वलित करें।

गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यन्त विषम सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिस्थितियों में भी अद्भुत धैर्य, श्रद्धा और लोकमंगल की भावना के साथ रामचरितमानस जैसे अमर ग्रन्थ की रचना की जो हमें शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराता है । उस समय समाज अनेक प्रकार के विघटन, निराशा, सांस्कृतिक अस्थिरता और नैतिक पतन से जूझ रहा था। यह ग्रंथ हमें उत्साह, शक्ति, बुद्धि, विचार, कौशल आदि प्रदान करता है और इसके सुन्दर कांड में  आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं l 


अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥

हनुमान जी का यह विनम्र स्वभाव उनको महान् बना देता है l

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥

इसके बाद विभीषण ने विस्तारपूर्वक वह सब कथा कही कि जनकनन्दिनी सीता जी किस प्रकार अशोक वाटिका में रह रही हैं, उनकी अवस्था कैसी है और रावण उन्हें किस प्रकार कष्ट दे रहा है। यह सुनकर हनुमान जी ने कहा—

“हे भ्राता! अब मैं माता जानकी के दर्शन करना चाहता हूँ।”


युगभारती के पूर्व अध्यक्ष रहे स्व भैया राजेश पांडेय जी की चर्चा क्यों हुई, संगठन के कार्य क्या कालापेक्षी हैं जानने के लिए सुनें l

16.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५१ वां* सार -संक्षेप

 राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥

एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३३

रामत्व और हनुमानत्व  का अनुभव करें 


प्रातःकाल की ये सदाचारमयी वेलाएँ अत्यन्त अद्भुत हैं जो हमें ज्ञान, सम्मान और अन्तःशुद्धि प्रदान कर रही हैं। हमें चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करा रही हैं l 

समय का परिपालन और समय का सदुपयोग संसार में सफलता प्राप्त करने के लिए अत्यन्त आवश्यक और अनिवार्य होता है।

दान एक महान् धर्म है, जो हमारे हृदय में करुणा, उदारता और लोकमंगल की भावना उत्पन्न करता है। विसंगतियां उत्पन्न करने वाले दुष्टों के विरुद्ध  समयानुकूल शक्ति का प्रदर्शन अत्यन्त आवश्यक है।


संसार तो विविध प्रपंचों से परिपूर्ण है ऐसे में यदि समय, शक्ति और धन का समन्वित एवं विवेकपूर्ण उपयोग हो, तो जीवन सहज ही आनन्दमय और सार्थक बन जाता है।


नररूप में लीला करने वाले भगवान् राम ने मानवता के सम्मुख एक उच्च आदर्श प्रस्तुत किया है।

उन्होंने सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य, शौर्य, पराक्रम और धर्मपालन का जो पथ दिखाया, वह सम्पूर्ण मानवजाति के लिए प्रेरणास्रोत है। हमें उनके चरित्र से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।

जब हम अपने जीवन को भगवान् राम के आदर्शों से संयुत करते हैं, तब हनुमानजी स्वयं भक्त और भगवान् के मध्य सेतु एवं मध्यस्थ के रूप में हमारा मार्गदर्शन करते हैं। आजकल हम लोग सुन्दर कांड में प्रविष्ट हैं जो हनुमान जी के कर्ममय उद्धरणों का एक साक्षी है


हनुमान जी मां सीता की खोज में लंका में विचरण कर रहे थे, तब उन्हें एक ऐसा घर दिखाई पड़ा जो अन्य राक्षसों के भवनों से भिन्न था।


रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥5॥

जिस घर पर भगवान् राम के आयुधों (धनुष-बाण आदि) के चिह्न अंकित थे, उस घर की शोभा वर्णन से परे थी। वहाँ नवीन तुलसी के समूहों को देखकर कपिश्रेष्ठ हनुमान जी अत्यन्त प्रसन्न हुए।


राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥

एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥



बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥3॥



सद्वृत्तियों के साथ जन्मे विभीषण का स्वभाव अत्यन्त विनम्र, धर्मनिष्ठ और सत्संगप्रिय था। जैसे ही उन्होंने ब्राह्मण रूपधारी हनुमान जी के मुख से मधुर एवं सात्त्विक वचन सुने, वे आदरपूर्वक उनके पास आए। उन्होंने पहले प्रणाम किया, फिर उनकी कुशल पूछी और विनयपूर्वक परिचय जानना चाहा।



'दशरथ राज्य में मनुष्य पीड़ित था' से आचार्य जी क्या कहना चाह रहे हैं,संविधान की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

15.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५० वां* सार -संक्षेप

 नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा l 


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३२

जहाँ श्रद्धा, सेवा,शौर्य और पराक्रम है वहाँ निराशा स्थायी नहीं रह सकती।

सुख हरषहिं जड़ दु:ख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥4॥

यह चौपाई सिखाती है कि जीवन में परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। सुख और दुःख दोनों क्षणिक हैं। जो मनुष्य धैर्य, संयम और विवेक बनाए रखता है, वही वास्तव में स्थिर और सफल जीवन जी पाता है।


कष्ट,व्यथा,दुःख,अशान्ति,असुविधा और पीड़ा की अवस्थाओं में सुन्दरकाण्ड का पाठ हम राष्ट्रभक्तों के अन्तःकरण में आशा, धैर्य और उत्साह का संचार करता है सुन्दर कांड भगवान् हनुमान जी के अद्भुत कर्म, उद्यम, सेवा, विवेक, वैराग्य, भक्ति, शौर्य, पराक्रम की कथा है l 

हनुमान जी प्रत्येक परिस्थिति में धैर्यवान् रहते हैं। वे संकट देखकर विचलित नहीं होते, अपितु समाधान खोजते हैं। समुद्र लाँघना, लङ्का में प्रवेश करना, मां सीता की खोज करना, रावणसभा में निर्भीक रहना—ये सब उनके कर्मयोग, बुद्धि और निष्ठा के अद्भुत उदाहरण हैं।वे केवल बल के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि विनय, सेवा और समर्पण के भी आदर्श हैं।  भगवान् राम के प्रति उनकी अखण्ड भक्ति ही उन्हें असम्भव कार्यों में भी सफल बनाती है।हनुमान जी शिक्षा देते हैं कि जीवन में दुःख और बाधाएँ आएँ, तब भयभीत न होकर उत्साह, विवेक और ईश्वर-स्मरण के साथ आगे बढ़ना चाहिए।


आजकल हम लोग सुन्दर कांड में ही प्रविष्ट हैं और प्रसंग चल रहा है 

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥


हनुमान जी कहते हैं कि “जब तक मैं माता सीता का दर्शन करके वापस नहीं आ जाता, तब तक आप सब प्रतीक्षा कीजिए। यह कार्य अवश्य सिद्ध होगा; मेरे हृदय में विशेष उत्साह और आनन्द है।”

ऐसा कहकर वे सब वानरों को प्रणाम करते हैं और हृदय में श्रीरघुनाथ जी को धारण करके अत्यन्त हर्षपूर्वक प्रस्थान करते हैं।


जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥॥


जब हनुमान जी समुद्र लाँघने के लिए पर्वत पर अपने चरण रखकर उछले, तब उनके अपार बल के प्रभाव से वह पर्वत तत्काल पाताल की ओर धँस गया।

तत्पश्चात् वे ऐसे वेग से आगे बढ़े जैसे श्रीरघुनाथ जी का अमोघ बाण लक्ष्य की ओर जाता है।

इसके आगे आचार्य जी ने नागमाता सुरसा का प्रसंग आदि बताया l

सुरसा प्रसंग सिखाता है कि जीवन की अनेक बाधाएँ केवल शक्ति से नहीं, बल्कि धैर्य, बुद्धिमत्ता और संतुलित व्यवहार से पार होती हैं।


आचार्य जी ने कहा कि हर लंका में एक विभीषण अवश्य होता है जिसका तात्पर्य है

अधर्म और अव्यवस्था के बीच भी सत्य, सदाचार और ईश्वरभक्ति का कोई न कोई आधार अवश्य विद्यमान रहता है।


Radar का उल्लेख क्यों हुआ, नेता और देवता में क्या समानता है, शूर्पणखा द्वारा सिद्धान्त की बात की चर्चा क्यों हुई, सत्संग क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

14.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३१

इन सदाचार संप्रेषणों


तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥


 का श्रवण कर जाग्रत हों और  समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी जीवनोन्मुखी उत्थानोन्मुखी कर्म के लिए उद्यत हों l पतनोन्मुखी कार्यव्यवहार से दूरी बनाएं l


भारतवर्ष सम्पूर्ण विश्व की प्राण-रेखा है। हम “भा” अर्थात् प्रकाश, ज्ञान और चेतना में रत रहने वाले भारतीय हैं; इसी कारण हमारा स्वभाव समस्त विश्व को आलोकित और भास्वर बनाने का रहा है। भारतीय संस्कृति, जो कर्मवादी ध्यानवादी विश्वासवादी संस्कृति है,केवल अपने उत्थान की नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की कामना करती है। यहाँ का जीवन-दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से प्रेरित होकर समस्त जगत् को एक परिवार मानता है। इसी कारण भारत ने युगों-युगों तक ज्ञान, अध्यात्म, करुणा, शान्ति और सदाचार का प्रकाश सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित किया है।

हम प्रकृति का शोषण नहीं करते, अपितु उसके उपासक और पूजक हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को जड़ वस्तु नहीं, बल्कि चेतना और जीवन की आधारशक्ति माना गया है। यही कारण है कि यहाँ नदियों को माता, पृथ्वी को धरणी, वनों को देवस्वरूप तथा पर्वतों को पूजनीय माना गया है।

हमारा दृष्टिकोण उपभोग का नहीं, सहअस्तित्व का है। हम प्रकृति से उतना ही ग्रहण करने की शिक्षा पाते हैं, जितना जीवन के लिए आवश्यक हो और उसके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाए रखते हैं। इसी भावना ने भारतीय जीवन-पद्धति को संतुलन, संवेदना और संरक्षण का मार्ग प्रदान किया है।

श्रीरामचरित मानस एक अद्भुत अप्रतिम ग्रंथ है जिसके माध्यम से हम अपनी संस्कृति अपने इतिवृत्त को भलीभांति जान सकते हैंl तो आइये प्रवेश करें इसी ग्रंथ में l


जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥


 शिवावतार हनुमानजी कहते हैं—

“जब तक मैं माता सीता को देख न लूँ, तब तक यह कार्य पूर्ण नहीं माना जाएगा। किन्तु मुझे विशेष हर्ष है कि यह कार्य अवश्य सिद्ध होगा।”

ऐसा कहकर उन्होंने सब वानरों को प्रणाम किया और हृदय में प्रभु राम को धारण करके अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रस्थान किया।

हम प्रविष्ट हो चुके हैं सुन्दर कांड में जिससे हम शक्ति भक्ति विचार कौशल योग्यता आदि प्राप्त कर सकते हैं  और जिसकी इस चौपाई में हनुमान जी के  विश्वास,उत्साह, विनय और प्रभु-समर्पण का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है।

सुन्दर कांड में आचार्य जी ने  आगे क्या बताया, त्रिकूट का क्या अर्थ बताया,  विरक्त हनुमान जी अनुरक्त कैसे हो गये, कवितावली का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

13.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी (अपरा एकादशी )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी (अपरा एकादशी )विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३०

शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की महत्ता को अवश्य जानें 



अद्भुत है भारत और अद्भुत है भारतीय भाव। जिसे यह भाव जितनी मात्रा में प्राप्त हो जाता है, वह इस संसार-सागर में उतना ही अधिक आनन्द का अनुभव करता है भारतीय संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक उन्नति का मार्ग नहीं दिखाती, अपितु अन्तःकरण की शान्ति, आत्मीयता, करुणा, समत्व, शौर्य और पराक्रम का भी बोध कराती है। इसी कारण यहाँ जीवन को संघर्ष मात्र नहीं, बल्कि साधना और आनन्द की यात्रा माना गया है।


जब मनुष्य यह समझ लेता है कि जो कुछ भी होता है, वह सब ईश्वर-नियति के अनुसार ही होता है और परमात्मा कभी किसी का अहित नहीं करता, तब उसके भीतर अटूट विश्वास जन्म लेता है। यह विश्वास उसे भय, संशय और मोह के बन्धनों से मुक्त कर देता है।


ऐसी अवस्था में व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति को ईश्वर की ही कृपा और कल्याणकारी योजना के रूप में स्वीकार करता है। सुख और दुःख दोनों ही उसके लिए समान रूप से शिक्षण बन जाते हैं।


इस गहन समर्पण और निर्भय भाव में ही निर्भरा भक्ति का उदय होता है l

गोस्वामी तुलसीदास जी भी भगवान् राम, जिन्होंने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए जन्म लिया है, से इसी की कामना कर रहे हैं 


नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये

सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।

भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे

कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ 2॥

इसकी व्याख्या के साथ आचार्य जी ने सुन्दर कांड में और क्या बताया,आचार्य जी ने निर्वाण और गीर्वाण की चर्चा क्यों की, वरदान के दुरुपयोग पर शिव जी किसको दंड दे रहे हैं, सुन्दर कांड में सुन्दर क्या है जानने के लिए सुनें

12.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४७ वां* सार -संक्षेप

 कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।

त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥

जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।

रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२९


सनातन धर्म में श्रद्धा विश्वास और रुचि रखने वाले हम राष्ट्रभक्तों को  प्रातःकाल शीघ्र जागना ही चाहिए साथ ही अपने आहार-विहार को सदैव शुद्ध एवं संयमित रखना चाहिए क्योंकि सुदृढ़ शरीर, संयमित आचरण और जाग्रत चेतना से ही हम धर्म, कर्तव्य और आत्मोन्नति के मार्ग पर स्थिर रह सकते हैं l



अपना तन, अपना मन, अपना जीवन, अपना परिवार, अपना समाज,अपना राष्ट्र और अपना विश्व —ये सब ‘अपनेपन’ के क्रमिक विस्तार हैं।

हमारा ‘स्व’ जितना संकीर्ण रहता है तो उतना ही हमारा जीवन सीमित और क्लेशपूर्ण होता है  किन्तु जैसे-जैसे अपनेपन का विस्तार होता जाता है, वैसे-वैसे हृदय में आनन्द, करुणा और आत्मीयता का उदय होने लगता है। हमारे अनेक ग्रंथ ऐसे हैं जो इसी प्रकार के गूढ़ तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण हैं  किन्तु उनकी भाषा और शैली हम लोगों के लिए कभी-कभी कठिन प्रतीत होती है।

इसके विपरीत, श्री रामचरितमानस


रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥

तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥


 ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिसमें कथा है संदेश है और जिसमें उन्हीं उच्च आध्यात्मिक सिद्धान्तों को लोकभाषा में अत्यन्त सहज, सरस और हृदयग्राही रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस ग्रंथ के रहस्य को जानने पर हमें निश्चित रूप से आनन्द की अनुभूति होगी l

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥

जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक॥1॥


अंगद कहते हैं— “मैं समुद्र के पार तो चला जाऊँगा, किन्तु मन में यह सन्देह है कि पुनः लौट सकूँगा या नहीं।”

तब जाम्बवान् कहते हैं— “आप तो सब प्रकार से समर्थ हैं, किन्तु आप हम सबके नायक हैं; इसलिए आपको भेजना उचित नहीं है।”

हम पहुंच चुके हैं किष्किन्धा कांड के इस भाग में 


जब सम्पूर्ण वानर-सेना समुद्र पार करने की समस्या से चिन्तित थी, तब जाम्बवान् ने शिवावतार हनुमानजी को उनकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराया।

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥


हनुमानजी ने जैसे ही जाम्बवान् के प्रेरणापूर्ण वचन सुने, वैसे ही उनकी सुप्त शक्ति जाग्रत हो उठी।

आचार्य जी से भी हमें उत्साह, विश्वास और उचित प्रेरणा मिल रही है हम भी अपने सुप्त सामर्थ्य को जाग्रत करें असम्भव कार्यों को भी सम्भव करने का प्रयास करें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने 

कानपुर के चन्द्र शेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन बैच १९७८ के भैया संजीव गुप्त जी से कल हुई भेंट के विषय में क्या बताया जानने के लिए सुनें

11.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२८

हम किसी भी कार्य को उत्साह, प्रसन्नता और पूर्ण मनोयोग के साथ करें व्याकुलता, कुंठा, निराशा तथा हीनभावना से दूर रहकर किए गए कार्य न केवल अधिक सफल होते हैं , बल्कि उनसे मन में संतोष, आत्मविश्वास और नवीन ऊर्जा का भी संचार होता है l 

इस परामर्श पर अवश्य ध्यान दें l



हमें चाहिए कि हम अपने सामर्थ्य, क्षमता और गुणों का यथार्थ आकलन करें तथा यह समझें कि हम सबके भीतर ईश्वरप्रदत्त विशेष शक्तियां निहित हैं । श्री हनुमान जी की प्रेरणा तथा भगवान् राम जी की कृपा से हम सभी में शौर्य , पराक्रम, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा के पावन गुण किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। अतः हमें आत्महीनता अथवा आलस्य में पड़े रहने के स्थान पर अपने भीतर निहित शक्तियों को जाग्रत कर देश तथा समाज के हित में कार्य करने चाहिए किन्तु ध्यान दें कि प्रत्येक कर्म में ईश्वरार्पण की भावना कभी विस्मृत न हो l अपने परिवार का प्रेमपूर्वक एवं सदाचारयुक्त पालन-पोषण करें , दंभ रहित मन और शरीर से सबल बने रहें, अपने राष्ट्रभक्त साथियों के प्रति निष्कपट एवं सद्भावपूर्ण व्यवहार करें l

 तब हम केवल अपने व्यक्तिगत जीवन का ही उत्थान नहीं करेंगे बल्कि राष्ट्र और समाज की उन्नति में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देंगे l


जो जहाँ पर देश और समाज-हित कुछ कर रहा हो, 

और निज परिवार का सत्प्रेम पोषण कर रहा हो, 

स्वयं दर्प विमुक्त मन तन से सबल हो, 

साथियों से निष्कपट व्यवहार करने में सफल हो,

ईश्वरार्पित भाव क्षण भर हो न विस्मृत, 

वैखरी वाणी मधुर हो यथा अमृत, 

समझ लो वह सत्पुरुष आदर्श नर है, 

मरणधर्मा जगत में भी वह अमर है ॥

श्रीरामचरित मानस से हमें यही प्रेरणा मिलती है l 

रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥

मन करि बिषय अनल बन जरई। होई सुखी जौं एहिं सर परई॥

स्वयंप्रभा को जब ज्ञात हुआ कि भगवान् राम लक्ष्मण वानर सेना सहित सीता की खोज में निकले हैं, तब उसने अपने योगबल से उन सबको उस दुर्गम गुहा से बाहर पहुँचा दिया, जिससे उनका कार्य पुनः आगे बढ़ सका और तब वानर सेना समुद्र तट पर पहुंच गयी l यह प्रसंग है किष्किन्धा कांड का जिसमें  तर्क कुतर्क से रहित होकर भक्तिभाव पूर्वक आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं 


इसके विस्तार में आचार्य जी ने क्या बताया, भैया डा अमित गुप्त जी, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया अक्षय जी, भैया डा प्रदीप त्रिपाठी जी, भैया अजय शङ्कर जी, भैया पवन मिश्र जी, प्रधानाचार्य श्री राकेश राम जी का उल्लेख क्यों हुआ,यश का टीका और अपयश की कालिख क्या है,मोक्ष से अधिक किसमें आनन्द है, दंभी का शंका रहित होने पर पतन का क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें

10.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४५ वां* सार -संक्षेप

 चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।

राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२७

अपने व्यक्तित्व को जटिल न बनाएं l राजनैतिक और सांगठनिक दोनों नेतृत्व पर विश्वास रखें l


हर  स्वांस ओर प्रस्वांस में , 

निज नेता पर विश्वास हो ।

राष्ट्र- कार्य के लिए संकल्पबद्ध हों l




यदि हम किसी एक दुर्गुण को अपने जीवन में स्थान दे देते हैं और उसे छोड़ने का प्रयास नहीं करते , तो धीरे-धीरे अन्य अनेक दुर्गुण भी हमारे स्वभाव में प्रवेश करने लगते हैं। एक छोटा-सा अवगुण कालान्तर में सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकता है। इस कारण हमें एक दुर्गुण से भी बचना चाहिए इसके विपरीत यदि हम अपने भीतर सद्गुणों का विशाल भण्डार विकसित करना चाहते हैं, तो हमें किसी एक श्रेष्ठ गुण को दृढ़तापूर्वक धारण कर लेना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जब हम एक सद्गुण को स्थिरता एवं निष्ठा के साथ जीवन में उतार लेते हैं , तब धीरे-धीरे अन्य सद्गुण भी स्वतः हमारे व्यक्तित्व में विकसित होने लगते हैं। कालान्तर में हमारा चरित्र उत्तम गुणों से सम्पन्न हो जाता है और हमारा जीवन आदर्शमय बन जाता है।

हम एक यही सद्गुण अपना लें कि हम राष्ट्र -कार्य के लिए संकल्पबद्ध होंगे l


संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो।

भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो॥


 हमारा लक्ष्य भी है राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः 


 हमारा राष्ट्र अद्भुत है हमारे ऋषियों ने सामान्य जनमानस को संस्कारित किया, उसे धर्म, कर्तव्य, सदाचार तथा लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित किया; तभी यह भारत एक सशक्त राष्ट्र के रूप में हमारे समक्ष प्रतिष्ठित हुआ है। यह केवल भूमि का एक साधारण टुकड़ा नहीं, अपितु अनादिकाल से प्रवाहित सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक साधना, त्याग, तपस्या तथा राष्ट्रीय एकात्मता का जीवंत स्वरूप है।



भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया मनोज अवस्थी जी, भैया अजय शंकर दीक्षित जी, भैया दिनेश प्रताप जी, भैया अखिल तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, संपाती की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

9.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२६



संन्यासी, साधु, ऋषि, मुनि, चिन्तक, विचारक, शिक्षक, आचार्य  आदि समाज के नैतिक एवं आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक होते हैं। वे अपने तप, त्याग, ज्ञान और सेवा के माध्यम से समाज को सही दिशा प्रदान करते हैं। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल और राष्ट्रोत्थान के लिए समर्पित होता है। उनके प्रति उपेक्षा, अविश्वास या तिरस्कार का भाव उत्पन्न हो जाए, तो समाज अपने मूल आदर्शों से दूर होने लगता है। परिणामस्वरूप लोगों में स्वार्थ, भ्रम और नैतिक पतन बढ़ने लगता है।इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि राष्ट्र केवल भौतिक साधनों से महान नहीं बनता  उसके लिए उच्च विचार, संस्कार और चरित्र भी आवश्यक हैं। अपनी सनातन परम्परा को हम ठीक प्रकार से जानें l प्रभात के वाहक बनें l



सामान्यतः समय का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है, किन्तु प्रत्येक क्षण सार्थक हो — यह आवश्यक नहीं। जब वही समय उत्तम विचारों, प्रेरणादायक प्रसंगों और चरित्र-निर्माण करने वाली बातों के श्रवण में लगाया जाता है, तब  हमारे भीतर संस्कार, संयम और कर्तव्यबोध उत्पन्न करता है यह सदाचार-वेला आत्मचिन्तन और व्यक्तित्व-परिष्कार का अद्भुत माध्यम है। इसे सुनने से मन में शुभ विचार जाग्रत होते हैं, व्यवहार में शिष्टता आती है और जीवन को उचित दिशा मिलती है। इस प्रकार यह समय हमारे साथ समाज और राष्ट्र के लिए भी हितकारी बन जाता है।


साधना, उपासना, सेवा, तप, दान, अध्ययन और आत्मोन्नति — सब कुछ शरीर के माध्यम से ही संभव है। शरीर न हो तो न कर्म हो सकता है, न भक्ति, न ज्ञान का अभ्यास।

मनुष्य-जीवन केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि आत्म-विकास और परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिला है। यही कारण है कि संतों ने मानव-देह को “मोक्ष का द्वार” कहा है। यदि मनुष्य इस शरीर का उपयोग सदाचार, साधना और लोकमंगल में करे, तो वही देह उसे उच्चतम अवस्था तक पहुँचा सकती है और यदि दुरुपयोग करे, तो पतन का कारण भी बन सकती है।


नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥5॥

नर -तन को प्राप्त कर हम आनन्द की अनुभूति तभी कर सकते हैं जब हम इसमें अन्तर्निहित शक्तियों की अनुभूति भी करेंगे उसके रचनाकार के बारे में विचार करेंगे 

इस मानव तन को केवल भौतिक सुखों का साधन न मानकर ईश्वर-प्रदत्त अमूल्य अवसर समझना चाहिए।


श्रीगुरुजी समग्र की चर्चा क्यों हुई, कुटिल लोभी अकबर का उल्लेख क्यों हुआ, डा हेडगेवार जी ने किसी व्यक्ति को गुरु क्यों नहीं बनाया,भैया मनोज अवस्थी जी को आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें

8.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२५

सांसारिक प्रपंचों के बीच अपने आत्मबोध को बनाए रखें व्यामोह भ्रमित न करे इसका भी ध्यान रखें किसी भी परिस्थिति में लक्ष्य ओझल न करें l


भगवान् राम ने सामान्य जनों में ऐसी भावना जाग्रत की कि उनका व्यक्तित्व समाजोन्मुखी बन गया।

हमने भी राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व के उत्कर्ष को अपना लक्ष्य बनाया है। इसकी निरन्तर समीक्षा करते रहना चाहिए।

हमें ऐसा समाजोन्मुखी व्यक्तित्व विकसित करना चाहिए, जिसमें राष्ट्र के प्रति निष्ठा, समाज के प्रति संवेदनशीलता, कर्तव्य के प्रति समर्पण तथा लोकमंगल की भावना विद्यमान हो। स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित में सोचने और कार्य करने की भावना ही समाजोन्मुखता है l यह हमारे आन्तरिक पराक्रम को भी प्रकट करती है l यह एक ऐसा दृष्टिकोण, विचार और आचरण है जिसमें व्यक्ति केवल अपने हित तक सीमित न रहकर समाज के कल्याण, उन्नति और सुख-दुःख के प्रति भी सजग एवं उत्तरदायी रहता है l 


समाज की दिशा में अग्रसर होने के लिए श्री रामचरित मानस एक उत्कृष्ट साधन है जिसके किष्किन्धा कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं l

बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।

तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत॥22॥


सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥

सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू॥


सुग्रीव ने मां सीता को दक्षिण दिशा में जाते देखा है l

मानस अद्भुत ग्रंथ है 


रावण का अन्याय और अत्याचार भीषणतम स्वरूप धारण कर चुका था।

उसका अहंकार, अधर्म और शक्ति का दुरुपयोग समस्त लोकों के लिए भय और पीड़ा का कारण बन गया था।

ऋषि-मुनियों के यज्ञ बाधित हो रहे थे, धर्म संकट में था और सज्जन समाज आतंकित था।

ऐसे समय भगवान् राम ने धर्म, मर्यादा और लोककल्याण की स्थापना हेतु रावण के अत्याचार का अंत किया।  इससे हमें यही प्रेरणा प्राप्त होती है कि हमें भी अपने राष्ट्र के प्रति अनुराग रखना चाहिए जिस प्रकार भगवान् राम ने रखा 



इसके अतिरिक्त भैया आशीष जोग जी, भैया सिद्धनाथ जी गुप्त, भैया डा अमित गुप्त जी,  भैया राजेन्द्र गुप्त जी,दीनदयाल विद्यालय कार्यालय से संबन्धित राजेन्द्र जी,श्री रामचन्द्र पांडेय जी, श्री अरिन्दम जी की चर्चा क्यों हुई, काडर किसमें प्रविष्ट हो गया जानने के लिए सुनें l

7.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२४

 दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शाठ्यं सदा दुर्जने

प्रीति: साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जनेष्वार्जवम्।

शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता

ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थिति:॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२४

अपने देश की अद्भुत परम्परा से भावी पीढ़ी को अवगत कराएं उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म का महत्त्व समझाएं 


दीर्घकाल से ये सदाचार वेलाएं निरन्तर चल रही हैं, जिनका प्रारम्भ विद्यालय से हुआ था। इनके शिक्षाप्रद विचारों को सुनकर हम उत्तम संस्कार एवं सद्विचार ग्रहण कर रहे हैं, जिससे हमारे व्यक्तित्व का समुचित विकास हो रहा है । साथ ही आचार्य जी यह भी प्रयास कर रहे हैं कि हम इस प्रकार से प्रेरित हों कि हमारा जीवन समाजोन्मुख तथा राष्ट्रोन्मुख बनकर समाज और राष्ट्र की उन्नति में सार्थक योगदान दे सके। हमारे लिए समय के सदुपयोग का यह एक श्रेष्ठ माध्यम  बन गया है l


इस सृष्टि में एक अद्भुत और रहस्यमयी व्यवस्था निरन्तर संचालित हो रही है, जिसे मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से पूर्णतः समझ नहीं पाता। संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसके पीछे ईश्वर की अदृश्य शक्ति कार्य कर रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा है

“उमा दारु जोषित की नाईं।

सबहि नचावत रामु गोसाईं॥”

अर्थात् जैसे कोई कठपुतली संचालक लकड़ी की कठपुतलियों को अपनी इच्छा से नचाता है, उसी प्रकार भगवान् समस्त प्राणियों और इस जगत् का संचालन कर रहे हैं। मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, किन्तु वास्तविक नियन्ता परमात्मा ही है। यह भारतीय संस्कृति और भारतीय मनीषा की अद्भुत चिन्तन दृष्टि है l हम भी उसी परमात्मा के अंश हैं। ईश्वर की चेतना प्रत्येक जीव में विद्यमान है, इसलिए मनुष्य केवल शरीर नहीं, अपितु दिव्य चेतना का धारक है। जब मनुष्य अपने भीतर स्थित उस ईश्वरीय तत्त्व को पहचानता है, तब उसका जीवन सत्य, करुणा, सदाचार और आत्मबोध की दिशा में अग्रसर होता है।

न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:पिता नैव मे नैव माता न जन्म: न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥

यह है सनातन चिन्तन हिन्दू चिन्तन किन्तु जब इस चिन्तन से शक्ति पराक्रम पौरुष वेग इन्द्रिय सामर्थ्य विलग होने लगता है तब यह एकांगी हो जाता है और हमारे देश के साथ ऐसा कई अवसरों पर हुआ l 

राजा जनक जैसे ज्ञानी , राजा दशरथ और बालि जैसे पराक्रमी राजा उस समय विद्यमान थे, फिर भी रावण का आतंक बढ़ता गया l भगवान् श्रीराम का प्राकट्य इसी कारण विशेष माना गया कि उन्होंने अध्यात्म, मर्यादा, करुणा और शौर्य—इन सभी का समन्वय कर धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की l ऐसी अद्भुत परम्परा है हमारे देश की l इसी पर आधारित शिक्षा की आवश्यकता है l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भर्तृहरि की चर्चा क्यों की अभिनेता से नेता बने विजय का उल्लेख क्यों हुआ किष्किन्धा कांड में आज आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

6.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४१ वां* सार -संक्षेप

 बहुत दिनों के बाद अँधेरा छँटा सूर्य की किरण दिखी है, 

बहुत दिनों के बाद भक्ति ने शक्ति लिखी है, 

बहुत दिनों बाद शान्ति को क्रान्ति सुहायी, 

बहुत दिनों के बाद पड़ा " श्रीराम " सुनायी---------॥

जगो सुप्त सौभाग्य बंगभू के पुरषारथ 

जगो जवानी पूर्व तपस्या हो न अकारथ ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२३


“मानस प्रच्छालन” अर्थात् मानसिक शुद्धि के लिए डायरी लेखन एक सरल, प्रभावी और आवश्यक उपाय है, जो हमें आंतरिक शांति और आत्मिक संतुलन प्रदान करेगा ही l अतः डायरी लेखन अवश्य करें l



गोस्वामी तुलसीदास जी ने उस काल में  श्री रामचरितमानस की रचना की, जब दुष्ट अकबर का शासन था। उस समय सनातनधर्मी समाज अनेक प्रकार की कठिनाइयों से गुजर रहा था। धार्मिक आस्थाओं में शिथिलता आ रही थी, परम्पराएँ कमजोर पड़ रही थीं और लोगों के मन में भय तथा भ्रम का वातावरण व्याप्त था। समाज में एकता का अभाव भी स्पष्ट दिखाई देता था।

ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी ने रामकथा के माध्यम से लोगों के भीतर धर्म, मर्यादा और आस्था का पुनर्जागरण करने का प्रयास किया। उन्होंने सरल और लोकभाषा में रचना करके जनसाधारण तक आदर्श जीवन मूल्यों का संदेश पहुँचाया। इस प्रकार रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि उस समय के समाज को दिशा देने वाला एक महत्त्वपूर्ण साधन बन गया l


तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥

जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥


करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥


वर्तमान में भी परिस्थितियां अत्यन्त विषम हैं  अनेक राक्षस अपने स्वार्थ के लिए सत्य, धर्म और मर्यादा का त्याग कर समाज में भय, अशांति, विभाजन फैलाने का काम कर रहे हैं वे विभिन्न रूप धारण कर लोगों के बीच अविश्वास, ईर्ष्या और शत्रुता को बढ़ा रहे हैं हमें ऐसे लोगों से सचेत रहने की आवश्यकता है 

हम रामत्व की अनुभूति करें हम भावों को सरल बनाएं, विचारों को प्रखर करें और कर्म के प्रति ऐसी निष्ठा रखें कि सामान्य अवरोध भी हमें विचलित न कर सकें।

व्यक्तिगत लाभ लोभ को समाजोन्मुख करें l


भैया प्रमेन्द्र श्रीवास्तव जी द्वारा प्रेषित किस video clip की आचार्य जी ने चर्चा की, बैलगाड़ी के आगे शुनी के चलने का क्या प्रसंग है, मलमूत्र की धारा से क्या तात्पर्य है, कल आचार्य जी कहां रहे,पर्यङ्क क्या है, किष्किन्धा कांड में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

5.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४० वां* सार -संक्षेप

 "विजय"  विश्वास संयम शौर्य विक्रम की कहानी है, 

मनुज के आत्मबल पुरुषार्थ की मंगल कहानी है, 

उठो जागो जगाओ भीत व्याकुल भ्रमित  मानस को, 

"विजय" पुरुषार्थमय अध्यात्म की अद्भुत निशानी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२२


सच्ची विजय केवल बाहरी सफलता नहीं, बल्कि विश्वास, संयम, शौर्य और पुरुषार्थ से प्राप्त होने वाली आन्तरिक शक्ति है। हम इससे प्रेरणा लेकर अपने आत्मबल को पहचानकर भय और भ्रम से ग्रस्त राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को जाग्रत करें



आजकल हम लोग श्री रामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में प्रविष्ट हैं 

भगवान् राम जी और लक्ष्मण जी की भेंट हनुमान जी से होती है, जो उन्हें सुग्रीव के पास ले जाते हैं। सुग्रीव अपने भाई बालि से पीड़ित होता है, इसलिए भगवान् राम उसकी सहायता करने का वचन देते हैं।

वे बालि का वध करके सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य दिलाते हैं।

अब आगे 


इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥

निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥1॥


यहाँ  सचिव पवनपुत्र हनुमान जी अपने हृदय में विचार करते हैं कि राजा सुग्रीव  भगवान् राम जी का कार्य ( मां सीता की खोज) भूल गए हैं 

तब हनुमान जी सुग्रीव के पास जाते हैं, उनके चरणों में सिर झुकाते हैं और उन्हें चार प्रकार की नीति (साम, दाम, दण्ड, भेद) से समझाते हैं।

इस प्रसंग में हनुमान जी की बुद्धिमत्ता, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा प्रकट होती है। वे जानते हैं कि सुग्रीव राज्य और सुख-सुविधाओं में लीन होकर अपने वचन को भूल गए हैं, इसलिए वे सीधे कठोरता नहीं दिखाते, बल्कि नीति के चारों उपायों का सहारा लेकर उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं।

सुग्रीव को अपनी भूल का बोध होता है। वे तुरंत सक्रिय होकर रामकाज  के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं।


इसके अतिरिक्त भैया पुनीत श्रीवास्तव जी आचार्य जी से कहां भेंट कर रहे हैं,

हाल में  भारत के पाँच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों—पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी—में जो विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए इनके परिणामों के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा,दीनदयाल जी किस प्रकार के चुनाव चाहते थे जानने के लिए सुनें l

4.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३९ वां* सार -संक्षेप

 कहाँ कब कौन क्या कुछ कर रहा इसकी न हो चिन्ता, 

यहाँ अब क्या मुझे करना यही अपना सुचिंतन हो ,

जगत जंजाल झंझट या समस्या है न  उलझें हम

कि, अपने आत्मदर्शन के लिए दिनरात मंथन हो। 

शरीरी शक्ति मन की भक्ति बौद्धिक ज्ञान  का साधन, 

इसी के हित सतत चिंतन मनन युत कर्म अनुवर्तन ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२१


हम आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान शक्ति भक्ति विचार वैराग्य और संसार में संघर्ष करने की क्षमता प्रदान करें उनका मार्ग प्रशस्त करें

 ( वाचक ! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो,

फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।

दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो,

होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।। )


शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, अपितु संस्कारों का प्रसार करने वाली एक अद्भुत शक्ति है। उसका व्यक्तित्व, उसके विचार और उसके भीतर निहित विश्वास मिलकर एक ऐसी ज्योति का निर्माण करते हैं, जो स्वयं जलकर भी दूसरों के जीवन को आलोकित करती रहती है। शिक्षक अपने आचरण, वाणी और व्यवहार के माध्यम से शिष्य के अंतःकरण में सत्य, सदाचार, अनुशासन और कर्तव्यबोध के बीज रोपित करता है। यह प्रक्रिया केवल सूचना या पाठ्य सामग्री के संप्रेषण तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह जीवन-दृष्टि का निर्माण करती है।

भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली में शिक्षक का स्थान अत्यंत उच्च और पूजनीय माना गया है। गुरुकुल परम्परा में गुरु केवल विषय-विशेषज्ञ नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक होते थे। वे शिष्य को ज्ञान के साथ-साथ संयम, सेवा, विनम्रता, आत्मनियंत्रण और लोकमंगल की भावना का अभ्यास कराते थे। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास और आत्मबोध था। वर्तमान समय की शिक्षा विकृत है आज की शिक्षा का एक बड़ा भाग मनुष्य को यंत्रवत् बना देने की प्रवृत्ति से प्रभावित दिखाई देता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि शिक्षा का केन्द्र धीरे-धीरे ज्ञान और संस्कार से हटकर केवल रोजगार, प्रतिस्पर्धा और परिणामों पर आ गया है। विद्यार्थी को एक जीवंत, संवेदनशील और सृजनशील व्यक्तित्व के रूप में विकसित करने के स्थान पर उसे सूचना एकत्र करने और निर्धारित ढाँचे में कार्य करने वाली इकाई के रूप में तैयार किया जा रहा है।इसमें हमारी परम्परा का कोई ध्यान नहीं रखा गया इस शिक्षा में सुधार की नितान्त आवश्यकता है 

प्राचीन भारतीय शिक्षा की विलक्षणता इसी में निहित थी कि उसमें ज्ञान और संस्कार का अद्भुत समन्वय था। गुरु अपने शिष्यों को केवल शास्त्रों का बोध नहीं कराते थे, बल्कि उन्हें जीवन के आदर्शों से भी परिचित कराते थे। शिक्षा प्रकृति के सान्निध्य में, सरल और अनुशासित वातावरण में दी जाती थी, जहाँ जीवन के प्रत्येक कर्म में नैतिकता और आध्यात्मिकता का समावेश रहता था।


वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, रामायण, गीता आदि भारतीय ज्ञानपरम्परा के प्रमुख आधारस्तम्भ हैं। इन ग्रन्थों में केवल धार्मिक या दार्शनिक विचार ही नहीं, बल्कि जीवन के समग्र विकास का मार्ग निहित है।


बिरसा मुंडा, मास्टर सूर्यसेन,महर्षि रमण की चर्चा क्यों हुई, धारा के साथ कौन बहता है, गोदावरी के उद्गम का उल्लेख क्यों हुआ,किष्किन्धा कांड के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा,चिन्ता और चिन्तन में क्या अन्तर है जानने के लिए सुनें l

3.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३८ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२०

शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की महत्ता को जानें 


हम प्रविष्ट हैं किष्किन्धा कांड में 


अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।

जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।

राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।



अंगद कहते हैं कि वे समुद्र पार तो जा सकते हैं, पर उनके मन में यह संदेह है कि वे लौट पाएँगे या नहीं। इस पर जामवंत उत्तर देते हैं कि तुम सब ही योग्य हो, लेकिन सबके नेता को भेजना उचित नहीं है, इसलिए सोच-समझकर ही किसी को भेजना चाहिए।


जामवंत  हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराते हैं कि वे पवन के समान बलवान, बुद्धि और विवेक के भंडार हैं और उनके लिए कोई कार्य कठिन नहीं। यह सुनकर सेवाधर्म के आधार और बल के पुंज हनुमान जी को अपनी शक्ति का बोध होता है और वे विशाल रूप धारण कर रामकाज के लिए तैयार हो जाते हैं।

 कभी-कभी व्यक्ति अपनी शक्ति भूल जाता है, और उचित प्रेरणा मिलने पर वह असंभव कार्य भी कर सकता है।

यही प्रेरणा आचार्य जी इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से सदाचारमय विचार प्रस्तुत कर हम लोगों को दे रहे हैं ताकि हम भी अपनी अन्तर्निहित शक्तियों की अनुभूति कर  राष्ट्र,जो एक चैतन्य महाशक्ति है, के उत्थान में अपना सहयोग दें अन्याय, हिंसा अथवा देशविरोधी गतिविधियों का विरोध करें किन्तु विधि और संविधान की मर्यादा में रहकर l हम न तो भोग-विलास में अत्यधिक आसक्त होकर अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं को भूल जाएं , और न ही जीवन से विरक्त होकर निष्क्रिय या उदासीन बन जाएं ।

इसके साथ ही आचार्य जी ने प्रेम में विश्वास के महत्त्व को रेखांकित किया 

जगत में प्रेम का आधार बस विश्वास होता है, 

समर्पण युक्त सत्सहयोग उसका श्वास होता है, 

कि यों तो "प्रेम" बहुरंगी नुमाइश सा हुआ फिरता, 

मगर सच, प्रेम में परमात्मा का वास होता है ॥


इसका सार यह है कि प्रेम का आधार विश्वास है विश्वास में शक्ति बुद्धि वैभव नहीं दिखाई देता उसमें समर्पण होता है



नेपाल के राणा जंगबहादुर की चर्चा क्यों हुई अम्बानी की चर्चा क्यों हुई  हमारे स्वभाव का परिचय कैसे कैसे मिलता है संतत्व अधिक व्याप्त होने से क्या हुआ जानने के लिए सुनें

2.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३७ वां* सार -संक्षेप

 बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।

बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसें॥2॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१९

द्रष्टा स्रष्टा चिन्तक कवि तुलसीदास जी कृत श्रीरामचरित मानस का हम अध्ययन करें इसे गुनें और अपने जीवन के सूत्र खोजें 


यह सदाचार वेला ऐसा समय है जब हम अपने आचरण, विचार और भावों को शुद्ध बनाने का प्रयास करते हैं इस भाव-जगत में प्रवेश करने पर हम अपने भीतर श्रेष्ठ विचारों, नैतिकता और आध्यात्मिकता को स्थान देते हैं 

जब हम दिन का प्रारम्भ अच्छे विचारों, सद्गुणों और शुद्ध भावनाओं के साथ करेंगे तो हमारा पूरा दिन और जीवन अधिक सार्थक, संतुलित और आनंदमय बन जाएगा l तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में

हम पुनः प्रविष्ट हो जाते हैं किष्किन्धा कांड में 

सुग्रीव का राजतिलक हो चुका है अंगद युवराज बन चुका है 

फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।। कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।


स्वच्छ, सुंदर स्फटिक शिला अत्यंत मनोहर है। उस पर दोनों भाई भगवान् राम और लक्ष्मण आनंदपूर्वक बैठे हैं। भगवान् राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से अनेक प्रकार की कथाएँ कह रहे हैं, जिनमें भक्ति (ईश्वर प्रेम), विरक्ति (वैराग्य), राजनीति (राजधर्म) और विवेक (सही-गलत का ज्ञान) की बातें सम्मिलित हैं।

भक्ति का निरूपण शाण्डिल्य भक्ति सूत्र में, वैराग्य का प्रतिपादन सांख्य दर्शन में, नीति का विवेचन धर्मशास्त्र में तथा ज्ञान का प्रतिपादन वेदान्त दर्शन में किया गया है।


जीवन की पूर्णता के लिए भक्ति, वैराग्य, नीति और ज्ञान—इन चारों का संतुलित समन्वय आवश्यक है।



लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि।

गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥13॥

भगवान् राम  कहने लगे हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं


इसके अतिरिक्त अनुरागवान् गृहस्थ क्या करता है 

भैया आशीष जोग जी द्वारा आचार्य जी को प्रेषित पिङ्गल कृत छन्दः सूत्रम् की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

1.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३६ वां* सार -संक्षेप

 आत्मदर्शन के लिए कुछ क्षण सहज एकांत हो, 

विषवल्लरी से मुक्त स्वच्छाराम मन अश्रांत हो, 

शिवशक्ति तन में हो मगर निज वृत्ति शुचि अभ्रान्त हो, 

इस दीनदुनिया से अनासक्तित्व नित्य नितांत हो ॥


(आराम = बगीचा)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१८


 हमारे लिए गृहस्थ जीवन में कर्तव्य निभाना, संबंधों को निभाना, आर्थिक प्रयास करना ये सब आवश्यक हैं  किन्तु इनके बीच अपने आत्मिक स्वरूप को न भूलना ही साधना है। जब कर्म करते हुए भी मन ईश्वर-चिन्तन में स्थिर रहता है, तब जीवन बोझ नहीं, बल्कि एक सुन्दर साधना बन जाता है।




यह हमारा परम सौभाग्य है कि गृहस्थ आश्रम में स्थित रहते हुए भी भगवत्ता के अखण्ड चिन्तन में रत आचार्य जी हमारा नित्य मार्गदर्शन कर रहे हैं। हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l

हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने की मानव जीवन के सुख-दुःख, करुणा, प्रेम, धर्म और मर्यादा की गहन अनुभूति करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘ श्री रामचरितमानस’ जैसे अद्भुत और लोकमंगलकारी ग्रन्थ की रचना कर दी जिसके किष्किन्धा कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं 


राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब व्याकुल धावा॥ नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥1॥

भगवान् राम ने बालि को उसके वास्तविक धाम (परम लोक) भेज दिया अर्थात् उसका वध कर उसे मोक्ष प्रदान किया। जैसे ही यह समाचार नगर में फैला, सभी लोग अत्यंत व्याकुल होकर घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े। बालि की पत्नी तारा शोक से अत्यंत व्यथित हो उठी। वह विभिन्न प्रकार से विलाप करने लगी। दुःख की तीव्रता इतनी अधिक थी कि वह अपने शरीर का भी ध्यान नहीं रख पा रही थी, उसके केश बिखर गए थे और वह स्वयं को संभालने में असमर्थ हो गई थी।


भगवान् तारा को आत्मज्ञान देकर शोक से उबारते हैं और उसे जीवन की नश्वरता का बोध कराते हैं


वे तारा से कहते हैं कि जो शरीर सामने पड़ा है, वही उसकी नश्वर देह है; जीव (आत्मा) तो नित्य और अमर है, फिर शोक किसके लिए? यह सुनकर तारा को ज्ञान हो गया, वह भगवान् के चरणों में गिर पड़ी और उनसे परम भक्ति का वरदान माँग लिया।


इसके आगे की कथा में आचार्य जी ने क्या बताया,भगवानीयत क्या है,सूरदास जी के गुरु कौन थे,तारा और मन्दोदरी की गिनती पंचकन्याओं में क्यों होती है जानने के लिए सुनें