प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 22 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५१
सद्ग्रंथों के अध्ययन और स्वाध्याय में रत हों
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारे भीतर शक्ति, बुद्धि, संयम, चिंतन, मनन जैसे उत्कृष्ट गुण असीमित रूप में विद्यमान हैं। आवश्यकता केवल इस तथ्य की है कि हमारे उत्साह और जागरूकता में निरंतरता बनी रहे,जिससे हम अपने इन आंतरिक सामर्थ्यों को पहचान सकें और उन्हें व्यवहार में उतार सकें। इसी उद्देश्य से आचार्य जी इन सदाचार वेलाओं में विविध विषयों प्रकरणों को प्रस्तुत कर नित्य प्रयत्नशील रहते हैं ताकि हम अपने गुणों का साक्षात्कार कर सक्रिय एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जिएं l जो लोग हमारी आस्था पर आघात करते आये हैं, वे यह भली-भाँति समझ लें कि हम दुर्बल नहीं हैं। हमारी श्रद्धा हमारी शक्ति है और हमारा आत्मसम्मान अटल है।हमारी सजगता, एकता पर्याप्त हैं यह सिद्ध करने के लिए कि हमें चुनौती देना सरल नहीं। हम अन्याय के सामने झुकने वाले नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले हैं। हमारे भीतर चैतन्य विद्यमान है l हम अपने राष्ट्र को परम वैभव पर
पहुंचाने के लिए कर्मयोगी बनें हमें यह प्रयास करना है l
मनुष्य का परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष का आशय यह नहीं कि वह अपने शरीर का विनाश कर दे; ऐसा करना अधर्म और अपराध है। शरीर हमारे लिए साधन है, जिसके माध्यम से आत्मा अपना कार्य करती है। आत्मा इसी देह में स्थित होकर अनुभव और साधना का मार्ग प्रशस्त करती है। अतः यह शरीर मंदिर के समान पवित्र है, क्योंकि इसमें आत्मा का निवास है।मोक्ष निश्चिन्तता है l
आचार्य जी ने स्वाध्याय को किस प्रकार स्पष्ट किया,AI का कौन सा उदाहरण दिया, कठोपनिषद् का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने नचिकेता द्वारा मांगे गये किन तीन वरदानों का उल्लेख किया, भैया सौरभ द्विवेदी जी चमारी गांव में क्या करने जा रहे हैं, भैया मनीष कृष्णा जी, भैया सिद्धार्थ सिंह जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें