इसीलिए शायद राधा की भक्ति याद हो आयी
तपी जनम भर किन्तु न अपनी किञ्चित व्यथा सुनाई
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 23 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६७० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५२
राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए कर्मरत रहें,तप, त्याग और पीड़ा सहते हुए अपनी व्यथा प्रकट न करें और साधना का सर्वोच्च आदर्श स्थापित करें
जो मनुष्य अपने भीतर निहित मनुष्यत्व का साक्षात्कार कर लेते हैं, वही वास्तव में परमात्मा के तत्त्व को समझने और समझाने में समर्थ होते हैं। वे शास्त्रों के वचनों का केवल पाठ ही नहीं करते, अपितु उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ भी करते हैं। ऐसे महापुरुष जीवात्मा के लिए आदर्श स्वरूप होते हैं। यही ऋषि कहलाते हैं अर्थात् द्रष्टा, तत्त्व के साक्षी और समाज को दिशा और दृष्टि देने वाले मार्गदर्शक।
आचार्य जी नित्य प्रयासरत हैं कि हम परमात्मा के अंशांश युगभारती के सदस्य इसी ऋषित्व को प्राप्त करने की चेष्टा करें
ऐसा जीवन जीने का प्रयत्न करें जिसमें सत्य की अनुभूति हो, आचरण में पवित्रता हो और दूसरों के लिए मार्ग प्रशस्त करने की विलक्षण क्षमता हो इसके लिए हमें जो भी कार्य करना हो, उसे पूर्ण मनोयोग और समर्पित भाव से करना चाहिए। कर्म करते समय फल की आकांक्षा न रखकर, विषम परिस्थितियों में धैर्य न खोते हुए केवल अपने कर्तव्य की ओर दृष्टि रखना ही श्रेष्ठ मार्ग है यह समझना चाहिए
जैसा कि हम जानते हैं, भैया राजेश खरे जी (बैच १९८५ ) अब हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं किंतु अपने श्रेष्ठ कर्मों के कारण वे हमारे हृदयों में सदैव जीवित रहेंगे । उन्होंने जीवन के वास्तविक मर्म को समझा और उसे अपने आचरण में उतारा।
ऐसे व्यक्तित्व शरीर से भले ही दूर हो जाएं , परंतु अपने आदर्शों और कार्यों के माध्यम से सदैव प्रेरणा देते रहेंगे l
इसके अतिरिक्त स्वामी विवेकानन्द ने Religion को क्या माना जब समय विपरीत हो तो क्या करना चाहिए जानने के लिए सुनें