प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 24 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६७१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५३
शरीर की उपेक्षा नहीं, अपितु उसकी शुद्धता, स्वास्थ्य और संयमपूर्वक देखभाल आवश्यक है, क्योंकि इसी के द्वारा आत्मोन्नति और परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।
" प्रचण्ड तेजोमय शारीरिक बल, प्रबल आत्मविश्वास युक्त बौद्धिक क्षमता एवं निस्सीम भाव सम्पन्ना मनः शक्ति का अर्जन कर अपने जीवन को निःस्पृह भाव से भारत माता के चरणों में अर्पित करना ही हमारा परम साध्य है l "
इसका सार है -असीम शक्ति प्राप्त कर अपने भारत देश की सेवा में जीवन को समर्पित करना l
असीम शक्ति की साधना के लिए शरीर का संतुलित संरक्षण आवश्यक है। न उससे अत्यधिक अपेक्षा रखें, न उसकी उपेक्षा करें। त्यागपूर्ण उपभोग करें, समय पर जागें और विश्राम करें। अध्ययन, स्वाध्याय, चिन्तन-मनन, लेखन तथा व्यायाम को नित्य जीवन का अंग बनाएं l
जब मनुष्य बाह्य आडम्बर, दिखावे और प्रतिष्ठा में ही उलझा रहता है और अपने शरीर-मन के संस्कार, जीवन-मूल्यों की परीक्षा तथा उद्देश्य की पहचान के लिए समय नहीं देता, तब आत्मचिन्तन के समय उसके हाथ केवल पश्चात्ताप ही लगता है
अतः हम बाह्य सज्जा से अधिक अंतःसज्जा पर ध्यान दें क्योंकि वही जीवन को सार्थक बनाती है और पश्चात्ताप से बचाती है।हमें व्याकुलता से मुक्त रखती है l
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
कर्तव्यनिष्ठ, निष्काम और धर्मानुकूल कर्म करते हुए दीर्घायु की कामना करना ही मानव जीवन का उचित मार्ग है ऐसे कर्म मनुष्य को बांधते नहीं, बल्कि उसे शुद्ध और उन्नत करते हैं
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अश्वप्लुतं वासवगर्जितं च
स्त्रीणां च चित्तं पुरुषस्य भाग्यम् ।
अवर्षणं चाप्यतिवर्षणं च
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ।। का उल्लेख किस संदर्भ में किया भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ अपने प्रधानमन्त्री मोदी जी में क्या विशेषता है जानने के लिए सुनें