प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 25 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६७२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५४
सद्ग्रंथों का अध्ययन अवश्य करें और नयी पीढ़ी को भी प्रेरित करें
यदि हम कुछ क्षण के लिए आत्मस्थ होने का प्रयत्न करें, तो हमें यह अनुभूति होगी कि हम सनातन धर्म में विश्वास करने वाले भारतीयों में जीवन की वास्तविक दिशा बाह्य चकाचौंध में नहीं, अपितु अपनी सांस्कृतिक जड़ों में निहित है। आत्मचिन्तन की अवस्था में यह स्पष्ट होगा कि हमारे सद्ग्रन्थों जैसे वेद, उपनिषद्, पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण तथा श्रीरामचरितमानस के अध्ययन और मनन से हमारे भीतर जीवन-मूल्यों के प्रति श्रद्धा और स्थिरता अवश्य उत्पन्न होगी
इन ग्रन्थों में केवल आध्यात्मिक उपदेश ही नहीं, अपितु आचरण, कर्तव्य, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का सम्यक् मार्गदर्शन भी निहित है। यदि हम स्वयं इनका अवगाहन करें और नयी पीढ़ी को भी इनके अध्ययन हेतु प्रेरित करें, तो उनमें संस्कार, संवेदनशीलता और नैतिक दृढ़ता का विकास होगा।
वर्तमान समय में आधुनिकता की अन्धी दौड़ तथा पाश्चात्य जीवन-शैली के अन्धानुकरण ने हमें अनेक स्तरों पर भ्रमित कर दिया है।
देखा जाए तो पश्चिम की चतुर बिलार हर घर को ही मूस गयी है l इसके परिणामस्वरूप पारिवारिक संबंधों में शैथिल्य ,स्वार्थवृत्ति की वृद्धि और मानवीय संवेदनाओं का क्षय दृष्टिगोचर हो रहा है।
आज समाज में ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं जैसे पुत्र द्वारा पिता की हत्या, भाई द्वारा भाई का वध अथवा अन्य निकट संबंधों में हिंसा जो अत्यन्त पीड़ादायक और चिंताजनक हैं l यदि हम अपनी परम्परा अपनी भाषा अपने शाश्वत ज्ञान-स्रोतों की ओर पुनः उन्मुख होंगे , तो संबंधों में मधुरता, जीवन में संतुलन तथा समाज में सामंजस्य पुनर्स्थापित हो सकेगा इसमें अतिशयोक्ति नहीं l
हम सौभाग्यशाली हैं कि आचार्य जी
सखा धर्ममय अस रथ जाकें।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥6॥
नित्य हमें प्रेरित कर रहे हैं हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l
भक्ति अत्यन्त आवश्यक है
यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः।
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा
मनोरथेनासति धावतो बहिः॥
भावार्थ (संक्षेप में)
जिस मनुष्य की भगवान् में अविचल भक्ति होती है, उसमें देवताओं के समान सभी श्रेष्ठ गुण स्वतः ही आ जाते हैं।
परन्तु जो भगवान् का भक्त नहीं है, उसमें महान् गुण कहाँ से होंगे? वह तो अपने मन के कल्पित विषयों के पीछे असत्य में बाहर ही बाहर भटकता रहता है वह माया से आकर्षित रहता है l
इसके अतिरिक्त श्री रामेश्वर द्विवेदी जी का उल्लेख क्यों हुआ, गुलाब के पुष्प के प्रति आकर्षण होना चाहिए या संपूर्ण गुलाब के वृक्ष के प्रति,युगभारती का जीवनदर्शन क्या है जानने के लिए सुनें