प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 26 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६७३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५५
और अधिक गम्भीरता धारण कर अपने समाजोन्मुख राष्ट्रोन्मुख उद्देश्यों का सदैव ध्यान रखें l
हमें अपने जीवन में और अधिक गम्भीरता तथा आत्मचिन्तन की आवश्यकता है । सांसारिक प्रपंच तो प्रत्येक मनुष्य को घेरे रहते हैं, परंतु उन्हीं में उलझकर अपना अमूल्य समय नष्ट करना न तो बुद्धिमत्ता है और न ही कर्तव्यपरायणता। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सुख-साधन नहीं, अपितु श्रेष्ठ आदर्शों की प्राप्ति भी है।
हमारा ध्येय राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित करना है । राष्ट्र के प्रति अटूट श्रद्धा, गहन अनुराग और निष्कपट समर्पण अनिवार्य हैं। देशहित की भावना हमारे विचारों, व्यवहार और संकल्पों में प्रतिफलित होनी चाहिए। देशहित की पवित्र भावनाओं को जाग्रत करने में हमारे दीनदयाल विद्यालय की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हमारे संस्थान की नींव ऐसे महापुरुष ने रखी थी, जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रसमर्पण का अद्वितीय उदाहरण था अर्थात् श्री माधव सदाशिव गोलवलकर जी (गुरुजी)। उन्होंने ही हनुमान जी महाराज की प्राण प्रतिष्ठा भी की थी l
हमें देश के लिए जीने, देश के लिए तपने और आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए सर्वस्व अर्पित करने का संकल्प धारण करना चाहिए।
हम निराशा और हताशा को अपने निकट न आने दें। व्यर्थ की चर्चाओं और निरुद्देश्य गतिविधियों में समय व्यतीत करने के स्थान पर आत्ममंथन करें कि हमारे विचार, हमारी वाणी और हमारे कर्म राष्ट्रहित के कितने अनुकूल हैं। प्रत्येक दिन स्वयं से यह प्रश्न करें कि मैं अपने माध्यम से राष्ट्रभक्ति को कितना साकार कर पा रहा हूँ।
यदि यह भाव निरंतर जाग्रत रहे कि मेरा जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पित है, तो हमारे कार्यों में स्वतः अनुशासन, दृढ़ता और सात्त्विक उत्साह का संचार होगा।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अष्टावक्र गीता का उल्लेख किया l
अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदान्त का अत्यन्त संक्षिप्त परन्तु परम गूढ़ ग्रंथ है। इसमें ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को आत्मज्ञान का उपदेश देते हैं कि “तुम न शरीर हो, न मन; तुम शुद्ध, असंग, साक्षी चैतन्य आत्मा हो।”
इसके पारिवारिक प्रसंग में महर्षि उद्दालक का महत्वपूर्ण स्थान है। उद्दालक की विदुषी पुत्री सुजाता का विवाह उनके शिष्य कहोड से हुआ। कहोड वेदों के अध्येता थे। कहा जाता है कि जब कहोड वेदपाठ में अशुद्धि कर रहे थे, तब गर्भस्थ अष्टावक्र ने उसे सुधारा। इससे क्रुद्ध होकर कहोड ने गर्भ में ही बालक को शाप दिया, जिसके कारण वह आठ स्थानों से वक्र उत्पन्न हुआ— इसीलिए उसका नाम ‘अष्टावक्र’ पड़ा।
बाद में कहोड एक शास्त्रार्थ में पराजित होकर संकट में पड़ गए। तब अष्टावक्र ने राजा जनक की सभा में शास्त्रार्थ कर अपने पिता को मुक्त कराया। उसी प्रसंग में उन्होंने जनक को आत्मतत्त्व का उपदेश दिया, जो आगे चलकर अष्टावक्र गीता के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
आचार्य जी ने किन दो काव्य रचनाओं का उल्लेख किया जो पूज्य गुरुजी पर उन्होंने रचीं, केजरीवाल का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें