27.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 27 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 27 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५६

मैं आपके साथ हूं यह केवल वाणी से ही न निकले यह विचार और व्यवहार से भी निकले 


जब तक मनुष्य अज्ञान-निद्रा में पड़ा रहता है, तब तक संसारजन्य दुःख, मोह, भय और असंतोष उसे सताते रहते हैं। वह दुःख का कारण बाहर खोजता है, जबकि उसका मूल कारण भीतर का अज्ञान है।अज्ञान के कारण असार वस्तुएं भी सारवान् लगती हैं। परन्तु जैसे ही भगवान् की कृपा का प्रकाश होता है, वैसे ही विवेक जाग्रत होता है और मिथ्यात्व का भान हो जाता है।

मनुष्य स्वभावतः आनन्द का अन्वेषी है उसका वास्तविक स्वरूप शान्ति और आनन्द से युक्त है परन्तु जब वह बाह्य वस्तुओं, प्रतिष्ठा, स्पर्धा और भौतिक आकर्षणों में अत्यधिक रत हो जाता है, तब उसका चित्त चञ्चल और आसक्त हो जाता है। यही आसक्ति उसे आन्तरिक आनन्द से दूर कर देती है। अतः जब तक मन परिवर्तनशील निरर्थक संसार के बन्धनों से ऊपर उठकर आत्मचिन्तन और विवेक की ओर प्रवृत्त नहीं होता, तब तक सच्चा आनन्द सहज उपलब्ध नहीं होता।किन्तु हम चिन्तन तक ही सीमित न रहें l 

यद्यपि चिंतन मानव जीवन का अमृत है 

पर वह यदि सीमाओं में ही अवरुद्ध रहा 

तो समझो उसका हाल वही हो जाता है

जैसे जल छोटी सीमा बीच निरुद्ध बहा।

जल का स्वभाव सीमित रहना नहीं है हम कर्मरत भी हों क्योंकि हमने उस विद्यालय में अध्ययन किया जो पं दीनदयाल उपाध्याय जी नामक तपस्वी के नाम पर है दीनदयाल उपाध्याय जी का कर्ममय, राष्ट्रनिष्ठ और तपस्वी स्वरूप हमारे समक्ष प्रेरणा बनकर उपस्थित हो जाता है। वे राष्ट्र को वैभवसम्पन्न, स्वावलम्बी और नैतिक आदर्शों से युक्त बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्रसेवा को समर्पित था।

यद्यपि उनका जीवन अकाल में ही समाप्त हो गया, तथापि उनके द्वारा प्रतिपादित आदर्श और अधूरे कार्य हमारे लिए दायित्व का आह्वान करते हैं। इसके लिए हमारे लिए तात्त्विक शक्ति को सुरक्षित करना नितान्त आवश्यक है

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् 

 और साथ ही हम संगठित रहें प्रेम आत्मीयता का विस्तार  करें  परिवारभाव को फैलाएं क्योंकि परिवार का विस्तार ही भारत का सारतत्त्व है 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने २६ फरवरी १९७८ का उल्लेख क्यों किया, चिन्तन का विस्तार क्या है,भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें