प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६८० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६२
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
आत्मा की सार्वभौमिक एकता का अनुभव ही सच्चा ज्ञान है उसी से समता, करुणा और शान्ति की प्राप्ति होती है।
भारत की संस्कृति अत्यन्त प्राचीन, बहुविस्तृत तथा आश्चर्यजनक रूप से गहन है। इसे जितना अधिक हम जान लेते हैं उतना ही इसके अद्भुत स्वरूप और अन्तर्निहित आकर्षण का अनुभव होता है। यह केवल आचार-व्यवहार की परम्परा नहीं, अपितु जीवन को समग्रता में देखने की दृष्टि है।
ऋषियों की तपःसाधना, उपनिषदों का आत्मदर्शन, गीता का कर्मयोग, भक्ति का प्रेम-मार्ग तथा लोकजीवन की सहज आस्थाएं -इन सबके समन्वय से भारतीय संस्कृति का स्वरूप निर्मित हुआ है। उपनिषद् आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत सम्बन्ध की बात करते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता कर्तव्यपालन और समत्व का उपदेश देती है। इस प्रकार यहां अध्यात्म और व्यवहार, दोनों का संतुलन विद्यमान है।
अनेक चिन्तक, विचारक, मनीषी और विद्वान् इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सृष्टि के मूल में एक परम चेतना या परमात्मा का अस्तित्व है। वही सृष्टिकर्ता, पालक और संहारकर्ता है,वही समस्त जीवन का आधार है। मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है अर्थात् बुद्धि, शक्ति, अवसर और अनुग्रह उसका मूल स्रोत वही परम सत्ता है। यह भाव श्रद्धा, विनय और उत्तरदायित्व की भावना को जन्म देता है।
निस्सन्देह, समाज में कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। मतभेद और मतान्तर सदा से रहे हैं। वर्तमान समय में मतान्तरण, वैचारिक संघर्ष, सामाजिक तनाव तथा युद्धों के कारण वातावरण में अशान्ति और उथल-पुथल दिखाई दे रही है। मानो एक भयंकर वात्याचक्र चल रहा हो, जो व्यक्ति के विश्वास, धैर्य और नैतिकता की परीक्षा ले रहा है।
ऐसे संक्रमणकाल में अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहना, आत्मविश्वास को अक्षुण्ण रखना और सत्य-मार्ग का अनुसरण करना अत्यन्त बड़ी चुनौती है। परन्तु इस चुनौती से पलायन करना उचित नहीं। भारतीय संस्कृति का मूल संदेश ही यह है कि कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए धर्म, सत्य और करुणा का परित्याग न किया जाए।
जब मनुष्य आत्मचिन्तन करता है, अपने कर्तव्य को पहचानता है और व्यापक कल्याण की भावना से कार्य करता है, तब वह किसी भी वात्याचक्र में अपने को स्थिर रख सकता है
समाज को खाँचों में विभाजित कर देखना उचित नहीं है
वैदिक साहित्य में वर्ण की चर्चा मुख्यतः कर्म और गुण के आधार पर की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता (४/१३) में कहा गया है
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः” अर्थात् चार वर्णों की व्यवस्था गुण और कर्म के अनुसार की गई है।
यहाँ जन्म का नहीं, स्वभाव और कर्तव्य का संकेत है।
कालान्तर में यह व्यवस्था जड़ होकर सामाजिक असमानता का कारण बनी। “शूद्र” शब्द का मूल अर्थ सेवा या श्रम से जुड़ा था शूद्र स्वतन्त्र श्रमिक है (दास नहीं ) परन्तु जब इसे हीनता से जोड़ दिया गया, तब वह सामाजिक विषमता का रूप ले बैठा।
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (मण्डल १०, सूक्त ९०) में एक विराट् पुरुष (ब्रह्माण्डीय पुरुष) की प्रतीकात्मक कल्पना की गई है। उसी में समाज के चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है।मंत्र इस प्रकार है—
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
(ऋग्वेद १०. ९०. १२)
उस विराट् पुरुष के मुख से ब्राह्मण,
भुजाओं से क्षत्रिय,जाँघों से वैश्य,
और चरणों से शूद्र की उत्पत्ति बतायी गयी है।
शूद्रों को पठन यजन और दान देने का अधिकार है दान लेने का अधिकार नहीं है और इसके लिए मन्त्रों का पाठ आवश्यक नहीं है l और यह किसी भी वर्ण का व्यक्ति हो सकता है l
इसके अतिरिक्त होलिका में गले क्यों मिलते हैं शूद्र कमलाकर किसने लिखा, अपने भीतर के तत्त्व को जाग्रत करने की किसे आवश्यकता है संगठन का विस्तार कैसे होगा जानने के लिए सुनें