ज्ञान तब सार्थक होता है जब वह आचरण में उतरकर जीवन का दृष्टिकोण बदल दे। आत्मा की अमरता का बोध हमें स्थिरता, निर्भयता और उच्च जीवन-मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६७६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५८
अपने सद्ग्रंथों का अध्ययन करें इससे हम संसार को समझने का सामर्थ्य अपने भीतर ला सकेंगे कभी निराश हताश नहीं होंगे
युगभारती संस्था, जो शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलंबन और सुरक्षा नामक चार आयामों के आधार पर कार्यरत है, जिसका लक्ष्य है
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः,
संबंधों का एक सुन्दर पुष्पगुच्छ है। यदि हम परस्पर संबंधों को सुदृढ़ और विस्तृत करते रहेंगे , तो यह संस्था कभी क्षीण नहीं होगी।
प्रेम और आत्मीयता का विस्तार ही इसकी वास्तविक शक्ति है। जब संबंधों की गरिमा और एकता का साक्षात् प्रदर्शन होगा, तब भारतीय सनातनधर्मी समाज आश्वस्त होगा। उसका भय और भ्रम दूर होगा, अंधकार में उसे प्रकाश की अनुभूति होगी और यह विश्वास दृढ़ होगा कि हम संगठित होकर दुष्ट प्रवृत्तियों से स्वयं को तथा अपने स्वजनों को सुरक्षित रख सकते हैं। संसार में स्वच्छता नितान्त आवश्यक है l
यह हमारा परम सौभाग्य है कि आचार्यजी प्रतिदिन तात्त्विक पृष्ठभूमि से युक्त इन सदाचारमय संदेशों द्वारा हमें प्रेरित कर रहे हैं। हमें चाहिए कि हम इन उपदेशों का सम्यक् लाभ उठाकर आत्मदीप हो जाएं और अपने जीवन को उत्कृष्ट एवं सार्थक बनाएं।
हम सभी संसारी मनुष्यों में दिव्यता निहित है। हमारे भीतर अद्वितीय शक्तियां और संभावनाएं विद्यमान हैं, जिन्हें जाग्रत करने की आवश्यकता है। इसके लिए नियमित अध्ययन, स्वाध्याय, चिन्तन-मनन, लेखन तथा व्यायाम अनिवार्य साधन हैं। प्रातःकाल शीघ्र जागकर आत्मबोध, अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप, शक्तियों और उद्देश्य का ज्ञान,का अभ्यास करना चाहिए l कवि बिहारी के जीवन के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, अष्टावक्र जब जनक को ज्ञान दे रहे थे उस समय उनकी आयु क्या थी और जनक के क्या प्रश्न थे , दीनदयाल जी Toilet Paper के विषय में क्या कहते थे जानने के लिए सुनें l