2.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६७७ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६७७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १५९

अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन प्राणायाम लेखन अवश्य करें 


ये सदाचार वेलाएं दूरस्थ शिक्षा के अत्यन्त उत्कृष्ट और प्रेरणादायी माध्यम हैं। ईश्वरीय व्यवस्था के अन्तर्गत लगभग दस वर्षों से निरन्तर संचालित हो रही ये वेलाएं हमारे चरित्र, विचार और आचरण के परिष्कार के लिए समर्पित हैं। हमें अपने अद्भुत मनुष्यत्व की अनुभूति कराने के लिए अस्तित्व में हैं l ये वेलाएं हमें यह आत्मबोध कराने के लिए आयोजित की जा रही हैं कि हम मृत्यु से भयभीत न हों।


 प्रायः श्रवण, अध्ययन की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है, क्योंकि सुनते समय भाव, स्वर और अनुभूति का सीधा स्पर्श हृदय तक पहुँचता है। शिक्षा के प्रति व्यापक दृष्टि रखने वाले आचार्यजी हमें उत्साहित एवं मार्गदर्शित करने के लिए अपना बहुमूल्य समय प्रदान कर रहे हैं यह हमारे लिए परम सौभाग्य का विषय है। अतः हमें सजगता और कृतज्ञता के साथ इन अवसरों का पूर्ण लाभ उठाना चाहिए। तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में


हम युगभारती के सदस्यों को अपने प्रत्येक कार्य और आयोजन के पीछे किसी न किसी उच्च एवं स्पष्ट लक्ष्य की स्थापना करनी चाहिए। उद्देश्यहीन कर्म दिशाहीन हो जाते हैं, अतः कार्य का आधार सदैव उदात्त और लोककल्याणकारी होना आवश्यक है। यदि हमारे प्रयत्न राष्ट्र और समाज की उन्नति, संरक्षण तथा समृद्धि के लिए समर्पित हों, तो वे अर्थपूर्ण बनते हैं।

देश और समाज ही हमारे जीवन की चेतना, प्रेरणा और शक्ति के मूल स्रोत हैं। इन्हीं से हमें संस्कार, पहचान, सुरक्षा और अवसर प्राप्त होते हैं। अतः अपनी प्राणशक्ति, समय और सामर्थ्य को उनके उत्कर्ष में नियोजित करना ही कर्तव्यबोध और सच्चे राष्ट्रधर्म का परिचायक है l इसके लिए संगठित रहकर, एक-दूसरे का सहारा बनकर, और उच्च उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहकर  हम अपने जीवन को सार्थक बनाएं तथा राष्ट्र, समाज और धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का सम्यक् पालन करें l


आचार्यजी ने अपनी रचित  किस कविता के माध्यम से यह संदेश दिया कि हम अपने को दुर्बल न समझें । हमारे भीतर असीम शक्तियां , साहस, विवेक, करुणा और धर्मनिष्ठा आदि गुण विद्यमान हैं  किन्तु वे सुप्त अवस्था में रहते हैं। आवश्यकता केवल उनके जागरण की है, भैया पंकज जी से आचार्य जी क्या अपेक्षा कर रहे हैं भैया मनीष जी का उल्लेख क्यों हुआ, आठ मार्च की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें