10.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 10 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६८५ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 10 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६८५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६७

“जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए लक्ष्य की स्पष्टता और विचारों की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है। जब हमारी दिशा और दृष्टि सुस्पष्ट होती हैं, तब हम अपने उद्देश्य को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।” भरपूर ऊर्जा से परिपूर्ण हम लोग यदि सात्त्विक लोगों का सहयोग लेते रहेंगे तो  कभी भटकेंगे नहीं और सन्मार्ग पर अग्रसर रहेंगे।


हमारे प्रति स्नेह के कारण और हमें सन्मार्ग पर निरन्तर अग्रसर रखने के लिए आचार्यजी नित्य हमें प्रेरित करते रहते हैं, यह हमारा परम सौभाग्य है। हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l 


मनुष्य अपने ज्ञान, विचार और भावनाओं के आधार पर ही समाज का निर्माण करता है। उसी समाज की ओर उन्मुखता हमारा उद्देश्य है l समाज-उन्मुख जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त कर उस प्रतिष्ठा का अंश समाज को प्रदान करना तथा यह प्रेरणा देना कि ‘मैंने ऐसा किया है, आप भी ऐसा ही कीजिए।’ सच्चे अर्थों में आदर्श जीवन का लक्षण है

ऐसा ही अपनी प्रतिष्ठा के अंश को समाज को प्रदान करने का प्रयास भैया सौरभ द्विवेदी जी ने  ८ मार्च २०२६ को चमारी गांव में माताप्रसाद पुस्तकालय के लोकार्पण समारोह के माध्यम से किया जिसमें अनेक राजनेता, फिल्मी कलाकार, साधुसंत, विद्वान् सम्मिलित हुए l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विनय अजमानी जी, भैया विभास जी,भैया प्रवीण सारस्वत जी, भैया अजय जी,भैया संजय जी,भैया अभय जी के नाम क्यों लिए , अपने संगठन का कोई सदस्य कुंठित न हो इसके लिए क्या करना चाहिए,भोगवाद से क्यों बचना चाहिए, ब्रह्मचर्य क्या है, आचार्य का क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें l